भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दीर्घकालतक पृथ्वीका पालन किया। तथा राग आदि दोषोंसे रहित होनेके कारण आत्मज्ञानको प्राप्त तथा सदा जीवन्मुक्त-स्वरूप महाराज मनुने चिरकाल-तक प्रजाओंका संरक्षण करते हुए राज्यका पालन किया। विचित्र सैन्य और बाहुबलके प्रयोगसे युक्त युद्धों तथा अनेक व्यवहारोंको निष्कामभावसे दीर्घकालतक करते हुए महाराज मान्धाता परम पदको प्राप्त हुए। पातालके राज्यसिंहासनपर आसीन, सदा त्यागी, सदा अनासक्त राजा बलि यथार्थ-रूपसे व्यवहारको करते हुए भी जीवन्मुक्तरूपसे स्थित हैं। दानवोंके अधिपति नमुचि देवताओंके साथ युद्ध करते हुए तथा सदा नाना प्रकारके व्यवहार एवं विचार-विमर्शों-में तत्पर होते हुए भी भीतरसे संतप्त (खिन्न) नहीं होते थे। इन्द्रके युद्धमें अपने शरीरका परित्याग करनेवाले विशाल-हृदय मानी वृत्रासुरने प्रशान्तमन होकर ही देवताओंके साथ युद्ध किया। पातालतलका परिपालन करते समय दानवोचित कर्मोंका अनासक्त भावसे अनुष्ठान करते हुए भक्तप्रवर प्रह्लाद अविनाशी अनिर्वचनीय परमानन्दस्वरूप परमपदको प्राप्त हुए। समस्त देवताओंके मुखस्वरूप अग्नि क्रियासमूहमें तत्पर होते हुए यज्ञिय शोभाका चिरकालतक उपभोग करते हैं तथापि वे मुक्त होकर ही इस त्रिभुवनमें निवास करते हैं। जगत्‌के प्राणिसमूहोंके अङ्गोंका चिरकालसे संचरण कराते हुए भी वायु, जो सदा-सर्वदा सर्वत्र संचरण करनेवाले हैं, मुक्त ही स्थित हैं। ज्ञानरूप रत्नोंके एकमात्र समुद्र, तीक्ष्णबुद्धि, वीरवर स्वामी कार्तिकेयने मुक्त होते हुए भी तारकादि असुरोंसे युद्ध किया। महामुनि नारद मुक्त-स्वभाव होते हुए भी इस जगत्‌में कार्यशील और शान्त बुद्धिसे विचरण किया करते हैं। जीवन्मुक्त होकर ही अनासक्तभावसे सहस्रमुख नागराज शेष पृथ्वीको धारण करते हैं, सूर्य दिवस-परम्पराओंका निर्माण करते हैं और यमराज धर्माधर्म-विचारपूर्वक लोगोंका नियमन करते हैं। इन पूर्वोक्त महानुभावोंके सिवा दूसरे भी सैकड़ों महात्मा यक्ष, राक्षस, मनुष्य और देवता इस त्रिभुवनमें मुक्तस्वरूप हुए ही संसारमें अनासक्त भावसे विचरण करते हैं। विचित्र आचार-व्यवहारोंमें स्थित कितने ही पुरुष भीतर शान्तिसे युक्त हैं, जब कि कुछ तामसी मूढ़ पुरुष तो मोहमें मग्न हुए पत्थरके सदृश बने रहते हैं। कुछ महात्माओंने परम ज्ञानका सम्पादन करके तपोवनका आश्रय लिया, जैसे—'भृगु, भरद्वाज, विश्वामित्र, शुक आदि। कुछ महात्मा परम ज्ञान प्राप्तकर राज्योंमें ही छत्र, चवँर धारण किये रहते हैं—जैसे जनक, शर्याति, मान्धाता, सगर आदि। कुछ तत्त्वज्ञ आकाशमें ग्रह, नक्षत्र आदिके आधारभूत ज्योतिष्चक्रके मध्यमें स्थित हैं—जैसे बृहस्पति, शुक्राचार्य, चन्द्र, सूर्य, सप्तर्षि आदि। तिर्यक् योनियोंमें भी सदासे कृतबुद्धि महात्मा रहते हैं और देवयोनियोंमें भी मूर्खबुद्धिवाले लोग विद्यमान हैं। जिसका अत्यन्त व्यापक स्वरूप है, उस सर्वस्वरूप परमात्मामें सब कुछ सर्वभावसे सर्वत्र सब प्रकारसे सदा ही सम्भव है।

श्रीराम ! मुक्ति हो जानेपर फिर इस संसारमें किसी प्रकार जन्मकी प्राप्ति सम्भव नहीं। किंतु करोड़ों मनुष्य आत्माके ज्ञानका अभाव होनेसे ही अज्ञानमें निमग्न रहते हैं। रघुकुलतिलक ! मुक्ति होनेपर इस संसारमें विज्ञानानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति सदा ही बनी रहती है, इसलिये आत्मा-अनात्माके यथार्थ विवेक-विज्ञानको प्राप्त करके करोड़ों मनुष्य विमुक्त हो चुके हैं। ज्ञानसे मुक्ति सुलभ है और अज्ञानसे दुर्लभ। अतः जिसको मुक्तिकी अभिलाषा हो, उसे आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करना चाहिये। आत्मज्ञानसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। इस वर्तमान कालमें भी रागशून्य, भयरहित महाबुद्धिमान् राजा सुहोत्र और जनक आदिके समान अनेक जीवन्मुक्त महापुरुष विद्यमान हैं। इसलिये श्रीराम ! तुम भी ज्ञान-वैराग्यसे उत्पन्न धीरबुद्धिसे युक्त, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समदृष्टि तथा जीवन्मुक्त हुए विचरण करो।