भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 750 में से

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३१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बादलोंसे रहित, स्पष्ट, विस्तीर्ण और अत्यन्त गम्भीर होनेके कारण शोभित हो रहे हो। राजन् ! तुम सर्वत्र अपने स्वरूपमें समभावसे स्थित दीख पड़ते हो, सर्वत्र पूर्णतया संतुष्ट हो और किसी विषयमें तुम्हारी आसक्ति नहीं रह गयी है; इसलिये सर्वत्र तुम्हारी शोभा हो रही है। तुम अपनी उत्तम बुद्धिसे सार-असारका निर्णय करके उसके झमेलेसे पार हो गये हो तथा तुम्हें इसका भी ज्ञान हो चुका है कि यह जो कुछ दृश्य-प्रपञ्च है, वह सारा-का-सारा अखण्ड परब्रह्म परमात्मा ही है।

सुरघु बोला—मुने ! संसारमें ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जिससे ग्रहण करनेके लिये हमारे मनमें अभिलाषा हो; क्योंकि यह जितना दृश्य-प्रपञ्च है, यह सभी कुछ नहीं है अर्थात् मिथ्या है। त्रिलोकीमें जो ये स्त्रियाँ, पर्वत, समुद्र, वनश्रेणियाँ आदि पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये सभी वास्तविकतासे शून्य हैं; क्योंकि वास्तवमें इस जगत्-में कोई सारभूत वस्तु है ही नहीं। इस मांस और अस्थिमय शरीरमें तथा काष्ठ, मिट्टी और शिलामय जगत्में जो जर्जर, अवाञ्छनीय और अभावरूप है, किस वस्तुकी इच्छा की जाय? अर्थात् इनमें कुछ भी वाञ्छनीय नहीं है। इस विषयमें अब विशेष कुछ कहना आवश्यक नहीं दीख पड़ता; क्योंकि यदि मन रागरूप रससे रहित तथा समभावमें नित्य स्थित एवं आत्मस्वरूप ही परितृप्त है तो वही सर्वोत्तम स्थिति है। अतः परमानन्दकी प्राप्तिके लिये केवल इसी दृष्टिका सदा-सर्वदा आश्रय ग्रहण करना उचित है।

( सर्ग ६१-६३ )


आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायोंका कथन तथा भास और विलास नामक तपस्वियोंके वृत्तान्तका आरम्भ

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यों तत्त्वज्ञ सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिघ ) दोनो जगद्भ्रमका विचार करके परम प्रसन्न हुए । उन्होने एक-दूसरेका आदर-सत्कार किया और फिर वे अपने-अपने कार्यमें तत्पर होकर अभीष्ट स्थानको चले गये। ज्ञानी महापुरुषों के साथ विचार-विमर्श करनेके कारण अत्यन्त तीव्र हुई उत्तम बुद्धिद्वारा जिसके हृदयाकाशमें अहंकाररूपी काले मेघोंका सर्वथा अभाव हो गया है, शरत्कालीन निर्मल आकाशकी तरह जिसका विस्तृत चित्त समस्त लोगोंद्वारा अनुमोदित, फलात्मक बोधसे युक्त, आह्लादजनक एवं रागादि मलोंसे रहित हो गया है, जो ध्यान करने एवं शरण लेनेयोग्य, सुगम, सम्पूर्ण आनन्दोंकी निधि, अत्यन्त प्रसन्न विज्ञानानन्दघन परमात्मामें स्थित रहता है और जो नित्य परमात्माके विचारमें निरत, सदा अन्तर्मुखी वृत्तिसे युक्त, सुखी तथा नित्य चिन्मय परमात्माका अनुसंधान करनेवाला है, उसे मानसिक शोक कभी बाधा नहीं पहुँचा सकते। जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, भीतरसे परमशान्तियुक्त एवं मननशील महात्मा है, उसे मन क्लेश नहीं दे सकता—ठीक उसी तरह, जैसे हाथी सिंहको बाधा नही पहुँचा सकता। ज्ञानीका अन्तःकरण तो अत्यन्त विशाल होता है; क्योंकि वह केवल विषय-भोगोंकी शरण लेनेवाला और दीन नहीं होता। ज्यों ही 'अविद्या असत् है' यों अविद्याके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हुआ, त्यों ही उसका सदा-सर्वदाके लिये अभाव हो जाता है—जैसे स्वप्नका ज्ञान हो जानेपर स्वप्नदृष्ट भोग-भूमिका सर्वथा विनाश हो जाता है। जिसकी बुद्धि विषयोंकी आसक्तिसे रहित और केवल विज्ञाना-नन्दघन परमात्मामें नित्य स्थित है, उस श्रेष्ठ'महापुरुषको व्यवहारपरायण रहनेपर भी पाप स्पर्श नहीं कर सकता। जब चेतन परमात्माके देदीप्यमान प्रकाशका उदय होता है, तब अज्ञानरूपी रात्रि विनष्ट हो जाती है और ज्ञानीकी परमानन्दको प्राप्त हुई बुद्धि प्रकाशित हो उठती है।

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