भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


बिछुड़े हुए वृद्ध तापसोंकी परस्पर भेंट हो गयी, तब वे परस्पर यों कहने लगे ।

विलासने कहा—मित्रवर भास ! इस जगत्‌में तुम्हीं मेरे परम प्रेमी बन्धु, मेरे जीवनरूपी उत्तम वृक्षके फल और सदा-सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करनेवाले अमृतके सागर हो; तुम्हारा स्वागत है । सज्जनशिरोमणे ! पहले यह तो बताओ, मुझसे अलग होकर तुमने इतने दिन कहाँ व्यतीत किये ? तुम्हारी तपस्या तो सफल हुई है न ? क्या तुम्हारी बुद्धि संसारविषयक संतापसे रहित हो गयी ? तुम्हारी विद्या फलवती हो गयी है न ? क्या तुमने परमात्माको प्राप्त कर लिया ? तुम सकुशल तो हो न ?

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तब जिसे परमात्म-विषयक यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई थी तथा जो संसारसे पूर्णतया उद्विग्न हो गये थे, उन अपने मित्र विलासके यों कहनेपर परम हितैषी भासने उनसे आदर-पूर्वक कहना आरम्भ किया ।

भास बोले—दूसरोंको मान देनेवाले साधो ! स्वागतता तो आज ही चरितार्थ हुई है; क्योंकि सौभाग्यवश मुझे तुम्हारा दर्शन प्राप्त हो गया । किंतु मित्रवर ! इस दुःखमय संसारमें चक्कर काटनेवाले हम लोगोंकी कुशल कहाँ ? भला, जबतक मुझे जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, मेरे मनमें उत्पन्न होनेवाले संकल्प आदि नष्ट नहीं हुए और मैंने संसारसागरको पार नहीं कर लिया, तबतक मेरी कुशल कहाँ । जबतक चित्तमें उत्पन्न होनेवाली आशाएँ तीव्र वैराग्यरूप शस्त्रके द्वारा पूर्णतया काटी नहीं गयीं, तबतक हमलोगोंकी कुशल कहाँ ? जबतक परमात्माका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ और जबतक समता उद्भूत नहीं हुई तथा जबतक विवेक नहीं उत्पन्न हुआ, तबतक हमलोगोंकी कुशल कहाँ । सज्जनशिरोमणे ! परमात्माकी प्राप्ति तथा ज्ञान-रूपी महौषधके बिना यह जन्म-मरणरूपी दुष्ट महामारी बारंबार प्राप्त होती ही रहती है । यह जीवात्मा लौकिक क्रियाओंमें तथा देहरूपी पर्वतकी उन अत्यन्त भीषण कन्दराओंमें, जो विषयोपभोगरूप भयंकर सर्पोंसे व्याप्त एवं तृणारूपी कण्टकोंसे आच्छादित हैं, सदा-सर्वदा लोटता रहता है । यों कुत्सित आशाओंके आवेशसे युक्त व्यर्थ क्रियाकलापोंके करते रहनेसे इसकी आयु वृथा ही नष्ट हो जाती है । यह मन एक मदमत्त गजराजके समान है, जिसने परमात्मामें बन्धनके हेतुभूत विवेकरूपी आलानको उखाड़ डाला है और जो तृष्णारूपिणी हथिनिमें कामासक्त होनेके कारण उद्विग्न हो उठा है, अतः वह जगत्‌में दूरसे दूर भटकता रहता है । जैसे राजहंस सूखे हुए सरोवरसे तत्क्षण ही भाग खड़ा होता है और फिर कभी उसकी ओर ताकता तक नहीं, उसी तरह जिसका यौवनरूपी जल नष्ट हो गया है, उस सूखते हुए शरीररूपी सरोवरसे आयु तत्काल पलायन कर जाती है, पुनः वह कभी लौटती ही नहीं । जब