संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थिति-प्रकरण ] * विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर * २४३
अज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका कभी विच्छेद नहीं होता, वह सदा बना रहता है । इसलिये यह संसार-माया मिथ्या होती हुई भी मूढ़के लिये नित्य है, यह कथन भी युक्तिसंगत ही है । रघुनन्दन ! जगत् बारंबार उत्पन्न होता रहता है, इसलिये कभी इसका अभाव नहीं है—ऐसा जो कुछ लोगोंका कथन है, वह भी उनकी दृष्टिसे मिथ्या नहीं है। यह सब दृश्य पुनः-पुनः प्रकट होता है । बारंबार जन्म और मरण होते रहते हैं । सुख-दुःख, करण और कर्म भी बारंबार हुआ करते हैं । दिशाएँ, आकाश, समुद्र और पर्वत भी बारंबार उत्पन्न होते हैं । जैसे खिड़कीवाले घरोंमें एक ही सूर्यकी प्रभा बारंबार अनेक रूपोंमें प्राप्त होती है, वैसे ही यह सृष्टि प्रवाहरूपसे पुनः-पुनः चक्रकी भाँति चलती रहती है । फिर दैत्य और देवता जन्म लेते हैं, पुनः लोक-लोकान्तरोंके क्रम प्रकट होते हैं, फिर स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करनेकी चेष्टाएँ चालू होती हैं तथा पुनः इन्द्र और चन्द्रमाका आविर्भाव होता है । अनेकानेक दानव भी बारंबार जन्म लेते हैं तथा बारंबार सम्पूर्ण दिशाओंमें मनोहर चन्द्रमा, सूर्य, वरुण एवं वायुका संचार होता रहता है। कालरूपी कुम्हार नाना प्रकारके प्राणीरूप प्यालोंको बनानेके लिये पुनः बड़े वेगसे निरन्तर कल्प नामक चाकको चलाने लगता है । (सर्ग ४६-४७)
विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर; जगत्को मिथ्या मानकर उसमें आस्था न रखने, देहाभिमानको छोड़ने और अपने विशुद्ध स्वरूप (परमात्मपद) में स्थित होनेका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्यके द्वारा नष्ट हो गयी है तथा जो ऐहिक और पारलौकिक भोग एवं ऐश्वर्यके लिये सकामभावसे नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, ऐसे मूढ़ पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्माकी ओर ध्यान नहीं देते, इस कारण उनको परमात्माके यथार्थ स्वरूपका अनुभव नहीं होता (अर्थात् वे परम पुरुषार्थरूप परमात्माकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाते हैं)। जो पुरुष विवेकयुक्त तीक्ष्णबुद्धिकी चरम सीमाको पहुँचे हुए हैं तथा जिन्हें इन्द्रियोंने अपने वशमें नहीं कर रखा है, वे इस जगत्की मायाका हाथपर रखे हुए बेलके समान प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। जो जीव विवेकपूर्ण विचारसे युक्त है, वह इस जगत्की अहङ्कारमूलक मायाको तुच्छ जानकर उसी तरह त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको । श्रीराम ! जैसे आगसे भुना हुआ बीज चिरकालतक खेतोंमें रहनेपर भी जमता नहीं, उसी प्रकार वह विवेकी पुरुष अनासक्तिको प्राप्त हो दीर्घकालतक शरीरमें रहनेपर भी फिर जन्म नहीं लेता । किंतु अज्ञानी मनुष्य आधि-व्याधिसे घिरे हुए तथा आज या कल प्रातःकाल नष्ट हो जानेवाले इस क्षणभङ्गुर शरीरके हितके लिये ही प्रयत्न करते हैं, आत्माके लिये नहीं ।
इसके बाद दाशूर मुनिका उपाख्यान सुनाकर वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जड जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा निश्चय करके इसमें सब ओरसे आसक्तिका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि जो वस्तु है ही नहीं, उसके प्रति विवेकशील पुरुषोंका विश्वास कैसे होगा । जैसे मनके संकल्पद्वारा कल्पित पुरुष अथवा मनोराज्यको, स्वप्नगत जन-समुदायको तथा भ्रमसे प्रतीत होनेवाले दो चन्द्रमाओंकी आकृतियोंको तुम देखते हो, उसी प्रकार मनकी भावनासे ही उत्पन्न हुए इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चको भी देखना चाहिये (अर्थात् इसे मिथ्या समझकर इसके प्रति राग-द्वेष नहीं करना