संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * भास और विलासकी परस्पर बातचीत * ३२१
रहते हैं और चोटियोंपर सिंह दहाड़ते रहते हैं । उसी सह्य पर्वतके उत्तर-तटवर्ती शिखरपर, जहाँ फलोंके भारसे झुके हुए वृक्ष सुशोभित हैं, महर्षि अत्रिका अत्यन्त शोभाशाली विशाल आश्रम है । वह आश्रम सिद्धोंके श्रमका अपहरण करनेवाला, ब्रह्मलोकके समान उत्कृष्ट, स्वर्ग-तुल्य रमणीय और शिवजीके नगर कैलासके समान शोभासम्पन्न है । उसी विशाल आश्रममें शुक्र और बृहस्पति नामके दो तपस्वी रहते थे, जो आकाशमार्गमें विचरण करनेवाले शुक्र और बृहस्पतिके समान शास्त्रोंके ज्ञाता थे । कुछ समय बाद एक ही स्थानमें रहनेवाले उन दोनों तपस्वियोंके पवित्र शरीरवाले दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम थे—विलास और भास । वे दोनों बालक उस आश्रममें पिताओंद्वारा लगाये हुए लता-वृक्षोंके लंबे-लंबे पल्लवोंकी तरह क्रमशः बढ़ने लगे । वे दोनों मित्र थे। उनके मनमें एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त स्नेह था, जिससे वे परस्पर प्रेम रखते थे और एक-दूसरेसे मिल-जुलकर रहते थे । उन दोनोंका मन समान होनेके कारण ऐसा प्रतीत होता था मानो एक ही मनने दो भागोंमें विभक्त होकर दो शरीर धारण कर लिये हैं । इस तरह वहाँ रहते हुए उन दोनोंने थोड़े ही समयमें बचपनको लाँघकर युवावस्थामें प्रवेश किया । तदनन्तर जैसे दो पक्षी अपने-अपने घोंसलेसे उड़कर अन्यत्र चले जायँ, उसी तरह उनके वे दोनों पिता (शुक्र और बृहस्पति) बुढ़ापेसे दुखी हो शरीरका परित्याग करके स्वर्गको चले गये । पिताओंकी मृत्यु हो जानेपर उन दोनोंका मुख जलसे निकाले गये कमलकी तरह दीन हो गया, शरीर संतप्त हो गया और उत्साह जाता रहा । वे व्यथासे अभिभूत हो गये । तदनन्तर वे पिताओंकी और्ध्वदेहिक क्रिया सम्पन्न करके पितृशोकजनित करुणापूर्ण आर्त वाणीसे विलाप करने लगे ।
( सर्ग ६४-६५ )
भास और विलासकी परस्पर बातचीत और तत्त्वज्ञानद्वारा उन्हें मोक्षकी प्राप्ति; देह और आत्माका सम्बन्ध नहीं है तथा आसक्ति ही बन्धनका हेतु है—इसका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार वे दोनों सुदृढ तपस्वी भास और विलास पिताके मृत्यु-जनित शोकसे पराभूत होकर स्थित थे । उस शोकजनित संतापसे उनके शरीर सूखकर काँटा हो गये थे और ऐसे लगते थे, जैसे ग्रीष्म ऋतुके प्रचण्ड तापसे आमूल-चूल सूखे हुए दो जंगली वृक्ष हों । उन्हें सांसारिक पदार्थोंसे परम वैराग्य हो गया था, अतः वे दोनों ब्राह्मण झुंडसे बिछुड़े हुए दो मृगोंकी भाँति वियुक्त होकर उस जंगलमें कालक्षेप करने लगे । इस प्रकार क्रमशः उनके दिन मास और वर्ष बीतते गये । अन्ततोगत्वा उन्हें बुढ़ापेने घेर लिया; परंतु उन्हें विशुद्ध ज्ञानकी प्राप्ति न हुई चिरकालके पश्चात् एक समय प्रारब्धवश उन दोनों