भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिव ) का संवाद * ३१५


चल देते हैं, उसी तरह उसने शीघ्र ही अपने सम्पूर्ण राज्यका परित्याग कर दिया और मृगचर्मधारी मुनियोंकी तरह तपस्या करनेके लिये जंगलकी राह ली। वह विरक्तात्मा परिव किसी दूरवर्ती काननमें, जो पुरवासियोंकी जानकारीके बाहर था, जाकर इस प्रकार रहने लगा मानो किसी अन्य लोकमें चला गया हो। उसकी बुद्धि तो शान्त थी ही, उसने अपने मन-इन्द्रियोंका भी दमन कर लिया था; अतः वह वहाँ एक पर्वतकी कन्दरामें आसन लगाकर तपस्यामें निरत हो गया। उस समय स्वयं सूखकर गिरे हुए पत्ते ही उसके आहार थे। इस प्रकार चिरकालतक वह अग्निकी भाँति सूखे पत्तोंको ही भक्षण करता रहा, जिससे तपस्वियोंके मध्यमें वह 'पर्णाद' नामसे विख्यात हुआ। तभीसे वह परिव जम्बूद्वीपमें मुनियोंके आश्रमोंमें राजर्षिश्रेष्ठ पर्णादके नामसे प्रसिद्ध हो गया। तदनन्तर एक सहस्र वर्षोंकी घोर तपस्या और अभ्यासके द्वारा परमात्माकी कृपासे उसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति हुई। साधुस्वभाव राम! फिर तो उसकी बुद्धि प्रबुद्ध हो उठी। वह सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे परे हो गया। उसकी विषय-वासनाएँ नष्ट हो गयीं। उसका मन विक्षेपशून्य और शान्त हो गया तथा वह विषयोंकी आसक्तियों और आक्षेपोंसे रहित हो गया। इस प्रकार जीवन्मुक्त होकर वह तत्त्वज्ञानियों तथा तत्त्वजिज्ञासु मुनियोंके साथ स्वेच्छानुकूल त्रिलोकीमें विचरण करने लगा। यों पर्यटन करते हुए वह एक समय हेमजट देशके अधिपति राजा सुरघुके रत्ननिर्मित महलमें जा पहुँचा। वे दोनों पहलेके मित्र तो थे ही, साथ ही वे पूर्ण ज्ञानी थे। उन्हें ज्ञातव्य तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो चुका था तथा वे जीवन्मुक्त थे; अतः वे परस्पर एक-दूसरेका आदर-सत्कार करके यों कहने लगे—'अहो! निश्चय ही आज मेरे कल्याणमय पावन सत्कर्मोंका फल उदय हुआ है, जिससे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ।' उस समय उनके शरीर आनन्दसे परिपूर्ण हो गये थे,

अतः वे परस्पर आलिङ्गन करके एक ही आसनपर विराजमान हुए।

तब परिवने कहा—सखे! तुम्हारे दर्शनसे आज मेरा चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया है। सज्जन-शिरोमणे! पहलेके वे संकोचहीन वार्तालाप, विविध लीलाएँ और विभिन्न चेष्टाएँ बारंबार मेरे स्मृति-पटलपर आ रही हैं, जिससे मुझे परम हर्ष हो रहा है। निष्पाप राजन्! जैसे महर्षि माण्डव्यकी कृपासे तुम्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई है, उसी तरह आराधनाद्वारा प्रसन्न हुए परमात्माके प्रसादसे मुझे भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ है। मित्र! अब तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं है न? तुम मेरुगिरिपर विश्राम करनेवाले भूमण्डलके अधिपतिकी तरह परम कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें विश्रामको प्राप्त हो गये हो न ? परम कल्याणस्वरूप! तुम्हारे चित्तमें आत्मारामताके कारण सदा प्रसन्नता छायी रहती है न ? परम सौभाग्यशाली नरेश ! तुम अत्यन्त