भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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३२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


त्रसरेणु-समूहोंकी संख्या करना असम्भव है, उसी तरह जिसकी बुद्धि सर्वथा विषयोंमें आसक्त है, भला, उसके शरीरोंकी ठीक-ठीक गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ! अर्थात् कोई नहीं। राघव ! विषयासक्त चित्तवाला मनुष्य दुःखोंके कारण सूख जाता है, जिससे वह धधकती हुई नरकाग्नियोंके लिये इन्धन-समूहका काम देता है; क्योंकि वे नरकाग्नियाँ उस इन्धनसे ही जलती हैं। इस भूतलपर यह जो कुछ दुःखसमूह दृष्टिगोचर हो रहा है, उस सबकी कल्पना विषयासक्त चित्तवाले मनुष्योंके लिये ही हुई है। जैसे जलकी तरङ्गोंसे युक्त बड़ी-बड़ी नदियाँ किलोल करती हुई समुद्रकी ओर दौड़ी जाती हैं, उसी तरह सारी दुःख-परम्पराएँ विषयासक्त चित्तवाले मनुष्यको आ घेरती हैं। जो मन आसक्तिशून्य, सब ओरसे शान्त, आकाशके समान निर्मलरूपसे स्थित और असत्-सा प्रतीत होते हुए भी सद्रूपसे भासमान हो रहा है, वह साधकके लिये सुखका ही हेतु होता है।

रघुनन्दन ! कल्याणकामी विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह सर्वत्र स्थित रहते हुए, सबके साथ रहते हुए और सभी न्याययुक्त कर्मोंमें लगे हुए भी सदा-सर्वदा अपने मनको अनासक्त और सम बनाये रक्खे। उसे चेष्टाओंमें, किसी प्रकारकी चिन्ताओंमें, पदार्थोंमें, आकाशमें, नीचे पातालमें, ऊपर पृथ्वीमें, दसों दिशाओंमें, लताओंमें, बाहरके विशाल विषय-भोगोंमें, इन्द्रिय-वृत्तियोंमें, अन्तःकरणमें, प्राण, मूर्धा और तालुमें, भ्रूमध्यमें, नासिकाके अग्रभागमें, मुखमें, दक्षिण नेत्रकी कनीनिकामें, अन्धकारमें, प्रकाशमें, इस हृदय-रूपी आकाशमें, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओंमें, शुद्ध सत्त्वगुणमें, तमोगुणमें, रजोगुणमें, त्रिगुणमय पदार्थ-विशेषमें, चल-अंचल पदार्थोंमें, सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें, दूरमें, समीपमें, सामने, नाम-रूपात्मक किसी पदार्थमें अपने आत्मामें, शब्द-स्पर्श-रूप आदि विषयोंमें, अज्ञानजनित आनन्दकी वृत्तियोंमें, गमनागमनकी चेष्टाओंमें और घड़ी, दिन, मास, संवत्, युग आदि कालकी कल्पनाओंमें आसक्त नहीं करना चाहिये। सर्वत्र दृश्य पदार्थोंमें अनासक्त-सा होकर जड दृश्य जगत्‌के आश्रयभूत नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मामें विश्राम करके परमात्मामें ही अमृतमय रससे युक्त मनवाला होकर स्थित रहना चाहिये। इस प्रकार उस परमात्मामें स्थित हुआ जीवात्मा सम्पूर्ण आसक्तियोंसे रहित होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। फिर तो वह इन समस्त व्यवहारोंको करे अथवा न करे; क्योंकि उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। जैसे आकाशका मेघोंके साथ कोई सम्पर्क नहीं रहता, उसी तरह अपने परमात्मस्वरूपमें रत हुआ जीवात्मा क्रियाओंको करता हुआ अथवा न करता हुआ भी क्रियाजनित फलोंके साथ तनिक भी सम्बद्ध नहीं होता। अथवा शान्त चैतन्य-घन जीवात्माको चाहिये कि वह पूर्वोक्त दृश्य संसारके सम्बन्धका भी परित्याग करके शान्त होकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहे। रामभद्र ! जिसने अपने स्वरूपमें परम विश्रामको प्राप्त कर लिया है, जिसका अन्तःकरण आत्मसाक्षात्कारसे सम्पन्न है और जिसकी कर्म तथा उसके फलोंमें तनिक भी आसक्ति नहीं रह गयी है, ऐसा जीवात्मा कर्म करते हुए भी आसक्तिसे रहित होनेके कारण कर्मजनित फलोंसे सम्बद्ध नहीं होता।

( सर्ग ६८-६९ )