भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३१६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


प्रसन्नता एवं गम्भीरतापूर्ण समदृष्टिसे जनताके कल्याणार्थ कर्तव्यकर्मोंको करते हो न ? तुम्हारे देशमें निवास करनेवाली जनता शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओंसे रहित, धैर्य-सम्पन्न और धन-धान्यसे परिपूर्ण है न ? उसे कोई चिन्ता तो नहीं सताती ? क्या उत्तम फल प्रदान करनेवाली एवं अनेकविध फलोंके भारसे नम्र हुई कल्पलताकी भाँति तुम्हारे राज्यकी भूमि प्रजाजनोंका उनके अभिलषित पदार्थोंकी पूर्तिद्वारा सदा-सर्वदा पोषण करती है ! जैसे चन्द्रमाके किरणजाल सारे भूमण्डलको व्याप्त कर लेते हैं, उसी तरह तुम्हारा पावन यश, जो तुषार-राशिके सदृश निर्मल है, सारी दिशाओंमें फैला हुआ है न ! जैसे सरोवरका जल अपने अंदर रहनेवाले कमल-नालोंकी भूमिको पूर्ण कर देता है, वैसे ही तुमने अपने गुण-गणोंसे सारी दिशाओंको भर दिया है न ? क्या गाँव-गाँवमें धानकी क्यारियोंके कोनोंमें बैठी हुई हर्षित चित्तवाली कुमारियाँ तुम्हारे आनन्दवर्धक यशका गान करती हैं ? तुम्हारे धन-धान्य, ऐश्वर्य, भृत्यवर्ग, पुत्र-कलत्र और नगर आदि सबकी कुशल तो है न ? तुम्हारी यह शरीररूपी लता शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओ-से रहित होकर उस पुण्य नामक फलको उत्पन्न करती है न, जिसकी इहलोक तथा परलोक—दोनोंके लिये शास्त्र आज्ञा देते हैं ? जो तत्त्वज्ञानमें प्रतिबन्धक होनेके कारण महान् शत्रु-तुल्य हैं तथा सर्पके समान विषवत् फल प्रदान करनेवाले हैं, ऐसे इन आपात-रमणीय विषयभोगोंसे तुम्हारा मन विरक्त तो है न ? अहो ! हम दोनोंको वियुक्त हुए बहुत-सा काल व्यतीत हो गया, परंतु कालकी प्रेरणासे आज हम पुनः मिल गये । सखे ! जगत्‌में संयोग-वियोग-जनित सुख-दुःखकी ऐसी कोई अवस्थाएँ हैं ही नहीं, जिनका प्राणियोंको अनुभव न होता हो । इसी नियमके अनुसार हमलोग भी दीर्घकालिक सुख-दुःखकी दशाओंके फेरमें पड़ गये थे, परंतु अब पुनः आ मिले हैं । अहो ! भगवान्‌का कैसा अद्भुत विधान है !

सुरघु बोला—भगवन् ! भगवद्विधानरूप इस नियतिकी गति सर्पकी चालकी तरह बड़ी टेढ़ी है । वह गम्भीर एवं विस्मयजनक है । भला, उसे कौन जान सकता है । उसने ही आपको और मुझे चिरकालतक दूर हटाकर आज पुनः मिला दिया है । अहो ! उस नियतिके लिये क्या असाध्य है ? अर्थात् कुछ नहीं । महात्मन् ! आज आपके शुभागमन-जनित पुण्यके संस्पर्शसे हम सब तरहसे कल्याणके भागी और परम पावन हो गये । राजर्षे ! इस नगरमें हमारी जो सम्पत्तियाँ वर्तमान हैं, वे सभी आज आपके शुभागमनसे सैकड़ों रूपोंमें वृद्धिको प्राप्त हो गयी हैं । महानुभाव ! आपके पुण्यवचन और दर्शन चारो ओरसे मानो राशिश-राशि अमृतरूप मधुर रसायनोंकी वर्षा कर रहे हैं; क्योंकि सत्पुरुषोंका समागम परमपदकी प्राप्तिके समान होता है ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! प्रायः ऐसे ही प्राचीन स्नेहसे ओतप्रोत एवं संकोचहीन वार्तालाप करते हुए राजा परिघ सुरघुके राजसदनमें चिरकालतक स्थित रहे । तदनन्तर उन्होंने सुरघुसे पूछा—'राजन् ! जो समग्र संकल्पोंसे शून्य, विश्रामका परमोत्तम स्थान तथा विक्षेपात्मक दुःखोंकी शान्तिका परम साधन है, उस कल्याणकारिणी समाधिका अनुष्ठान तो तुम करते हो न ?

सुरघुने कहा—प्रभो ! आप मुझसे 'सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित परम शान्ति ही कल्याणप्रद है' ऐसा तो कहिये, परंतु समाधिके लिये क्यों कहते हैं ? क्योंकि महात्मन् ! जो तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष है, वह चाहे समाधिस्थ रहे चाहे व्यवहार करे, उसका तो स्वरूप ही सदा समाधिस्थ-सा हो जाता है । वह कभी असमाहित चित्तवाला हो ही नहीं सकता । जिनका चित्त प्रबुद्ध हो गया है, ऐसे तत्त्वज्ञानी महात्माओंकी आत्मारूपी अद्वितीय तत्त्वमें परम निष्ठा हो जाती है, इसलिये वे सांसारिक व्यवहारोंको करते हुए भी सदा-