संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निन्दा, न मरता है न जन्म लेता है, न हर्ष करता है और न शोक । वह समस्त आरम्भों, सम्पूर्ण विकारों और सारी आशा, इच्छा, वासना आदिसे रहित पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है ।
श्रीराम ! मनुष्यको न राज्यसे, न स्वर्गसे, न चन्द्रमा- से, न वसन्तसे और न कान्ताके कमनीय संसर्गसे ही वैसे उत्तम सुख-शान्ति प्राप्त होते हैं, जैसे आशा- त्यागसे, क्योंकि आशाका त्याग ही सबसे बढ़-चढ़कर सुख-शान्ति है । जिस परम निर्वाणरूप मोक्षके लिये तीनों लोकोंकी सम्पत्तियाँ तिनकेकी तरह कुछ भी काम नहीं देतीं, वह आशाके त्यागसे ही प्राप्त होता है । जिसके हृदयमें आशा अपना स्थान कभी नहीं जमा सकती, सम्पूर्ण त्रिभुवनको तृणके सदृश समझनेवाले उस विरक्त पुरुषकी उपमा किससे दी जा सकती है ? अर्थात् किसीसे नहीं । मेरे लिये यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये—इस प्रकारकी इच्छा जिसके चित्तमें नहीं होती, उस स्वाधीन चित्तवाले ज्ञानी महात्मा पुरुषकी मनुष्य कैसे तुलना कर सकते हैं ? श्रीराम ! तुममें न तो आशाओंका अस्तित्व है और न तुम्हारा आशाओंसे किसी तरहका सम्बन्ध ही है । तुम इस जगत्को मिथ्या भ्रममात्र ही समझो; क्योंकि जैसे दौड़ते हुए रथमें लगे पहियोंके ऊर्ध्व और नीचे प्रदेशमें होनेवाला घुमाव नेमीका आश्रय लेनेवाले पिपीलिका आदि जीवोंके पतन, पेषण आदि अनर्थोंका ही कारण होता है, वैसे ही यह जगत् भी उसका आश्रय लेनेवाले (इसमें सत्य-बुद्धि रखनेवाले) जीवोंके जन्म-मरण आदि अनर्थोंका ही कारण है ।
रघुनन्दन ! यह सम्पूर्ण जगत् परमात्मस्वरूप ही है, यहाँ नानारूपता है ही नहीं । जगत्को अद्वितीय परमा- नन्दस्वरूप जानकर धीर महात्मा तनिक भी खिन्न नहीं होते। इन पदार्थोंके समूहोंका जो यथार्थ—आत्मासे अभिन्न स्वरूप है, उसको जाननेसे ही पुरुष बुद्धिके परम विश्राम- स्वरूप नैराश्यको प्राप्त होता है । जैसे वीर केसरीके पाससे मृगी दूर भाग जाती है, उसी प्रकार तीव्र वैराग्यसे वीरताको प्राप्त अन्तःकरणसे युक्त पुरुषके पाससे यह संसारको मोहित करनेवाली माया दूर भाग जाती है— फिर उसके पास भी नहीं फटकती । जिस प्रकार वायु पर्वतको न आनन्द दे सकता है, न खेद और न धैर्यसे च्युत कर सकता है, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा पुरुषको न तो विषयोपभोग आनन्द पहुँचा सकते हैं, न सांसारिक आपत्तियाँ हृदयमें खेद पहुँचा सकती हैं और न दृश्य-सम्पत्तियाँ धैर्यसे च्युत कर सकती हैं। जिसके प्रति युवती स्त्रियाँ अनुरक्त हैं, ऐसे उदारबुद्धि तत्त्वज्ञ महात्माके अन्तःकरणमें कामदेवके बाण छिन्न-भिन्न होकर धूलके समान हो जाते हैं—उन युवती स्त्रियोंका उसपर कोई असर नहीं होता । जो परमात्माके स्वरूपको जानता है और मन-इन्द्रियोंके वशमें नहीं है, उस महापुरुषको राग और द्वेष अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते । इस प्रकार वह जब राग-द्वेषके द्वारा तनिक-सा भी विचलित नहीं किया जा सकता, तब उनके द्वारा उसके आक्रान्त होनेकी तो बात ही क्या है। जो लता और वनिता- में एक-सी दृष्टि रखता है तथा जो पर्वतकी तरह अचल है, वह ज्ञानी-पुरुष इन तुच्छ विषयभोगोंमें उसी प्रकार रमण नहीं करता, जैसे बटोही मरुभूमिमें रमण नहीं करता । जिसका अन्त करण किसी भी भोग-पदार्थमें आसक्त नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष बिना प्रयत्नके अपने-आप प्राप्त अनिषिद्ध भोग-पदार्थोंका केवल शरीररक्षाके लिये अनासक्तभावसे लीलापूर्वक सेवन करता है । काकतालीय- न्यायकी भाँति अनायास न्याययुक्त प्राप्त ललना आदि भोग-समूह आस्वादित होनेपर भी तत्त्वज्ञ धीर पुरुषको सुख-दुःख नहीं दे सकते; क्योंकि जिसने परमात्माकी प्राप्तिके मार्गको भलीभाँति जान लिया है, उस तत्त्वज्ञ महापुरुषको सुख-दुःख तनिक भी विचलित नहीं कर सकते । इन विनाशशील विषयोंको त्याज्य बुद्धिसे