संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायोंका कथन * ३१९
सत्-शास्त्रज्ञानरूपी सूर्यद्वारा प्रबोधित मनुष्यकी अज्ञान-निद्राका जब सर्वथा विनाश हो जाता है, तब उसे परमात्मविषयक उस यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति होती है, जिसे पा लेनेपर फिर कभी मोह नहीं होता। उन्हीं दिनोंका जीवन वास्तवमें सफल है और वे ही क्रियाएँ सच्चे आनन्दसे युक्त हैं, जिन दिनों और जिन क्रियाओंमें हृदयाकाशमें परमात्मारूपी चन्द्रमाके उदय होनेसे चेतनारूपिणी चाँदनी खिल रही हो। मोहका अतिक्रमण कर लेनेवाला मनुष्य निरन्तर आत्मचिन्तनके प्रभावसे अपने अन्तःकरणमें उसी प्रकार शीतलताको प्राप्त कर लेता है, जैसे चन्द्रमा अपने अंदर वर्तमान अमृतसे सदा शीतल बना रहता है। वे ही मित्र सच्चे मित्र हैं, वे ही शास्त्र सत्-शास्त्र हैं और वे ही दिन शुभ दिन हैं, जिनके सहयोगसे वैराग्यरूपी उल्लाससे युक्त परमात्मविषयक चित्तका अभ्युदय स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है। जिनके पाप क्षीण नहीं हुए हैं और जो परमात्माकी प्राप्तिकी उपेक्षा करते हैं, वे जन्मरूपी जंगलके गुल्म हैं, दीन हैं और उन्हें चिरकालतक दुःखोंके लिये शोक करना पड़ता है।
श्रीराम ! जीवात्मा एक बैलके समान है। बुढ़ापेने इसके शरीरको जर्जरित कर दिया है, जिससे यह शोकजनित उच्छ्वाससे विडम्बित हो रहा है। यह आशारूपी सैकड़ों पाशोंसे जकड़ा हुआ है, फिर भी भोगरूपी घासके लिये इसके मनमें उत्कृष्ट लालसा भरी है। यह अपनी पीठपर दुःखका भारी बोझ लिये हुए जन्मरूपी जंगलमें भटक रहा है और सारे शरीरमें कुकर्मरूपी कीचड़ लपेटे हुए मोह-जलाशयमें लोट रहा है। रागकी दन्तपङ्क्तियाँ इसे चबाये डालती हैं और तृष्णारूपी नाथसे यह खींचा जा रहा है। मनरूपी वणिक्ने इसपर अधिकार जमा रखा है। यह बन्धु-ममतारूपी बन्धनमें बँधा होनेके कारण चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गया है। पुत्र-कलत्रकी ममताजनित जीर्णतारूपी दलदलमें यह बुरी तरह फँस गया है। लंबे रास्तेपर चलनेके कारण इसका मन टूट गया है और विश्राम न मिलनेसे यह थक गया है, जिससे अब इसके चलने-फिरनेकी शक्ति क्षीण हो गयी है। संसाररूपी अरण्यमें चक्कर काट रहा है, फिर भी परम शान्तिरूप शीतल छाया इसे नसीब नहीं हुई; उल्टे यह विषय-संसर्गजनित तीव्र तापसे संतप्त हो उठा है। बाह्य इन्द्रियाँ इसे आक्रान्त किये हुए हैं, जिससे ऊपरसे तो इसका आकार सुन्दर है किंतु अन्तःकरण दीन हो गया है। इसके गलेमें लटकते हुए कर्मरूपी घंटेका शब्द हो रहा है। यह जन्म-मरणरूपी गाड़ीके बोझसे लदा हुआ अज्ञानके विकट वनमें लोट रहा है, ऊपरसे पापरूपी कोड़ोंकी मार पड़ रही है, जिससे इसका शरीर भग्न हो गया है। अनर्थोंमें ही सदा निमग्न रहनेसे दुखी, दीन और शिथिल अङ्गवाला यह कर्मोंके भारी भारसे पीड़ित होकर करुण-क्रन्दन कर रहा है। अतः चिरकालतक उत्तम यत्नका आश्रय लेकर परमात्मविषयक ज्ञानरूपी बलके सहारे इसका संसाररूपी जलाशयसे उद्धार करना चाहिये।
राघव ! परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे जब चित्त विनष्ट हो जाता है, तब जीवात्मा पुनः संसारमें कभी जन्म नहीं लेता; क्योंकि वह तो उसी समय संसार-सागरसे पार हो जाता है। श्रीराम ! जैसे समुद्रको पार करनेके लिये नाविकसे जहाज प्राप्त होता है, उसी तरह ज्ञानी महात्मा पुरुषोंके सङ्गसे संसार-सागरको लाँघ जानेकी युक्ति ज्ञात हो जाती है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह मरुस्थलकी भाँति जिस देशमें परम शान्तिरूपी शीतल छाया और मोक्षरूपी फलसे सम्पन्न तत्त्वज्ञ महापुरुषरूपी वृक्ष न हों, वहाँ निवास न करे। श्रीराम ! कोमल और शान्तिप्रद वचन ही जिसके पत्ते हैं, सच्चरित्रता ही जिसकी छाया है, मुस्कान ही जिसके पुष्प हैं—ऐसे महापुरुषरूपी चम्पाके वृक्षके नीचे जानेसे उनके सङ्गके प्रभावसे क्षणभरमें ही आत्यन्तिक विश्राम प्राप्त हो जाता है। मनुष्य स्वयं ही