भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र तथा उससे तरनेके उपायका वर्णन * ३३७

रघुनन्दन ! इस लोकमें देहधारी जीवोंकी दो प्रकारकी मुक्ति होती है—एक तो सदेह मुक्ति और दूसरी विदेह-मुक्ति। अब तुम इनका विभाग सुनो। निष्पाप श्रीराम ! पदार्थों (विषयों)-के असङ्गसे जो मनकी शान्ति होती है, वही विमुक्तता है। वह विमुक्तता देहके रहते हुए और देहावसान होनेपर ही होती है। जो विद्वान् विषय-स्नेह-से रहित होकर जीता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है एवं जो विषय स्नेहसे युक्त होकर जीता है, वह बद्ध कहलाता है। इन दोनोंसे भिन्न तीसरा जो देहत्यागके पश्चात् ब्रह्ममें विलीन हो जाता है, वह विदेही तो मुक्त है ही। इसलिये मनुष्यको मोक्षके लिये युक्ति और प्रयत्नपूर्वक साधन करना चाहिये। युक्ति और प्रयत्नके बिना तो गायका खुर टिके, इतनी भूमि भी नहीं लाँघी जा सकती।

(सर्ग ७५)


स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र, उससे तरनेके उपाय और तरनेके अनन्तर सुखपूर्वक विचरणका वर्णन, जीवन्मुक्त महात्माओंके गुण, लक्षण और महिमा

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जगत् ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है, अविवेकसे स्थिरताको प्राप्त होता है और परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे निश्चय ही प्रशान्त हो जाता है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ ज्ञान न होना ही संसारकी स्थितिमें कारण है और परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही उस संसारके विनाशमें कारण है। यह संसार-सागर ऐसा घोर है कि इससे पार हो जाना अत्यन्त दुष्कर है; युक्ति और प्रयत्नके बिना इसका तरण नहीं किया जा सकता। यह संसाररूपी सागर है। इसमें मुग्ध अङ्गनारूपी विस्तृत तरङ्ग हैं। ये स्त्रीरूपी तरङ्ग ओठोंकी शोभारूप पद्मराग-मणियोंसे युक्त, नेत्ररूपी नील-कमलोंसे परिपूर्ण, स्मित-रूपी फेनोंसे सुशोभित, दाँतरूपी प्रफुल्लित पुष्पोंसे अलंकृत, केशरूपी इन्द्रनीलमणियोंसे सुसज्जित, भौंहोंके विलासरूपी वायुसे आन्दोलित, नितम्बरूपी पुलिनोंसे युक्त, कण्ठरूपी शङ्खोंसे विभूषित, ललाटरूपी मणिसमूहोंसे सुशोभित, विलासरूपी ग्राहोंसे संकुल, कटाक्षोंकी चपलताके कारण अति गहन तथा देहकान्तिरूपी सुवर्ण-बालुकासे युक्त हैं। इस प्रकारकी अति चञ्चल लहरियोंके कारण जो अत्यन्त भयंकर है—ऐसे सागरमें निमग्न हुआ पुरुष यदि पार हो जाय तो वह परम पुरुषार्थ ही है। शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धिरूपी बड़ी नौका और विचारपूर्वक विवेकरूपी नाविकके रहते हुए भी जो मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हुआ, उस पुरुषको धिक्कार है। श्रीराम ! जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ परब्रह्मका विचार करके तथा बुद्धिसे संसार-सागरका तत्त्व समझकर जगत्‌में विचरण करता है, वही वास्तविक शोभा पाता है। इस संसारमें तुम धन्य हो, जो इस बाल-अवस्थामें ही विवेकयुक्त बुद्धिसे इस संसारके विषयमें विचार करते हो। जिसने तत्त्वको जान लिया है, उस पुरुषके बल, बुद्धि और तेज उसी प्रकार बढ़ते हैं, जिस प्रकार वसन्त ऋतुमें वृक्षोंके सौन्दर्य आदि गुण बढ़ते हैं। रघुनन्दन ! तुम जानने योग्य वस्तुको जानते हो। इस कारण इस समय तुम चिन्मय घनीभूत आनन्दामृत रसायनसे परिपूर्ण सुशीतल (त्रिविध तापोसे रहित), विशुद्ध और सम शोभासे पूर्ण चन्द्रमाकी तरह अत्यन्त सुशोभित हो रहे हो।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुनिवर ! जिसने ब्रह्मतत्त्वरूप चमत्कारका अपरोक्ष साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे तत्त्वज्ञानी पुरुषका उदार चरित्र आप मुझसे साररूपमें कहिये; क्योंकि आपके वचनोंसे तृप्ति किसको हो सकती है।

श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहु श्रीराम ! अनेक बार मैंने तुमसे जीवन्मुक्तके लक्षण कहे हैं, फिर भी मैं तुमसे कह रहा हूँ; सुनो। जिसकी समस्त अभिलाषाएँ