संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थिति-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश * २४१
सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारंबार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध-भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! रमणीय स्त्री आदि तथा धनके नष्ट होनेपर शोकका कौन-सा अवसर है ? इन्द्रजालकी दृष्टिसे देखे गये पदार्थके नष्ट होनेपर क्या कोई विलाप करता है ? अविद्याके अंशभूत पुत्र आदिके प्राप्त होनेपर सुख और नष्ट होनेपर दुःखका प्रसार होना क्या कभी उचित है ? रमणीय धन और स्त्री आदिकी प्राप्ति एवं वृद्धि होनेपर हर्षसे फूल उठनेका क्या अवसर है ? क्या मृगतृष्णाके जलकी वृद्धि होनेपर जलार्थी पुरुषोंको आनन्द प्राप्त होता है ? कदापि नहीं । धन और स्त्री आदिके बढ़नेपर तो उन्हें परमार्थमें बाधक समझकर दुःखका अनुभव करना चाहिये, संतोष मानना तो कदापि उचित नहीं । संसारमें मोह-मायाकी वृद्धि होनेपर भला, कौन सुखी एवं स्वस्थ रह सकता है। जिन भोगोंके बढ़ जानेपर मूढ़ मनुष्यको राग होता है, उन्हींकी वृद्धिसे विवेकशील पुरुषके मनमें वैराग्य होता है । नश्वर धन और स्त्री आदिके सुलभ होनेमें हर्षका क्या कारण है ? जो इनके परिणामको देख पाते हैं, उन साधु पुरुषोंको तो इनसे वैराग्य ही होता है । अतः रघुनन्दन ! संसारके व्यवहारोंमें जो-जो वस्तु नश्वर प्रतीत हो, उसकी तो तुम उपेक्षाकरो और जो न्यायतः प्राप्त हो जाय, उसे यथायोग्य व्यवहारमें लाओ; क्योंकि तुम तत्त्वज्ञ हो। अप्राप्त भोगोंकी स्वभावतः कभी इच्छा न होना और दैवात् प्राप्त हुए भोगोंको यथायोग्य व्यवहारमें लाना—यह ज्ञानवान्का लक्षण है।
जिस किसी भी युक्ति अथवा साधनसे जिस पुरुषका जड़ दृश्यसे राग चला जाता है, उसकी परमात्मामें दृढ़ विश्राम रहनेवाली विमल बुद्धि कभी मोहरूपी सागरमें नहीं डूबती । यह असत् है, ऐसा समझकर जिसकी समस्त सांसारिक वस्तुओंमें आस्था नहीं रह गयी है, उस सर्वज्ञको मिथ्या अविद्या अपने अङ्कमें नहीं ले सकती—चंगुलमें नहीं फँसा सकती । श्रीराम ! अत्यन्त विरक्त, अपने पारमार्थिक स्वरूपमें स्थित और वासस्थानमें सब प्रकारकी अहंता-ममतासे रहित हो तथा न्यायप्राप्त कार्यमें तत्पर रहते हुए भी रागरहित हो तुम आकाशके समान निर्लिप्त हो जाओ; क्योंकि कर्ममें लगे रहनेपर भी जिस ज्ञानी महापुरुषकी उसमें न तो इच्छा (राग) है और न अनिच्छा (द्वेष) ही है, उसकी बुद्धि जलसे कमलदलकी भाँति कभी लिप्त नहीं होती । तुम्हारी इन्द्रियाँ और मन गौणी वृत्तिसे दर्शन और स्पर्श आदि कार्य करें या न करें, तुम सर्वथा इच्छारहित हो अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित रहो। यह संसार-सागर वासनाओंके जलसे भरा हुआ है । जो शुद्ध बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ हैं, वे ही इसके पार जा सके हैं । दूसरे लोग तो डूब ही गये हैं । जो नित्य तृप्त, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाले जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उन्हींके आचारोंका अनुसरण करना चाहिये, भोग-लम्पट दीन-हीन शठोंके आचरणोंका नहीं । महात्मा पुरुष सब कुछ नष्ट हो जानेपर भी खिन्न नहीं होते, देवताओंके उद्यानमें भी आसक्त नहीं होते और शास्त्र-मर्यादाका कभी त्याग नहीं करते । महात्मा पुरुष इच्छारहित तथा न्यायप्राप्त व्यवहारका अनासक्तभावसे अनुसरण करनेवाले होते हैं । वे देहरूपी रथका-आश्रय ले परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो आसक्तिशून्य होकर विचरते हैं । परम सुन्दर श्रीराम ! तुम भी यथार्थ एवं विस्तृत विवेकको प्राप्त कर चुके हो। अपनी इस पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिके बलसे सदा विज्ञानानन्दघन आत्मस्वरूपमें स्थित हो ।
श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और समस्त वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् हैं । आपके पवित्र