संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 367, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
वैसे ही दूरसे भी अति दूर परमपद विदेहमुक्त पुरुषोंके लिये अनुभवगम्य है । परमानन्दमें निमग्न ज्ञानी पूर्वोक्त सुषुप्तिके समान अखण्ड ब्रह्माकार समाधि अवस्थासे जगत्स्थितिका वास्तविक अनुभव करके उसके पश्चात् तुर्यावस्था ( जीवन्मुक्तावस्था ) को प्राप्त होता है । रघुकुलतिलक ! जिस प्रकार तुर्यातीत पदका ज्ञान रखनेवाले आत्मतत्त्व-ज्ञानी महात्मा तुर्यातीत पदमें स्थित रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित हो उस परमपदमें स्थित रहो । चाहे देह नष्ट हो जाय, चाहे वह नष्ट न हो यानी स्थिर रहे, उससे तुमको क्या प्रयोजन है ? तुम तो केवल आत्मज्ञानमें ही स्थित रहो । यह देह जैसा है, वैसा भले ही बना रहे । श्रीराम ! जैसे अन्धकार और मेघ-मण्डलसे मुक्त शरत्पूर्णिमाकी रात्रिका आकाशमण्डल सुशोभित होता है, वैसे ही तुम अभीष्ट और अनभीष्ट विषयोंसे मुक्त हुए शीतल साक्षात्काररूपी आलोककी शोभासे सुशोभित हो रहे हो ।
रघुनन्दन ! इस संसारमें देश, काल और वस्तुके परिच्छेदसे शून्य एक विशुद्ध चेतन आत्मा ही है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है । सर्वत्र व्यापक चेतन 'आत्मा' यह नाम केवल व्यवहारके लिये ही कल्पित है, वास्तवमें नाम-रूप आदि भेद तो इस चेतनसे अत्यन्त दूर ही हैं अर्थात् यह चेतन आत्मा नाम-रूप आदि उपाधिसे रहित है । जैसे समुद्र जलस्वरूप ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ भी नहीं हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न पृथ्वी-जल आदि कुछ भी नहीं हैं । जैसे छाया और धूपका तथा प्रकाश और अन्धकारका परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही शरीर और आत्माका भी परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता । श्रीराम ! जैसे सदा परस्पर विरुद्ध रहनेवाले शीत और उष्णका एक दूसरेसे सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही देह और आत्माका भी एक दूसरेसे कभी सम्बन्ध नहीं हो सकता । जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंसे प्रतीत हुआ जल किरणोंके यथार्थ ज्ञानसे विनष्ट हो जाता है; वैसे ही अज्ञानजनित यह देह और आत्माका परस्पर सम्बन्ध-भ्रम भी आत्म-तत्त्वके साक्षात्कारसे विनष्ट हो जाता है । वह चेतन आत्मा शुद्ध, अविनाशी, स्वप्रकाश एवं सम्पूर्ण विकारोंसे रहित है और देह विनाशशील, अनित्य और मलरूप विकारसे युक्त है; ऐसी स्थितिमें अत्यन्त अन्तर होनेके कारण आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है । प्राणवायुसे बलवान् होकर ही शरीर स्पन्दको प्राप्त करता है, इसलिये आत्माके साथ किंचित् भी शरीरका सम्बन्ध नहीं है । श्रेष्ठ बुद्धिसे सम्पन्न श्रीराम ! जब द्वैतको माननेपर भी आत्माके साथ पूर्वोक्त प्रणालीसे देहादिका सम्बन्ध नहीं हो सकता, तब द्वैतकी असिद्धिमें तो इस प्रकार सम्बन्धकी कल्पना ही कैसे हो सकती है । जैसे परस्पर अत्यन्त विरुद्ध प्रकाश और अन्धकारका एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता, वैसे ही परस्पर अत्यन्त विरुद्ध आत्मा और शरीरका भी एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता ।
जैसे शीत और उष्णकी एकता कहीं दिखलायी नहीं पड़ती, वैसे ही क्रमशः जड और चेतनस्वरूप देह और आत्माका भी संयोग नहीं हो सकता। यह देह प्राणवायुसे ही चलता है, उसीसे उसका गमनागमन होता है एवं देह-की नाड़ियोंमें संचार करनेवाले प्राणवायुसे ही शब्द होता है। जिस प्रकार छिद्रयुक्त बाँसोंसे वायुके गमनागमनसे शब्द उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार शरीरके कण्ठरूप छिद्रसे निकले हुए प्राणवायुसे जब कण्ठ, तालु आदि स्थानोंमें जिह्वा आदिके द्वारा अभिघातसे निकाले जाते हैं, तब कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग आदि शब्द प्रकट होते हैं—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है । शरीररूपी स्थानको छोड़कर जहाँ चित्तरूपी पक्षी अपनी वासनाके अनुसार जाता है, वहींपर विचार करनेपर आत्माका अनुभव होता है । जहाँ पुष्प रहता है, वहींपर जैसे गन्धका ज्ञान रहता है, उसी