संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद, उनके लक्षण और फल * ३२५
मन हर्ष, शोक और ईर्ष्याके वशीभूत नहीं होता, वही असक्त है और उसीकी 'जीवन्मुक्त' संज्ञा होती है। जो मनुष्य सम्पूर्ण कर्मों और उनके फल आदिका कर्मसे नहीं, अपितु केवल मनसे भलीभाँति त्याग कर देता है, वह असंसक्त कहलाता है।
रामजी ! वृक्ष एक स्थानपर स्थित रहकर अपने स्थावर शरीरसे जो शीत, वात और घामके क्लेशोंको सहता रहता है, वह उसके पूर्व जन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। पृथ्वीकी दरारमें पड़ा हुआ कीड़ा अङ्गोके पीड़ित होनेके कारण विकल होकर जो कालक्षेप करता है, वह उसके पूर्वजन्मके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। जिसका पेट भूखके कारण दुर्बल होकर पीठसे सट गया है तथा बूंदके आघातके भयसे सदा भीत बनी रहती है, ऐसा पक्षी जो वृक्षकी शाखाओंपर निवास करता हुआ कालयापन करता है, वह उसके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। दूर्वाङ्कुरों और तिनकोंका आहार करनेवाला मृग किरातोंके बाणोंकी चोटसे पीडित होकर जो मर जाता है, वह उसके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। ये असंख्य भूत-प्राणी जो नदीमें तरङ्गोंकी भाँति बारंबार उत्पन्न होकर पुनः विलीन हो रहे हैं, यह उनके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। लता और तिनकोंके समान शक्तिहीन दशाको प्राप्त हुए मनुष्य चलने-फिरनेकी शक्तिसे शून्य होकर जो बारंबार मरते रहते हैं, उसका कारण उनके पूर्वजन्ममें अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका फल ही है।
राघव ! यह आसक्ति दो प्रकारकी कही गयी है— एक वन्द्या अर्थात् प्रशस्त और दूसरी वन्ध्या अर्थात् पुरुषार्थफलसे शून्य। इनमें तत्त्वज्ञ महात्माओंकी अपने
सं० यो० व० अं० १२—
स्वरूपमें आसक्ति वन्द्या है और वन्ध्या आसक्ति सर्वत्र अज्ञानियोंकी है। जो आसक्ति आत्मतत्त्वके ज्ञानसे शून्य, देह आदि असत्य वस्तुओंसे उत्पन्न और बारंबार संसारमें सुदृढ़रूपसे स्थित है, वह वन्ध्या कही जाती है तथा जो आसक्ति आत्मतत्त्वके ज्ञानद्वारा यथार्थ विवेकसे उत्पन्न हुई है और पुनर्जन्मका कारण नहीं है, उसे लोग वन्द्या कहते हैं। यह वन्द्या आसक्तिका ही प्रभाव है, जो आत्मतत्त्वके विज्ञानमें कुशल सिद्धगण, लोकपाल तथा अन्यान्य मुक्त पुरुष इस जगत्के प्राङ्गणमें अध्यात्म-विषयकी प्रीतिसे युक्त होकर स्थित रहते हैं। अन्यान्य भुवनोंमें निवास करनेवाले अध्यात्मविषयकी प्रीतिसे युक्त तत्त्वज्ञ महात्मालोग जो जन्म-मरणसे रहित शरीररूपी यन्त्रसमूहोंको धारण करते हैं, वह भी वन्द्या आसक्तिकी ही सामर्थ्य है। किंतु वन्ध्या आसक्तिके वशीभूत होनेसे मन विषयभोगोंमें व्यर्थ ही रमणीयताकी कल्पना करके उनपर उसी प्रकार टूट पड़ता है, जैसे गीध मांसके टुकड़ोंपर झपटता है। वन्ध्या आसक्तिके प्रभावसे ब्रह्माण्डरूपी गूलरके फलके अंदर मच्छरकी तरह स्फुरित होते हुए देवता स्वर्गलोकमें, मनुष्य मृत्युलोकमें और नाग तथा असुर पातालमें स्थित हैं। ये असंख्य प्राणी जो नदीमें तरङ्गोंकी भाँति जन्मते हैं, मरते हैं, गिरते हैं और उठते हैं—यह भी वन्ध्या आसक्तिका ही चमत्कार है। यह भी वन्ध्या आसक्तिका ही प्रताप है, जो ये भूत-प्राणी झरनोंके जलकणोंकी तरह बारंबार उत्पन्न होकर पुनः विरसतापूर्वक नष्ट हो रहे हैं।
श्रीराम ! शून्य आकाशमें केवल मनकी आसक्तिरूपी रंगसे संकल्पपूर्वक जो यह जगद्रूपी चित्र बनाया गया है, वह कभी भी सत्य नहीं हो सकता। इस संसारमें आसक्तिपूर्ण मनसे व्यवहार करनेवाले मनुष्योंके शरीरोंको तृष्णा उसी प्रकार क्षीण करती रहती है, जैसे अग्निकी लपट तृणोंको भस्मसात् कर देती है। जैसे समुद्र-तटकी सिकताओं और