भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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स्थिति-प्रकरण ] * राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन * २४७


एवं विरक्तको इससे संतोष नहीं प्राप्त होता; क्योंकि उनकी दृष्टिमें यह समस्त संसार क्षणभङ्गुर एवं विनाशशील है। भोगोंकी वासना ऐसी विषैली होती है कि उन विषयोंका उपभोग न करनेपर भी विषकी तरह मूर्च्छा (मोह) पैदा कर देती है।

महाबाहु श्रीराम ! सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले पितामह भगवान् ब्रह्मा जब समाधिसे उत्थित होते हैं, जब यह जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र अपनी व्यवस्थाके अनुसार चालू होता है और प्राणीरूपी घट वासनारूपी रस्सीसे बँधकर जीवनकी इच्छासे अपने कर्मानुसार नीचे-ऊपर आने-जाने लगते हैं, तबसे निरन्तर कुछ जीव इस भवकूपसे निकलते हैं और कुछ इसके भीतर प्रवेश करते हैं। श्रीराम ! अनादि-अनन्त ब्रह्मपदसे उत्पन्न हुए जीव-समुदाय उसी तरह ब्रह्ममें स्थित हैं, जैसे तरङ्गोंके समूह समुद्रमें। पुण्यात्मा रघुनन्दन ! संसारमें उत्पन्न हुए जो-जो पुरुष केवल सात्त्विक भावसे सम्पन्न हैं, वे फिर कभी यहाँ जन्म ग्रहण नहीं करते—सर्वथा मुक्त हो जाते हैं; परंतु जो सत्त्वगुणप्रधान राजस-प्रकृतिके पुरुष हैं, उनका इस जगत्में पुनर्जन्म लेना सम्भव है। जो परमात्मासे अधिकार प्राप्त करके प्रधानरूपसे यहाँ आते हैं, ऐसे महान् गुणशाली पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं।

( सर्ग ५८—६० )


राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन; जगत्‌की अनित्यता एवं परमात्माकी सर्वव्यापकताकी भावनाके लिये उपदेश; श्रीरामके आदर्श गुणोंको अपनाने एवं पौरुष-प्रयत्न करनेसे जीवन्मुक्त पदकी प्राप्तिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो पूर्वजन्मकी राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए हैं, वे महान् गुणशाली पुरुष आकाशमें प्रकाशित चन्द्रमाके समान सदा मनोहर कान्तिसे युक्त एवं आनन्दमग्न रहते हैं। जैसे आकाशका भाग मेघ आदिसे मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे सांसारिक दुःखोंसे दुखी नहीं होते। जैसे सुवर्णनिर्मित कमल रात्रिमें संकुचित या मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे आपत्तिमें पड़नेपर भी शोकसे कातर नहीं होते। जैसे स्थावर वृक्ष आदि प्रारब्धभोगके अतिरिक्त दूसरी कोई चेष्टा नहीं करते, उसी प्रकार वे भी ज्ञान और ज्ञानके साधनोंके अतिरिक्त और कोई चेष्टा नहीं करते। जैसे वृक्ष अपने पुष्प और फल आदिसे सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार वे भी अपने सदाचारोंसे शोभायमान होते हैं। जैसे चन्द्रमा क्षीण होनेपर भी कभी शीतलताका त्याग नहीं करता, उसी प्रकार वे आपत्तिकालमें भी अपने सौम्य स्वभावको नहीं छोड़ते। मैत्री * आदि गुणोंसे कमनीयताको प्राप्त हुई अपनी प्रकृतिसे ही वे नूतन पुष्पगुच्छोंसे विभूषित लतासे शोभायमान वनके वृक्षोंकी भाँति बहुत शोभा पाते हैं। वे पुरुष सबपर समान भाव रखते, समता-रूप रसका अनुभव करते, सदा सौम्यभावका आश्रय लेते, साधुओंसे भी बढ़कर साधु होते और अपनी मर्यादामें स्थित रहनेवाले समुद्रकी भाँति शास्त्र-मर्यादामें स्थित रहते हैं। अतः महाबाहो ! आपत्तियोंकी पहुँचसे परे जो उनका पद (स्थान) है, उसकी ओर सदा चलना चाहिये। मनुष्यको इस जगत्में सत्त्वगुणप्रधान राजस पुरुषोंकी भाँति ऐसा बर्ताव तथा सत्-शास्त्रोंका विचार करना चाहिये, जिससे परमात्माकी प्राप्ति हो। इस प्रकार भावना करनेवाले पुरुषको सब वस्तुओंकी अनित्यताका भी विचार करना चाहिये। विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष अज्ञानको बढ़ानेवाले मिथ्याभूत अनात्मदर्शनका त्याग करके सांसारिक पदार्थोंके विषयमें यह भावना करे कि ये सब-के-सब आपत्ति ही हैं; उनमें सम्पत्तिभावना कभी न करे। उस (यो० द० १ । ३३) 'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माओंके प्रति क्रमशः मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त शुद्ध होता है।'


* योगदर्शनमें बताया गया है—'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।'