संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन * ३३५
देखनेवाला वह मृदु, दमनशील और सम्पूर्ण चिन्ता आदि ज्वरोंसे रहित ज्ञानी महापुरुष सब भूतोंमें अन्तरात्मास्वरूप-से स्थित आत्मपदका ही अवलम्बन कर स्थित रहता है । जैसे ऋतुओंके आने-जानेसे पर्वत विचलित नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी महात्मा पुरुष कालानुसार, देशानुसार और क्रमानुसार आपत्तियों और सुख-दुःखोंके आनेपर भी विचलित नहीं होता । शरीरसे पृथक् आत्माका अपरोक्ष साक्षात्कार करनेवाले, नित्यानित्य वस्तुके यथार्थ विवेकसे सम्पन्न ज्ञानीके शरीरका छेदन करनेपर भी उसका कुछ भी छेदन नहीं होता; क्योंकि वह अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें ही नित्य स्थित रहता है । विशुद्ध प्रकाशस्वरूप परमात्माका एक बार यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वह सदा ज्ञात ही रहता है, फिर उसका विस्मरण नहीं होता । अपने हृदयकी चिज्जडग्रन्थिका उच्छेद हो जानेपर मायाके तीनों गुणोंके द्वारा आत्माका पुनः बन्धन उसी प्रकार नहीं हो सकता, जैसे वृक्षसे टूटा हुआ फल किसी-के द्वारा पुनः नहीं जोड़ा जा सकता । अविद्याका असली स्वरूप जान लेनेके अनन्तर कौन बुद्धिमान् पुरुष फिर उसमें डूबता ( फँसता ) है; क्योंकि सांसारिक वासना विवेकपूर्वक बुद्धिके विचारसे निवृत्त हो जाती है ।
श्रीराम ! तत्त्ववेत्ता पुरुष रूप-लावण्ययुक्त कामिनीको भी चित्रमें लिखित कान्ताकी प्रतिमाकी तरह ही समझते हैं, क्योंकि जैसे चित्रमें चित्रित कामिनीके केश, ओष्ठ आदि अवयव मषी, कुङ्कुम आदि रंग-स्वरूप पाँच भूतोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं होते, उसी प्रकार रूप और लावण्यसे युक्त जीवित कामिनीके केश, ओष्ठ आदि भी पाँच भूतोंके स्वरूपसे अतिरिक्त दूसरे कुछ नहीं हैं । इसलिये कान्ता-प्रतिमा और जीवित कान्तामें तत्त्वतः समानता है—इस तत्त्वको जाननेवाले विवेकशील विरक्त महात्मा पुरुषका जीवित कान्ताके उपभोगमें आग्रह कैसे हो सकता है । जैसे परपुरुषमें व्यसन ( आसक्ति ) रखनेवाली नारी, घरके काम-काजमें व्यग्र रहनेपर भी उसी परपुरुष-सम्बन्ध-रूप रसायनका अपने अंदर आह्लाद लेती रहती है, उसी प्रकार व्यवहार करते हुए भी विशुद्ध परब्रह्मतत्त्वमें उत्तम विश्रामको प्राप्त धीर तत्त्वज्ञ पुरुष उस विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें ही मग्न रहता है; फलतः वह इन्द्रादि देवताओंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी विचलित नहीं होता । क्योंकि जिस महात्माकी अविद्या निवृत्त हो गयी है, जिसको परमात्मविषयका अच्छी प्रकार ज्ञान है तथा जो सदाचारसे युक्त है, वह महात्मा सुचारु-रूपसे व्यवहार करता हुआ भी अपने अन्तरात्मामें प्रसन्न रहता है । उसके शरीरका छेदन होनेपर भी उसका छेदन नहीं होता, गिरते हुए अश्रुओंसे युक्त होता हुआ भी वह रोता नहीं, दग्ध होता हुआ भी दग्ध नहीं होता और देहका विनाश होनेपर भी उसका विनाश नहीं होता; क्योंकि वह देहसे रहित हुआ सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके स्वरूपमें नित्य स्थित है । श्रीराम ! वह तत्त्वज्ञ पुरुष प्रारब्धभोगके विधानके अनुसार चाहे दरिद्र-अवस्थामें रहे या संकटावस्थामें, उत्तम नगरके महलमें रहे या विस्तृत पहाड़ या वनमें, वह सदा-सर्वदा सुख-दुःखके उपद्रवसे रहित ही होता है । ( सर्ग ७४ )
मनुष्य, असुर, देव आदि योनियोंमें होनेवाले हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! अपने राज्यके व्यवहारमें तत्पर होते हुए भी राजा जनक सम्पूर्ण चिन्तारूप ज्वरसे तथा अन्तःकरणकी व्याकुलतासे रहित होकर ही सदा-सर्वदा स्थित हैं । आपके पितामह महाराज दिलीपने अनेक तरहके उचित सांसारिक कर्मोंको सुचारुरूपसे करते हुए भी आसक्तिसे रहित होकर ही