भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२४६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

परमात्मभावमें स्थित हुए कचके द्वारा सर्वात्मत्वका बोध करानेवाली गाथाओंका गान, भोगोंसे वैराग्यका उपदेश तथा सबकी परमात्मामें स्थितिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी पूर्वोक्त वस्तुके विषयमें पहले बृहस्पतिके पुत्र कचने जो पवित्र गाथाएँ गायी थीं, उनका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो। एक समय मेरु पर्वतके किसी वनप्रान्तमें देवगुरु बृहस्पतिके पुत्र कच ब्रह्मविचारमें तत्पर होकर रहते थे। वहाँ उन्होंने सुनी हुई ब्रह्मविद्याका बारंवार मनन और निदिध्यासन करके आत्मामें परम शान्ति प्राप्त कर ली थी। इसलिये उनकी बुद्धि परमात्माके यथार्थज्ञानरूपी अमृतसे परिपूर्ण थी। विरक्त एवं विवेकी पुरुषोंके लिये अनादरके योग्य जो यह आपातरमणीय पाञ्चभौतिक दृश्य जगत् है, इसमें उनकी बुद्धि नहीं लगती थी। दृश्य-प्रपञ्चके प्रति आदर न होनेके कारण उसमें उनका मन नहीं लगता था। इसलिये एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुको न देखते हुए उन्होंने अत्यन्त विरक्त पुरुषकी भाँति अकेले एकान्त स्थानमें हर्ष-गद्गद वाणीद्वारा यह उद्गार प्रकट किया।

अहो ! जैसे महाप्रलयके जलसे समस्त संसार भरा रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परमात्मासे परिपूर्ण है। दुःख, जीवात्मा और सुख एवं दिशाओंसे घिरा हुआ सुमहान् आकाश—ये सब परमात्मा ही हैं, ऐसा मुझे अनुभव हो गया; अतः उसी आनन्दमय परमात्माके ज्ञानसे मेरे सारे दुःख नष्ट हो गये हैं। बाह्य एवं आभ्यन्तर भावोंसे युक्त इस देहमें, ऊपर-नीचे और पूर्व आदि दिशाओंमें तथा इधर-उधर परमात्मा ही हैं। परमात्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु कहीं नहीं है*। सभी जगह परमात्मा स्थित हैं। सब कुछ परमात्ममय ही है। यह सब जगत् परमात्मा ही है, अतः मैं सदा परमात्मामें ही स्थित हूँ। मैं नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मस्वरूप हूँ और एकार्णवके समान सर्वत्र सुखपूर्वक विराजमान हूँ—इस प्रकारकी भावना करके क्रमशः घण्टानादकी तरह ओंकारका उच्चारण करते हुए वे उस मेरु पर्वतके कुञ्जमें बैठे रहे। श्रीराम ! वे कल्पनारूपी कलङ्कसे रहित होनेके कारण शुद्धरूपमें स्थित थे। उनके प्राणोंका स्पन्दन हृदयमें निरन्तर लीन था और वे शरत्कालके मेघरहित आकाशकी भाँति निर्विकार भावसे स्थित थे। ऐसी स्थितिमें पहुँचे हुए महात्मा कचने उपर्युक्त गाथाओंका गान किया था।

रघुनन्दन ! इस जगत्में खाने-पीने और स्त्री-समागमके अतिरिक्त उत्तम पुरुषार्थरूप शुभ वस्तु कुछ भी नहीं है—अज्ञानियोंके इस कथनपर विचार करके परम पदमें आरूढ़ हुआ महान् पुरुष यहाँ किस वस्तुकी वाञ्छा कर सकता है? जो मूढ़ एवं असाधु पुरुष कृपणोंके सर्वस्वभूत—आदि, मध्य एवं अन्तमें भी विनाशशील भोगोंद्वारा संतुष्ट होते हैं, वे पशुओं और पक्षियोंके समान गये-बीते हैं। जो संसारमें इन मिथ्या विषयभोगोंको सत् मानते हैं—इनकी स्थिरतापर विश्वास करते हैं, वे मनुष्योंमें गदहोंके समान हैं, उनका जीवन व्यर्थ है। सारी पृथ्वी मिट्टी ही है। समस्त वृक्ष काष्ठमय ही हैं और सभी शरीर हड्डी-मांसके पुतले ही हैं। नीचे पृथ्वी है तथा ऊपर और आगे-पीछे आकाश है; फिर यहाँ सुख देनेके लिये कौन-सी अपूर्व वस्तु है ? उत्पन्न और विनष्ट होनेवाली, अनित्य तथा मन और इन्द्रियोंके संयोगसे प्रकट हुए समस्त भोग वास्तवमें मिथ्या ही हैं। हड्डियोंके समूहको अपने शरीरकी संज्ञा देनेवाले पुरुषके द्वारा अपनी प्रेयसी कहकर एक रक्त-मांसकी पुतलीका सादर आलिङ्गन किया जाता है। यह संसारको मोहित करनेवाले कामका ही क्रीडा-विलास है। श्रीराम ! यह सारा जगत् मूढ़ पुरुषोंकी दृष्टिमें ही सत्य और स्थिर है। उन अज्ञानी मनुष्योंके लिये ही यह संतोषदायक होता है। विवेकशील


* इस विषयमें श्रुतिका भी कथन है—आत्मैवाधस्ता-दात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति (छा० उ० ७ । २५ । २)। अर्थात् परमात्मा ही नीचे है, परमात्मा ही ऊपर है, परमात्मा ही पीछे है, परमात्मा ही आगे है, परमात्मा ही दायीं ओर है, परमात्मा ही बायीं ओर है और परमात्मा ही यह सब है।