संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * भास और विलासकी परस्पर बातचीत * ३२३
यह जीवन-वृक्ष जर्जर हो जाता है और कालरूपी वायु उसे बलपूर्वक झकझोरता है, तब उसके भोगरूपी पुष्प और दिनरूपी पत्ते झड़कर नीचे गिर जाते हैं अर्थात् नष्ट हो जाते हैं। परंतु नाना प्रकारके अनुरागोंसे लिपटी हुई यह तुच्छ चञ्चल तृष्णा देवालयोंके ऊपर फहराती हुई पताकाकी भाँति अधिकाधिक बढ़ती रहती है। बन्धुसमूहरूपी ये असंख्य सरिताएँ गम्भीर कोटर-वाले विस्तृत काल-सागरमें निरन्तर गिरती रहती हैं। तात ! यह देहरूपी रत्नशलाका विनाशरूपी कीचड़-से परिपूर्ण सागरके गर्भमें न जाने कहाँ समा गयी है कि जन्म-जन्मान्तरमें भी इसका पता नहीं चलता। चिरकालसे चिन्ताचक्रमें बँधा हुआ तथा पाप कर्मोंके आचरणमें संलग्न चित्त समुद्रके गम्भीर आवर्तमें पड़कर चक्कर काटते हुए तृणकी भाँति संसारमें भटकता रहता है। इसे कार्यरूपी असंख्यों विशाल तरङ्ग उछालती रहती हैं तथा चिन्ताके फेरमें पड़कर यह ताण्डव नृत्य करता रहता है, जिससे इसे क्षणभर भी विश्राम नहीं मिलता। 'मैंने इसे कर लिया, यह करता हूँ और आगे उसे करूँगा' इस प्रकारकी कल्पनाओंके जालमें फँसकर इस मनुष्यकी बुद्धिरूपी पक्षिणी अत्यन्त मोहित हो जाती है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! उन दोनोंने परस्पर एक-दूसरेका कुशल-समाचार पूछा। तदनन्तर काल-क्रमसे विवेकपूर्वक ध्यानके अभ्यास और संसारसे वैराग्यके द्वारा परमात्माका विशुद्ध ज्ञान लाभ करके वे दोनों मोक्षको प्राप्त हो गये। महाबाहो ! इसीलिये मैं कहता हूँ कि सांसारिक पाशसे जकडे हुए चित्तको संसार-सागरसे पार होनेके लिये परमात्माके यथार्थ ज्ञान-के अतिरिक्त और कोई दूसरा सुगम उपाय नहीं है। यह उपर्युक्त दुःख यद्यपि अज्ञानीके लिये अनन्त है तथापि ज्ञानी पुरुषके लिये वह अत्यन्त साधारण है—ठीक उसी तरह, जैसे सागर तुच्छ पक्षीके लिये दुस्तर होते हुए भी गरुड़के लिये गौकी खुरीके जलके समान ही प्रतीत होता है। जैसे दर्शक पुरुष दूरसे ही जनसमूह-का अवलोकन करता है, किंतु उसके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता, उसी तरह जो देहाभिमानसे रहित तथा विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें एकी-भावसे स्थित हैं, वे ज्ञानी महात्मा पुरुष साक्षीभूत होकर दूरसे ही शरीरको देखते रहते हैं। इसलिये भले ही देह दु खसे भलीभाँति क्षुब्ध हो जाय, उससे आत्माको कौन-सी क्षति पहुँचती है ? शोभाशाली राम ! भला हिमालय पर्वत और समुद्रका क्या सम्बन्ध ! उसी तरह आत्मा और संसाररूप बन्धनका भी वास्तवमें परस्पर क्या सम्बन्ध है? अर्थात् कुछ नहीं है। जैसे सरिताओंका जल कमलोंको अपनी गोदमें धारण किये रहता है, फिर भी वे कमल उस जलसे कोई सम्बन्ध न रखकर निर्लेप बने रहते हैं, उसी तरह इस जगत्में शरीरका भी आत्माके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सुख-दुःख आदिके अनुभव केवल शुद्ध चेतन आत्मा और केवल जड देह-को नहीं होते, किंतु देह और आत्माके तादात्म्यके कारण होते हैं। अतः जब यथार्थ ज्ञानके द्वारा अज्ञानका नाश हो जाता है, तब सुख-दुःखोंका अत्यन्ताभाव होकर केवल शुद्ध चेतन आत्मा ही शेष रह जाता है। अज्ञानी पुरुष जिस रूपमें इस संसारको देखता है, वह उसी रूपमें उसे सत्य मान लेता है; परंतु ज्ञानीके लिये वैसी बात नहीं है। वह उसी रूपमें संसारको सत्य नहीं मानता; क्योंकि वह समझता है कि यह संसार अज्ञानसे ही प्रतीत होता है।
जैसे वास्तवमें सम्बन्ध न होनेपर भी स्वप्नमें स्त्रीके साथ रति-क्रीडा आदि व्यापारमें सम्बन्ध-सा हो जाता है तथा जैसे वास्तविक प्रेत न होनेपर भी अँधेरेमें ठूंठ प्रेत-सा दीखने लग जाता है, उसी तरह यद्यपि वास्तव-में आत्माके साथ देहादिका सम्बन्ध नहीं है, फिर भी अज्ञानके कारण सम्बन्ध-सा दीखता है। वस्तुतः तो