संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * देहादिके संयोग-वियोगादिमें हर्षशोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन * ३२९
प्रकार जहाँ चित्त रहता है, वहींपर आत्माका ज्ञान होता है। जिस प्रकार सर्वत्र स्थित आकाश दर्पणमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही सर्वत्र स्थित आत्मा शुद्ध अन्तःकरणमें दिखलायी पड़ता है। जैसे पृथ्वीमें नीचेका भाग जलका आश्रय-स्थान होता है, उसी प्रकार अन्तःकरण ही आत्माके अनुभवका आश्रय-स्थान है। महान् बुद्धिवाले पुरुष कहते हैं कि संसारकी उत्पत्तिमें अविचार, अज्ञान और मूर्खता ही सारभूत है और यही अन्तःकरणकी उत्पत्तिमें हेतु है। रघुनन्दन ! जैसे प्रज्वलित दीपकसे अन्धकारका तत्क्षण ही नाश हो जाता है, वैसे ही नित्य सिद्ध आत्माके यथार्थ ज्ञानसे ही चित्तका तत्क्षण नाश हो जाता है। जैसे बंदर वनके एक वृक्षको त्यागकर दूसरे वृक्षपर चला जाता है, उसी प्रकार वासनाके वशीभूत जीव कर्मानुसार एक शरीरको त्यागकर दूसरे शरीरमें चला जाता है। श्रीराम ! जिस शरीरमें वह चला गया, उस शरीरको भी त्यागकर फिर दूसरे समयमें अन्य विशाल देशके अन्तर्गत दूसरे शरीरमें चला जाता है। इस प्रकार जीवोंके यथार्थ स्वरूपको आवृत करके रहनेवाली अपनी ही बन्धक वासना जीवोंको इधर-उधर भटकाती रहती है। श्रीराम ! वासनारूपी रज्जुमें बँधे हुए जीव पहलेसे ही जीर्ण तो हैं ही, फिर भी वे पर्वततुल्य जड शरीरोंमें अत्यन्त दुःखपूर्वक आयु क्षीण कर रहे हैं। जिन्होंने जीर्णसे भी अधिक जीर्ण होकर दरिद्रता, रोग, वियोग आदिसे उत्पन्न हुए दुःखोंका भार वहन किया है तथा जिनका जीवन अनेक योनियोंमें दुर्दशाग्रस्त परिणामोंसे जर्जर हो चुका है, वे जीव बारंबार अपने हृदयकी दुर्वासनाओंसे दीर्घकालतक नरकोंमें निवास करते हैं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! मुनिवर श्रीवसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर जब दिन बीत गया, सूर्यभगवान् अस्ताचलकी ओर जाने लगे, तब सभामें उपस्थित सब लोग मुनिको प्रणाम करके सायंकालीन स्नान-संध्या-वन्दनादि नित्यकर्म करनेके लिये चले गये और रात्रि बीत जानेपर दूसरे दिन सूर्यकी किरणोंके साथ ही पुनः सभामें उपस्थित हो गये।
( सर्ग ७०-७१ )
देहादिके संयोग-वियोगादिमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तुम देहके उत्पन्न होनेपर उत्पन्न नहीं होते और देहके नष्ट होनेपर नष्ट नहीं होते; क्योंकि अपने स्वरूपमें तुम विकार-रहित और विशुद्ध हुए नित्य स्थित हो। इस विनाशीशील देहके नष्ट हो जानेपर शुद्ध आत्माका नाश नहीं होता; इसलिये जो देहका विनाश हो जानेपर 'मैं नष्ट हो जाता हूँ' इस प्रकारकी भावनासे दुखी होता है, उस अन्धबुद्धिको धिक्कार है ! जैसे घोड़ेकी लगाम और रथका सम्बन्ध राग-द्वेषसे रहित है, उसी प्रकार चेतन आत्माका भी देह, चित्त, इन्द्रिय आदिके साथ सम्बन्ध राग-द्वेषसे रहित है। जैसे मार्ग बटोहियों-के संयोग और वियोगमें हर्ष-शोकका अनुभव नहीं करता, वैसे ही विशुद्ध आत्मा शरीरोंके संयोग-वियोगमें हर्ष शोकसे रहित है। जिस प्रकार कल्पित प्रेतके विकराल रूपसे भयभीत बालकको होनेवाला भय मिथ्या ही है, वैसे ही ये कल्पित स्नेह, सुख आदि मिथ्या ही हैं। जैसे लकड़ियोंके बोझेमें लकड़ियोंके सिवा और कुछ भी नहीं दिखलायी पड़ता, वैसे ही आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी—इन पाँचों भूतोंके शरीरमें पाँचों भूतोंके संघातके सिवा और कुछ भी नहीं दिखलायी पड़ता। अतः श्रोतागण ! आपलोग इन पाँचों भूतोंकी उत्पत्ति, विनाश और विकार होनेपर हर्ष-अमर्ष और विषादके वशमें क्यों हो जाते हैं ? जिस देहका 'छी' यह दूसरा नाम है, उस तुच्छ भूतोंके समूहमें यानी छी-