भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


शीतल करनेवाली, निश्चलताके कारण धीर और समदर्शनात्मक थी; उस वृत्तिसे वह परिपूर्ण समुद्र और चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। यह सारा जगत् केवल चेतन-तत्त्वकी कल्पना ही है—यों निश्चय करनेके कारण उसकी बुद्धि सांसारिक सुख-दुःखोंसे रहित हो गयी थी; अतः वह पूर्णरूपसे प्रकाशित हो रही थी। इसलिये प्रबुद्ध तथा चेतनमें विलीन हुआ वह राजा हर्षित होते, प्रफुल्लित होते, पूर्णरूपसे स्थित रहते, चलते, बैठते और सोते समय सदा समस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता था। उसका शरीर विकाररहित था तथा नेत्र कमलके समान सुन्दर थे। वह अनासक्तभावसे राज्य करते हुए सैकड़ों वर्षपर्यन्त इस भूमण्डलपर विद्यमान रहा। तत्पश्चात् उसने स्वयं ही इस पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग कर दिया और परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेके कारण, जो सृष्टि और प्रलयके हेतु तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, उन परब्रह्म परमात्मामें प्रवेश कर गया—ठीक उसी तरह, जैसे नदियोंका जल परिपूर्ण समुद्रमें प्रवेश करता है। वह विशुद्ध एकरस स्वप्रकाश परमात्माको यथार्थरूपसे जान चुका था और जन्म आदि विकारोंसे रहित अवस्थाको प्राप्त कर लेनेके कारण उसके समग्र शोक शान्त हो गये थे; इसलिये वह पूर्णरूप परब्रह्म परमात्मामें उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गया, जैसे घटके फूट जानेपर घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है। (सर्ग ५८-६०)


किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस समय सुरघुको तत्त्वज्ञान हो चुका था, उसी समय अर्थात् उसके जीवनकालमें ही उसका और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का परस्पर जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे सुनो। रघुकुलको आनन्दित करनेवाले राम ! जैसे रथपर रखा हुआ परिघ नामक अस्त्र विपक्षी वीरोंका संहार करनेमें प्रसिद्ध है, उसी तरह पारसीक देशका एक विख्यात राजा हो गया है, जो शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला था। उसका नाम था परिघ। वह किरातराज सुरघुका परम मित्र था। किसी समय जैसे कल्पान्तके

अवसरपर संसारमें वर्षाका अभाव हो जाता है, उसी तरह राजा परिघके राज्यमें महान् अवर्षण हुआ, जिसमें प्रजाजनोंका पापरूपी दोष ही कारण था। उस समय बहुत-सी जनता भूखसे गतप्राण होकर उसी प्रकार विनष्ट हो गयी, जैसे जगलमें आग लग जानेपर झुंड-के-झुंड प्राणी जलकर भस्म हो जाते हैं। प्रजाके उस कष्टको देखकर राजा परिघको अपार विषाद हुआ। उसने प्रजाजनोंको विनाशसे बचानेके लिये अनेकों यत्न किये, किंतु वे सब निष्फल सिद्ध हुए। तब उसे राज्यसे वैराग्य हो गया। फिर तो जैसे राहगीर जले हुए गाँवको छोड़कर