संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 750 में से
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असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें भी दुखी न होनेका प्रतिपादन, ज्ञानीकी तुर्यावस्था तथा देह और आत्माके अन्तरका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो संसारमें रागके अत्यन्त अभावसे उत्पन्न निर्विशेष आनन्दके अभ्यासमें संलग्न हैं और जिनके अन्तःकरण अत्यन्त विशाल हैं, वे जीवन्मुक्त महापुरुष चाहे व्यवहार करें, पर वे सदा-सर्वदा भय और शोकसे रहित होकर ही स्थित रहते हैं। जिसका अन्तःकरण दृश्य-चिन्तनसे रहित, केवल नित्य चेतन परमात्माका ही अवलम्बन करनेवाला तथा सम्पूर्ण चिन्ताज्वरोंसे मुक्त हैं, उस महात्मा पुरुषके सत्सङ्गसे मनुष्य वैसे ही विशुद्ध हो जाते हैं, जैसे निर्मलीसे जल शुद्ध हो जाता है। परमात्माके स्वरूपमें निमग्न रहनेवाला वह तत्त्ववेत्ता पुरुष क्रियाशील होते हुए भी अपने स्वरूपमें नित्य स्थित रहता है। जैसे चिकने स्फटिक मणिपर वास्तवमें किसी भी रंगसे रंग नहीं चढ़ता, वैसे ही परमात्मस्वरूपको प्राप्त तत्त्ववेत्ताका अन्तःकरण सुख-दुःखकी प्राप्ति होनेपर विकारवान् नहीं होता। जिसने सगुण-निर्गुणरूप परमात्माको भलीभाँति जान लिया है और जो परमात्मस्वरूप परम अभ्युदयको प्राप्त हो गया है, उस महात्मा पुरुषके चित्तको संसारका दृश्य उसी प्रकार लिपायमान नहीं कर सकता, जैसे जलरेखा कमलको लिपायमान नहीं कर सकती। जब यह जीवात्मा परमात्माका ज्ञान प्राप्तकर समस्त कल्पनाओंके हेतुभूत मलोंसे रहित हुआ ध्यानाभाव-दशामें भी परमात्माके स्वरूपानुभवमें निमग्न रहता है, तब वह 'स्वसक्त' (आत्माराम) कहलाता है। आत्माराम होनेसे ही मनुष्य संसारमें असङ्गभावको प्राप्त करता है; क्योंकि आत्माके ज्ञानसे ही विषयासक्तिका क्षय होता है। चित्तके विषय-सम्बन्धिनी वृत्तियोंसे रहित हो जानेपर क्षीणवृत्तिवाले अन्तःकरणोंकी जो वासनाओंसे रहित शान्तिमयी स्थिति है, वही जाग्रत्में सुषुप्तिके समान समाधि-अवस्था कही जाती है। इस प्रकार अखण्ड समाधि-अवस्थाको प्राप्त मनुष्य व्यवहार करता हुआ भी सुख-दुःखरूपी रस्सोंसे बँधकर संसारकी ओर कभी आकृष्ट नहीं होता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं। जो पुरुष जाग्रत्में ही परमात्मामें स्थित हुआ जगत्के कार्योंको करता है, उस पुरुषको यन्त्रकी पुतलीके समान सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता।
जो पूर्वसे ही यानी साधनावस्थासे ही तीव्र वैराग्यके कारण उपेक्षाबुद्धिसे कर्म करता है तथा जिसकी बुद्धि परमात्मामें ही स्थित है, वह मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और फिर वह उन कर्मोंके फलोंसे नहीं बँधता। विवेकशील साधकको कर्मोंका अनुष्ठान या परित्याग—कुछ भी अच्छा नहीं लगता। किंतु जिन्होंने आत्मतत्त्वको जान लिया है, वे महात्मा तो जिस समय जो कुछ प्राप्त हो जाता है, तदनुसार न्याययुक्त जीवन-यापन करते हुए स्थित रहते हैं। सांसारिक विषयोंके सम्बन्धसे रहित सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें भलीभाँति स्थित परमात्मप्राप्त पुरुष जो-जो कर्म करता है, उसमें वस्तुतः उसका कर्तापन नहीं रहता। श्रीराम ! यही अखण्ड समाधिरूप सुषुप्ति-स्थिति अभ्यासयोगसे जब दृढ़ हो जाती है, तब तत्त्वज्ञ महात्माओंके द्वारा वह तुर्य-स्थिति कही जाती है। जिसके अन्तःकरणसे समस्त विकार विनष्ट हो चुके हैं और जिसके मनका अत्यन्त अभाव-सा हो गया है, वह ज्ञानी महानुभाव विशुद्ध आनन्दमय हो जाता है। उपर्युक्त अखण्ड समाधिमें स्थित रहनेवाला ज्ञानी अतिशय प्रसन्नतासे परिपूर्ण और परम आनन्दमें निमग्न हुआ इस जगत्के व्यवहारको सदा लीलाकी ज्यों देखता रहता है। श्रीराम ! जिसके शोक, भय एवं सांसारिक क्लेश सदाके लिये निवृत्त हो गये हैं तथा जो संसाररूपी भ्रमसे रहित है, वह तुर्यावस्थामें सदा-सर्वदा स्थित आत्मज्ञानी फिर इस संसारचक्रमें कभी नहीं गिरता। जैसे आकाशमार्ग वायुओंके लिये गम्य है,