संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपदेशसे मैं अग्रस्त पुरुषके समान अपने स्वरूपमें निश्च स्थित हूँ। प्रवचन करते समय आपके मुखसे जो उदार भावोंसे युक्त, सुस्पष्ट, सुन्दर तथा परमात्माके स्वरूप को प्रकाशित करनेवाले वचन निकलते हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती—अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है। आपने श्रुति-पुराण आदि शास्त्रोंके आधारपर कमलयोनि ब्रह्माकी जो उत्पत्ति कही थी, उसका पुनः स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! इस ब्रह्माण्डमें तथा दूसरे-दूसरे विचित्र ब्रह्माण्डोंमें भी बहुत-से विभिन्न आचार व्यवहारवाले सहस्रों प्राणी विचरते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य समयोंमें उत्पन्न होनेवाले अनन्त भुवनोंमें दूसरे-दूसरे बहुत से प्राणी एक ही समय अधिक संख्यामें उत्पन्न होंगे। महाबाहो! उन ब्रह्माण्डोंमें उन ब्रह्मा आदि देवताओंकी उत्पत्तियाँ विचित्र-सी हुई बतायी गयी हैं। महासर्गके आरम्भकालमें कभी तो ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न होते हैं, कभी जलसे, कभी अण्डसे और कभी आकाशसे प्रादुर्भूत होते हैं। विभिन्न सृष्टियोंमें कोई भूमि केवल मिट्टीके रूपमें प्रकट हुई तो कोई पथरीली थी, कोई सुवर्णमयी थी और कोई ताम्रमयी थी। इस ब्रह्माण्डमें भी भिन्न भिन्न प्रकारके कितने ही आश्चर्यमय जगत् हैं। इस सच्चिदानन्दघन परब्रह्मस्वरूप महाकाशमें अनन्त जगत् महासागरकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। जैसे समुद्रमें लहरें और मरु-मरीचिकामें जलकी धाराएँ उत्पन्न होती हैं; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें अगणित विश्वकी शोभा प्रकट होती है। (तात्पर्य यह कि जैसे सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें इस जड जगत्का वैभव मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है।) जैसे वर्षा आदि ऋतुओंमें मच्छरोंके समूह उत्पन्न हो-होकर सब ओर भर जाते हैं और फिर नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार ये संसारकी सृष्टियाँ उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं; यह नहीं ज्ञात होता कि ये सदा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली सृष्टि परम्पराएँ परमात्मामें कबसे आरम्भ हुईं। ये सृष्टियों पूर्व-से-पूर्व कालमें थीं और उससे भी पहले विद्यमान थीं। इस प्रकार अनादिकालसे इनकी परम्पराएँ चल रही हैं। जैसे समुद्रमें निरन्तर लहरें उठती रहती हैं, उसी तरह परमात्मामें सदा ही ये सृष्टियों उत्पन्न एवं विलीन होती रहती हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदिसे युक्त ये समस्त प्राणी नदीकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न हो-होकर विलीन होते रहते हैं। जैसे मिट्टीकी राशिमें घड़े और अङ्कुरमें पत्ते विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार भविष्यमें होनेवाली अन्य सृष्टि-परम्पराएँ भी परब्रह्म परमात्मामें स्थित हैं।
श्रीराम ! परमात्माके स्वरूपमें जो वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं—बिना हुए ही प्रतीत होती हैं, ऐसी इन विलक्षण सृष्टियोंमें ब्रह्माकी विविध विचित्र उत्पत्तियाँ बीत चुकी हैं। वास्तवमें यह संसार मनके संकल्पका विस्तारमात्र है। यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। मैंने केवल समझानेके लिये तुम्हारे समक्ष इस सृष्टि-क्रमका वर्णन किया है। फिर सत्ययुग, फिर त्रेता, फिर द्वापर और फिर कलियुग—इस प्रकार सारा जगत् घूमते हुए चक्रकी तरह बारंबार आता-जाता रहता है। जैसे प्रत्येक प्रातःकालके बाद दिन आता है, उसी प्रकार पुनः मन्वन्तरोंके आरम्भ होते हैं। एकके बाद पुनः दूसरे कल्पोंकी परम्पराएँ चलती हैं और बारबार कार्यावस्थाएँ प्राप्त होती रहती हैं। जैसे वृक्षमें विभिन्न ऋतुओंके अनुसार सारे फल-फूल आदि कभी अप्रकट रहते हैं और कभी समय पाकर प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार परम तत्त्व परमात्मामें यह सारा जगत् कभी अव्यक्त रहता है और कभी व्यक्त हो जाता है। श्रीराम ! यह संसार कभी भी सत् नहीं है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् परमात्मामें स्वभावसे ही सदा संसारका अत्यन्ताभाव है। महामते ! ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सब कुछ ब्रह्म ही है । इसलिये संसार नहीं है, यह कथन सर्वथा युक्तियुक्त ही है।