भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

शरीर और शुद्ध आत्माका सम्बन्ध मिथ्या ही है; क्योंकि इनका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। विद्वानोंका कथन है कि देहमें अहम्भावना करनेसे ही आत्मा दैहिक दुःखोंके वशीभूत होता है तथा उस देहभावनाका त्याग कर देनेसे वह उस दुःखजालसे मुक्त हो जाता है। वत्स राम! जैसे सरोवरमें गिरे हुए पत्ते, जल, मल और काष्ठ यद्यपि परस्पर सम्बद्ध रहते हैं, तथापि भीतरी सङ्गसे रहित होनेके कारण वे दुखी नहीं होते, उसी तरह यद्यपि आत्मा, देह, इन्द्रिय और मन परस्पर पूर्णतया सम्बद्ध हैं, तथापि अन्तःकरणमें अहंता, ममता और आसक्तिका अभाव होनेके कारण ज्ञानी महात्मा सदा-सर्वदा दुःखरहित ही रहते हैं। श्रीराम ! अन्तःसङ्ग अर्थात् अहंता, ममता और आसक्ति ही संसारमें समस्त प्राणियोंके जरा, मरण और मोहरूपी वृक्षोंका मूल कारण है। जो जीव अहंता, ममता और आसक्तिसे युक्त है, वह भवसागरमें डूबा हुआ है; परंतु जो इनसे मुक्त हो गया है, वह समझ ले कि मैं संसार-सागरसे पार हो गया। जो चित्त विषयोंकी आसक्तिसे रहित और निर्मल है, वह संसारी होते हुए भी निस्संदेह मुक्त है; परंतु विषयासक्त चित्त दीर्घकालकी तपस्यासे युक्त होता हुआ भी कामनाके कारण सुदृढ़ बन्धनसे बँधा हुआ है। जैसे काष्ठभारोंको पार उतारनेवाली जलस्थित नौका जलके गुण-दोषसे लिपायमान नहीं होती वैसे ही अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित पुरुष शरीर यात्राके लिये न्याययुक्त कर्म करता हुआ भी कर्तृत्वसे लिप्त नहीं होता। जो मनुष्य अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित तथा परम मधुर परमात्मामें नित्य स्थित है, वह बाहरसे कुछ भी कार्य करे अथवा न करे, किसी भी दशामें वह कर्ता अथवा भोक्ता नहीं है।
(सर्ग ६६-६७)


संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद, उनके लक्षण और फलका वर्णन; आसक्तिके त्यागसे जीवात्मा कर्मफलसे सम्बद्ध नहीं होता—इसका कथन

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! किस प्रकारका सङ्ग मनुष्योंके लिये मोक्षदायक कहा गया है और कैसा सङ्ग बन्धनका हेतु होता है एवं उसके बन्धनका निमित्त बननेमें कारण क्या है तथा बन्धनके हेतुभूत उस सङ्गकी निवृत्ति कैसे की जा सकती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! शरीर—क्षेत्र और शरीरी—क्षेत्रज्ञ आत्माका जो विभाग है अर्थात् शरीर जड है और आत्मा चेतन है—ऐसा जो अनुभव है, उसके अभावमें केवल देह ही आत्मा है, ऐसी भावनासे उत्पन्न देहाभिमान ही सङ्ग है और वही बन्धनका हेतु कहा जाता है। तथा देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न होनेके कारण आत्माका स्वरूप अनन्त है; किंतु अज्ञान-वश उसमें परिच्छिन्नताका निश्चय हो जानेपर जीव अपने अंदर जो सुखकी चाह करने लगता है, वही सङ्ग है और वही बन्धनका कारण कहा जाता है। यह दृश्यमान सम्पूर्ण संसार परमात्माका संकल्प होनेके कारण परमात्माका स्वरूप है, तब फिर मैं उसमेंसे किसकी चाह करूँ और किसको त्याग दूँ—इस प्रकारकी धारणासे उत्पन्न होनेवाली जो जीवन्मुक्तकी अवस्था है, उसे तुम असङ्ग स्थिति समझो। न तो मैं ही हूँ और न दूसरा ही कुछ है; अतः विषयोंसे उत्पन्न सुख हों अथवा न हों—ऐसा निश्चय करके जिसका अन्तःकरण अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित हो गया है, वह मनुष्य मुक्तिका अधिकारी कहलाता है। जो निष्कर्मभावकी प्रशंसा नहीं करता, किसी भी कर्ममें आसक्त नहीं होता, सबमें समभाव रखता है और कर्मफलोंकी इच्छासे रहित है, वही पुरुष असंसक्त कहा जाता है। केवल परमात्माके स्वरूपमें अटल स्थितिवाले जिस महात्माका