भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * मन, अहंकार, वासना और अविद्याके नाशसे मुक्ति तथा जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण * ३३३


परस्पर पार्थक्य नहीं है, उसी प्रकार चित्त और अहंकार-की पृथक् कल्पना व्यर्थ ही की जाती है; वास्तवमें उनका परस्पर कोई भेद नहीं है। श्रीराम ! मन और अहंकार—इन दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश हो जानेपर मन एवं अहंकार दोनोंका विनाश हो ही जाता है। इसलिये अन्यान्य इच्छाओंका परित्याग करके अपने वैराग्य और आत्मा-अनात्माके विवेकसे केवल मनका ही विनाश कर देना चाहिये। जैसे वायु वृक्षमें पल्लवोंकी पंक्तिको चलाता है, वैसे ही प्राणादि वायु देहमें अङ्गोंकी पंक्तियोंको पर्याप्तरूपसे चलाता है; किंतु सब पदार्थोंको व्याप्त कर लेनेवाला अति सूक्ष्म चेतन आत्मा न तो स्वतः चल है और न किसीसे चलायमान होता है। जैसे अचल मेरु-पर्वत वायुओंसे कम्पित नहीं होता, उसी प्रकार यह चेतन आत्मा भी प्राणादि वायुओंसे कम्पित नहीं होता।

रघुनन्दन ! यह मैं आनेवाला हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं कर्ता हूँ—इस प्रकारकी वासना मूढ पुरुषोंके हृदयमें व्यर्थ ही उत्पन्न हुआ करती है, जैसे अज्ञानसे मरुभूमिमें सूर्यकिरणोंसे मृगतृष्णा उत्पन्न होती है। वास्तवमें असत्य होते हुए भी सत्य-सी दिखायी पड़नेवाली यह अविद्यारूपा वासना विषयोंकी अभिलाषासे युक्त मनरूप मत्त मृगको उसी प्रकार खींचती है, जिस प्रकार जलकी अभिलाषासे युक्त मृगको मृगतृष्णा खींचती है; किंतु उस अविद्यारूपा वासनाका यथार्थ स्वरूप जान लेनेपर उसका विनाश हो जाता है । जैसे 'यह मृगतृष्णाका जल है' इस प्रकार तात्त्विक स्वरूपसे जान लेनेपर मृगतृष्णा तृषार्त्त मनुष्यको अपनी ओर नहीं खींचती, उसी प्रकार 'यह अविद्या है' इस प्रकार तत्त्वतः जान लेनेपर अविद्या मनको नहीं खींच सकती। श्रीराम ! जैसे दीपकसे अन्धकार नष्ट हो जाता है और प्रकाश आ जाता है, वैसे ही परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वासना समूल (अविद्यासहित) नष्ट हो जाती है और परमात्माका वास्तविक स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। अविद्याका अस्तित्व किसी प्रकार नहीं है—इस तरह शास्त्र और युक्तिसे दृढ़ निश्चय हो जानेपर अविद्याका तत्क्षण विनाश हो जाता है। इस जड़ देहके लिये भोगोंसे क्या प्रयोजन है—इस प्रकारके निश्चयसे युक्त तत्त्वज्ञ पुरुष इच्छाओंके कारणरूप अपने अज्ञानको विनष्ट कर देता है। जैसे राज्य मिल जानेपर दरिद्र मनुष्य परम शान्तिको पा लेता है, वैसे ही यह तत्त्वज्ञ पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है। जैसे प्रशान्त समुद्र अपने स्वरूपमें सदा अचल स्थित रहता है, उसी प्रकार वह अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही नित्य अचल स्थित रहता है। जैसे मेरु पर्वत स्थिरता और धीरताको धारण करता है, वैसे ही तत्त्ववेत्ता पुरुष स्थिरता और धीरताको धारण करता है। वह तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही सदा परम शान्त और परम तृप्त रहता है तथा वह तत्त्वज्ञ महापुरुष उस सम्पूर्ण भूतोंके आत्मस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, सबके नियन्ता, सबके नायक, सर्वाकार और निराकार सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपको अपना आत्मा जान लेता है। तत्त्ववेत्ता पुरुष विषयी पुरुषोंके सङ्ग और विषयोंकी आसक्तिसे रहित, मान और मानसिक चिन्ताओंसे शून्य, परमात्मामें ही रत तथा विज्ञानानन्दसे परिपूर्ण और विशुद्ध अन्तःकरणसे युक्त होता है। वह आत्मज्ञानी महात्मा कामरूपी कीचड़से मुक्त, बन्धनस्वरूप आत्मभ्रमसे शून्य तथा हर्ष-शोक, राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप दोष और भयसे रहित होता है। अतएव वह संसार-समुद्रसे तर चुका होता है। वह तत्त्वज्ञ विद्वान् सर्वोत्तम परम शान्तिको, दुर्लभ परम पदको तथा अनावृत्तिरूप परम गतिको प्राप्त है। सभी लोग मन, वाणी और कर्मद्वारा इस महापुरुषके आचरणोंके अनुकरणकी इच्छा करते हैं; पर वह किसी प्रकारकी इच्छा नहीं करता। सभी मनुष्य इसके आनन्दका अनुमोदन करते हैं, पर वह किसीका भी अनुमोदन नहीं करता—उदासीन रहता है। तत्त्वज्ञ पुरुष न तो त्याग करता है न ग्रहण; न किसीकी स्तुति करता है न किसीकी