भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२४० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मात्र दुःखका ही भागी होता है। यदि परमात्मस्वरूप यथार्थ वस्तु न हो तो लोग भले ही अवस्तुरूप संसारका अनुसरण करें; परंतु जो यथार्थ वस्तु—परमात्माका परित्याग करके अवस्तुरूप संसारका अनुगमन करता है, वह नष्ट हो जाता है—परमात्माकी प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थसे वञ्चित रह जाता है। जैसे रज्जुमें सर्पका भय मनका व्यामोह (भ्रम) मात्र ही है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनका भ्रम ही है। मनकी भावनाओंकी विचित्रतासे जगत् चिरकालतक प्रतीतिका विषय बना रहता है। जलके भीतर प्रतिबिम्बित हुए चन्द्रमाके समान चञ्चल (क्षणभङ्गुर) जो मिथ्या उदित हुए पदार्थ हैं, उनसे इस लोकमें मूर्ख बालक ही धोखा खा सकता है, तुम-जैसा तत्त्वज्ञानी नहीं। यह जडसंघात देह-आदिरूप जो विशाल जगत् दिखायी देता है, मिथ्या ही है। मनके मननसे ही इसका निर्माण हुआ है। जैसे हृदयमें स्वप्न या संकल्पमय नगर निर्मित होता है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनके संकल्पमें ही निर्मित हुआ है (वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है)। यह दृश्य-प्रपञ्च मनके संकल्पसे उत्पन्न होता है और उसके संकल्परहित हो जानेसे विलीन हो जाता है। इस तरह यह समृद्धिशाली गन्धर्वनगरकी भाँति बिना हुए ही दिखायी देता है। हृदयमें मनके संकल्पद्वारा कल्पित विशाल नगरका विध्वंस अथवा अभ्युदय हो जानेपर तुम्हीं बताओ, किसकी क्या हानि होती है या किसको क्या लाभ हो जाता है? जैसे बालकोंके मनमें खेलके लिये बने हुए गुड़ियों या खिलौनोंके द्वारा पुत्र-पशु आदि व्यवहारोंकी कल्पना होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी सदा मनसे ही प्रकट होता है। जैसे इन्द्रजालके द्वारा रचित जलके नष्ट-भ्रष्ट होनेपर किसीका कुछ भी नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मिथ्या प्रकट हुए इस संसारके नष्ट हो जानेपर भी किसीका कुछ नहीं बिगड़ता। जो वास्तवमें असत् ही है, वह यदि अविद्यमान हो जाय तो किसका क्या बिगड़ गया? इसलिये संसारमें हर्ष और शोकका आधार कुछ भी नहीं है। महामते! जिसका सदासे ही अत्यन्त अभाव है, उसके नष्ट होनेसे क्या नष्ट हो जाता है? और जब किसीका नाश ही नहीं होता, तब उसके लिये दुःखका क्या प्रसङ्ग है?

एकमात्र प्रपञ्चका ही विस्तार करनेवाले इस असत्यभूत समस्त संसारमें ग्रहण करने योग्य कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसे विद्वान् पुरुष ग्रहण करनेकी इच्छा करे? इसी प्रकार जो सर्वथा सत्यभूत ब्रह्मतत्त्वमय है, उस समस्त त्रिलोकीमें कौन ऐसा हेय पदार्थ है, जिसका विद्वान् पुरुष त्याग करे? अर्थात् तीनों लोक ब्रह्मभूत होनेके कारण चिन्मय हैं; उनमें विज्ञानानन्दघन परमात्माके सिवा अन्य कोई पदार्थ नहीं है, जिसका त्याग किया जा सके। आदि और अन्तमें जिसका अभाव है, उसका वर्तमानमें भी अभाव ही है। अतः श्रीराम! जो अज्ञानी इस असत् संसारकी इच्छा करता है, उसको असत् (जड संसार) ही प्राप्त होता है। आदि और अन्तमें जो सत्य है, वर्तमानमें भी वह सत्य ही है; अतः जिसकी दृष्टिमें सब सत् परमात्मा ही है, उसे सर्वत्र परमात्म-सत्ताका ही दर्शन होता है। जलके भीतर जो असत्यभूत चन्द्रमा और आकाश-तल आदि दिखायी देते हैं, उन्हें अपने मनके मोहके लिये मूर्ख बालक ही पाना चाहते हैं, उत्तम ज्ञानी पुरुष नहीं। मूर्ख ही विशाल आकारवाले अर्थशून्य कार्योंमें सुख समझकर संतुष्ट होता है; किंतु अज्ञानके कारण उसे अनन्त दुःख ही प्राप्त होता है; सुख नहीं।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! वसिष्ठ मुनिके यों कहनेपर दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचलको चले गये। सारी सभाके लोग मुनिको नमस्कार करके सायंकालकी उपासनाके लिये स्नान करनेके उद्देश्यसे उठ गये और रात बीतनेपर दूसरे दिन उदित हुए सूर्यदेवकी किरणोंके साथ-साथ फिर सभाभवनमें आ गये! (सर्ग ४४-४५)