भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का संवाद * ३१७

सर्वदा समाधिसम्पन्न ही बने रहते हैं। परन्तु जिसका अन्तःकरण चञ्चल होनेके कारण विश्रामको नहीं प्राप्त हुआ है, वह चाहे पद्मासन बाँधे चाहे परब्रह्मको अञ्जलि समर्पित करे, उसकी कोई समाधि कैसे लग सकती है। भगवन् ! मौन होकर बैठे रहना ही समाधि थोड़े ही है। समाधि तो परमात्मतत्त्वके उस यथार्थ ज्ञानको कहते हैं, जो सम्पूर्ण आशारूपी घास- फूसको भस्म करनेके लिये अग्निरूप है। साधो ! परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन उस तीक्ष्ण और अचल परा प्रज्ञाको ही समाधि कहते हैं, जो एकाग्र, सदा-सर्वदा तृप्त और सत्य अर्थको ग्रहण करनेवाली है। एवं जो प्रज्ञा क्षोभरहित, अहंकारशून्य, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे पृथक् रहनेवाली तथा मेरुसे भी बढ़कर स्थिरतायुक्त है, उसे समाधि कहते हैं। जो मनःस्थिति चिन्ताशून्य, अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त करनेवाली, ग्रहणोपादानसे रहित तथा सच्चिदानन्द परमात्मभावसे परिपूर्ण है, उसके लिये समाधि-शब्दका व्यवहार किया जाता है। जब मन तत्त्वज्ञानके साथ सदाके लिये अत्यन्त सम्बद्ध हो जाता है, तबसे ज्ञानी महात्माकी समाधि सदा बनी रहती है, उसका कभी विच्छेद नहीं होता। जैसे सूर्य दिनभर प्रकाशसे विश्राम नहीं लेता, अपितु प्रकाश- पूर्ण ही रहता है, उसी तरह तत्त्वज्ञानीकी प्रज्ञा जीवन- पर्यन्त परमात्म-तत्त्वके यथार्थ अवलोकनसे विश्राम नहीं लेती, अपितु सदा-सर्वदा परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे परिपूर्ण रहती है। जैसे नदी निरन्तर बेरोक-टोक जलकी धारा बहाती रहती है, उसी तरह महात्माकी विज्ञानमयी दृष्टि क्षणमात्रके लिये भी परमात्माके स्वरूपज्ञानसे विरत नहीं होती, अपितु सदा-सर्वदा एकरस बनी रहती है। जैसे काल अपने क्षण आदि कलाओंकी गतिको कभी नहीं भूलता, उसी तरह तत्त्वज्ञानी पुरुषकी बुद्धि अपने आत्मस्वरूपका कभी विस्मरण नहीं करती। तथा जैसे सर्वत्र गमन करनेवाले वायुदेवको सदा अपनी गतिका

ध्यान बना रहता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि निश्चय करने योग्य विज्ञानानन्दघन परमात्माका सतत चिन्तन करती रहती है। जैसे जिस पदार्थकी सत्ताका विनाश हो जाता है, उसकी पुनः उपलब्धि नहीं होती, उसी तरह तत्त्वज्ञानीका समय परमात्माके ज्ञानसे विहीन होकर कभी उपलब्ध नहीं होता। अर्थात् वह सदा परमात्माके ध्यानमें ही रचा-पचा रहता है। जैसे संसारमें गुणवानोंका गुणहीन होना असम्भव है, उसी तरह आत्मज्ञानी महात्मा कभी भी परमात्माके ज्ञानसे विहीन नहीं रह सकता। मैं सदा-सर्वदा ही परमात्मज्ञानसे सम्पन्न, परमशुद्धस्वरूप, शान्तात्मा और समाहितचित्त हूँ; ऐसी दशामें मेरा समाधिसे विच्छेद किसके द्वारा और कैसे हो सकता है। क्योंकि मेरी समाधि परमात्माके स्वरूपसे भिन्न नहीं है, अतः उस परमात्मस्वरूप समाधि- का अस्तित्व नित्य ही बना हुआ है। जब यह जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, वह सारा-का-सारा सदा सब प्रकारसे सर्वव्यापक परमात्मस्वरूप ही है, तब किसे समाधि कहा जाय और किसे असमाधि ?

तब परिघने कहा—राजन् ! निश्चय ही तुम्हें परमात्माके यथार्थ रूपका ज्ञान प्राप्त हो गया है और उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्मरूप परमपदकी प्राप्ति भी हो चुकी है। इसीलिये तुम्हारा अन्तःकरण परमशान्तिरूप शीतलता- से युक्त हो गया है, जिससे तुम पूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे हो। महाराज ! इस समय स्नेहके कारण अत्यन्त मधुर, शीतल, आनन्दरूपी पुष्परससे परिपूर्ण एवं उत्तम श्रीसे सम्पन्न होनेके कारण तुम्हारी शोभा कमल-जैसी हो रही है। तुम्हारा चित्त निर्मल, विस्तृत, परिपूर्ण, गम्भीर और विशद आशयवाला है; इससे तुम्हारी वैसी ही शोभा हो रही है, जैसी तटवर्ती झंझावातसे मुक्त हुए शान्त समुद्रकी होती है। जैसी शोभा शरत्कालीन निर्मल आकाश धारण करता है, वैसे ही तुम भी स्वच्छ, आनन्दसे परिपूर्ण, अहंकाररूपी

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