संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण
श्रीवसिष्ठजीका मध्याह्नकालमें प्रवचन समाप्त करके सबको विदा देनेके पश्चात् अपने आश्रममें जाना और दैनिक कर्मके अनुष्ठानमें तत्पर होना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—वत्स भरद्वाज ! राजा दशरथकी वह सुन्दर सभा शरद्-ऋतुमें तारोंसे भरे हुए आकाशकी भाँति निश्चल थी। महर्षि वसिष्ठ हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाला परम पवित्र प्रवचन कर रहे थे। श्रीरामचन्द्रजी प्रातःकालके प्रफुल्ल पङ्कजकी भाँति प्रसन्नतासे खिल उठे थे। महाराज दशरथ वसिष्ठजीके वचनोंको उसी तरह रसके साथ सुन रहे थे, जैसे मयूर वृष्टिके कारण हुई आर्द्रतासे युक्त हो मेघ-गर्जनकी मधुर ध्वनिको सुनते रहते हैं। उनके मन्त्री भी अपने चञ्चल मनको समस्त भोगोंसे हटाकर दृढ़ प्रयत्नके द्वारा उपदेश-श्रवणमें लगे हुए थे। चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल लक्ष्मण वसिष्ठजीके उपदेश-वचनोंसे आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर चुके थे। उनके हृदयमें लक्ष्यभूत ब्रह्मका स्फुरण हो रहा था तथा वे शिक्षाबलसे विचक्षण हो गये थे। शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न भी चित्तके द्वारा पूर्णताको प्राप्त हो चुके थे और पूर्ण आनन्दको प्राप्त हो पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। मन्त्री सुमित्रके हृदयमें पहले दुःखोंकी ही चिन्ता बनी रहती थी, परंतु वह उपदेश सुनकर सुमित्र मित्रभाव ( सूर्यस्वरूपता ) को प्राप्त हो गये। उनका हृदय-पङ्कज सूर्योदयकालके कमलकी भाँति खिल उठा। वहाँ बैठे हुए दूसरे-दूसरे ऋषियों तथा राजाओंके चित्तरूपी रत्न भलीभाँति घुल गये थे। उनमें विवेकजनित उल्लास-सा छा गया था। इतनेमें ही दसों दिशाओंको पूर्ण करती हुई मध्याह्नकालीन शङ्खध्वनि प्रकट हुई, जो प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर और महासागरकी जलराशिके उद्घोषकी भाँति दूरतक सुनायी देनेवाली थी। वह शङ्खनाद सुनते ही महर्षिने अपना प्रवचन बंद कर दिया। दो घड़ीतक विश्राम कर लेनेके पश्चात् जब वह घनीभूत कोलाहल शान्त हो गया, तब वसिष्ठ मुनि पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—'रघुनन्दन ! आजका दैनिक प्रवचन यहींतक कहा जा सका है। शत्रुसूदन ! इसके बाद जो कुछ कहना है, उसे मैं कल प्रातःकाल कहूँगा। मध्याह्नकालमें नियमतः करने योग्य जो कर्तव्य द्विजातियोंके लिये प्राप्त हैं, उसे हमलोगोंको भी करना चाहिये, जिससे वह कर्म-परम्परा नष्ट न हो जाय। अतः सौभाग्यशाली राजकुमार ! तुम भी उठो। आचारचतुर श्रीराम ! स्नान, दान और पूजन आदि समस्त आचारों तथा सत्कर्मोंका अनुष्ठान करो।'
यों कहकर महर्षि वसिष्ठ उठ गये। साथ ही राजा दशरथ भी सभासदोंसहित उठकर खड़े हो गये। राजालोग महाराज दशरथको प्रणाम करके राजभवनसे