भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२४४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


चाहिये)। निष्पाप रघुनन्दन ! पदार्थोंके सौन्दर्यका चिन्तन करनेसे जो उनके प्रति आन्तरिक आस्था होती है, उसका पूर्णतः परित्याग करके तुम जिस चिन्मय स्वरूपसे स्थित हो, वही तुम्हारा वास्तविक रूप है। उसी रूपसे इस जगत्‌में तुम लीलापूर्वक विचरण करो। सब पदार्थोंके भीतर विद्यमान रहते हुए भी जो सबसे अतीत है, वह परमात्मा तुम्हीं हो। तुम्हारे सकाशमात्रसे यह नियति विस्तारको प्राप्त होती है। जैसे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित सूर्यदेवके आकाशमें स्थित होनेपर जगत्‌के सब व्यवहार होने लगते हैं, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माकी सत्तासे ही समस्त कार्य सम्पन्न होते हैं। जैसे रत्न (सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणि आदि) में प्रकाश करनेकी इच्छा न होनेपर भी उसकी स्थितिमात्रसे स्वतः प्रकाश होने लगता है, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माके सकाशसे ही इस जगत्‌-समुदायकी प्रवृत्ति (व्यवहारचेष्टा) होती रहती है। सच्चिदानन्द परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे अतीत होनेके कारण वास्तवमें कर्ता और भोक्ता नहीं है, किंतु इन्द्रियोंमें व्यापक होनेके कारण वही कर्ता और भोक्ता भी माना जाता है। 'मैं सबके भीतर स्थित और अकर्ता हूँ'—ऐसी सुदृढ धारणाके साथ विवेकी पुरुष प्रवाहरूपसे प्राप्त हुए कार्यको करता रहे, तो भी वह उससे लिप्त (बद्ध) नहीं होता। चित्तमें प्रवृत्तिका अभाव होनेसे मनुष्य उपरतिका प्राप्त होता है। जिसको यह निश्चय हो गया है कि मैं यहाँ कुछ भी नहीं करता, अर्थात् जो कर्तापनके अभिमानसे रहित हो गया है, ऐसा कौन पुरुष भोग-समूहोंकी कामना मनमें लेकर किसी कार्यको करेगा अथवा छोड़ेगा। इसलिये सदा 'मैं कर्ता नहीं हूँ' इस भावनाको जगाये रखनेसे पुरुषके लिये परम अमृतमयी समता ही शेष रहती है। 'मैं यह हूँ, मैं यह नहीं हूँ; मैं इसे करता हूँ और इसे नहीं करता' इस तरहके भावोंका अनुसंधान करनेवाली दृष्टि वास्तवमें संतोपजनक नहीं होती। 'मैं शरीर हूँ'—ऐसी धारापूर्वक जो स्थिति है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है। वही महावीचि नरकका जाल है और वही असिपत्रवनकी पंक्तियाँ हैं। उस देहाभिमानका सर्वथा प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। मैं यह दृश्यरूप कुछ भी नहीं हूँ, किंतु साक्षात् सच्चिदानन्द परमात्मा हूँ—ऐसा निश्चय करके तुम अपने उस सर्वोत्तम स्वरूपमें सदा स्थित रहो, जिसमें श्रेष्ठ साधु, ब्रह्मवेत्ता पुरुष स्थित हुए हैं।

(सर्ग ४८—५६)


वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वज्ञानी महात्माकी महत्तम स्थितिका वर्णन

**श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**ब्रह्मन् ! आपने अपनी उत्तम उक्तियोंद्वारा जो यह सुन्दर बात कही है, वह सर्वथा सत्य है। समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले परमात्मा अकर्ता होते हुए ही कर्ता हैं और अभोक्ता होते हुए ही भोक्ता हैं। प्रभो ! जो सबका अधिष्ठान और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित है, उस सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्द निर्मल पदस्वरूप ब्रह्मका मेरे हृदयमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

**श्रीवसिष्ठजी बोले—**रघुनन्दन ! आत्मा ही आत्माको जानता है, आत्माने ही आत्माको संसारी बनाया है अर्थात् इसने स्वयं ही अज्ञानके कारण अपने-आपको संसार-बन्धनमें बाँधा है। आत्मा ही अपने ज्ञानके द्वारा पवित्र होकर सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है। जो वासनाओंके बन्धनमें बँधा है, उसीको बद्ध कहा गया है। वासनाका अभाव ही मोक्ष है। (वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जानेपर साधक संसारके बन्धनोंसे सदाके