भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

परम पुरुषार्थरूप अनन्त नित्य-विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका भलीभाँति चिन्तन करना चाहिये। कर्मोंमें अत्यन्त आसक्त नहीं होना चाहिये और अनर्थकारी जन-समुदायके साथ कभी नहीं रहना चाहिये। 'संसारकी सभी वस्तुओंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद अवश्यम्भावी है' ऐसा विचार करके सदा श्रेष्ठ पुरुषोंका ही अनुसरण अथवा (अनुकरण) करना चाहिये। जैसे सूतमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उस नित्य विस्तृत सर्वव्यापी सर्वभावित शिवस्वरूप परमपद (परमात्मा) में यह समस्त जगत् पिरोया हुआ है (अर्थात् इस सम्पूर्ण जगत्‌में परमात्मा व्याप्त हैं)। जो चेतन परमात्मा विशाल भुवनमण्डलको विभूषित करनेवाले आकाशवर्ती सूर्यदेवमें विराजमान हैं, वे ही धरतीमें बिलके भीतर रहनेवाले कीड़ेके पेटमें भी हैं। निष्पाप रघुनन्दन ! जैसे यहाँ घटाकाशका महाकाशसे वास्तविक भेद नहीं है, उसी प्रकार शरीरवर्ती जीवोंका परमात्मासे परमार्थतः भेद नहीं है। श्रीराम ! जो उत्पन्न होकर विलीन हो जाती है, वह वस्तु वास्तवमें है ही नहीं। अतः यह जड संसार प्रतीतिमात्र है। यह सदा स्थिर नहीं रहता, इसलिये इसे सत् नहीं कहा जा सकता। किंतु प्रतीत होता है, इसलिये इसे असत् भी नहीं कहा जा सकता। अतएव यह अनिर्वचनीय है।

पहले विवेक और विचारसे युक्त धीर साधक शास्त्रके अनुसार परम बुद्धिमान् तत्त्वज्ञानी श्रेष्ठ महापुरुषोंसे मिलकर उनके साथ सत्‌शास्त्र-विषयक विचार करे। विषय-तृष्णासे रहित तत्त्वज्ञानसम्पन्न साधु महापुरुषके साथ परमात्मविषयक विचार करके परमात्माका ध्यान करनेसे परमपद प्राप्त होता है। शास्त्रोंके विचार, महापुरुषोंके सङ्ग, वैराग्य और अभ्यासरूप सत्कार्यसे युक्त पुरुष परमात्माके ज्ञानका पात्र होकर तुम्हारे समान शोभा पाता है। तुम ज्ञानवान् तथा नाना प्रकारके दिव्यगुणोंकी खान हो। तुम्हारा आचार-व्यवहार उदार है तथा तुम समस्त दोषोंसे रहित एवं दुःखरहित परमपदमें स्थित हो। तुम उत्तम अनुभवसे सम्पन्न हो। अतः इस समय संसारमें पूर्वोक्त साधक मनुष्य राग-द्वेषहीन व्यवहारद्वारा तुम्हारी चेष्टाका अनुसरण करेंगे। जो लोकोचित आचारसे युक्त हो बाहर विचरण करेंगे, वे ज्ञानरूपी नौकासे युक्त बुद्धिमान् पुरुष संसार-सागरसे पार हो जायेंगे। जो तुम्हारे समान विशुद्ध बुद्धिसे युक्त और समदर्शी है, वह उत्तम दृष्टिवाला सत्पुरुष मेरी बतायी हुई ज्ञानदृष्टियोंको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। जबतक तुम्हारा शरीर है, तबतक राग-द्वेष और इच्छा आदिसे रहित हो शास्त्रके अनुसार आचरण करते हुए स्थित रहो। शुद्ध सात्त्विक जन्मवाले जीवन्मुक्त पुरुषोंके जो परम सत्य एवं स्वाभाविक शम, दम आदि गुण हैं, उनका सेवन करता हुआ साधारण पुरुष भी मरकर दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि जीव इस जगत्‌में जिन जाति-गुणोंका सदा सेवन करता है, दूसरे जन्ममें उत्पन्न होकर वह उसके अनुसार उसी जातिको प्राप्त होता है। (तात्पर्य यह कि उत्कृष्ट जातिके गुणोंका सेवन करनेपर वह उत्तम जातिमें जन्म पाता है। और अधम जातिके गुणोंका सेवन करनेपर अधम जातिमें ही जन्म ग्रहण करता है।) कर्मोंके अधीन हुए जीव पूर्वजन्मके सब भावोंको कर्मोंके अनुसार ही पाते हैं। पर्वतोंको भी लोग पराक्रमसे जीत लेते हैं, इसलिये मनुष्यको आत्मकल्याणके लिये तत्परतापूर्वक परम पुरुषार्थ करना चाहिये। जीव सात्त्विक, राजस और तामस—किसी भी योनिमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो, उसे कीचड़में फँसी हुई भोली-भाली गायकी तरह अपनी बुद्धिका धैर्यके साथ परम उद्योगपूर्वक संसाररूपी पङ्कसे उद्धार करना चाहिये। पुरुषोचित प्रयत्नसे ही उत्तमोत्तम गुणोंद्वारा सुशोभित होनेवाले मुमुक्षु पुरुष दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त होते हैं। पृथ्वीपर, स्वर्गमें, देवनागोंमें अथवा अन्यत्र भी कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे सद्गुणसम्पन्न पुरुष अपने पुरुषार्थ या प्रयत्नसे प्राप्त न कर सके। (सर्ग ६१-६२)

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