भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 750 में से

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३३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

निकल गयी हैं, ऐसा आत्मवान् ( तत्त्ववेत्ता ) पुरुष उपरत हुआ ही इस दृश्यमान अखिल जगत्को सर्वत्र सदा असत्-सा देखता है। जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है और जिसका मन विक्षेपरहित—शान्तियुक्त हो गया है, वह कैवल्यको प्राप्त महापुरुष आनन्दमें मग्न हुआ रहता है। शान्त बुद्धिसे सम्पन्न ज्ञानी महात्मा अन्तरात्मामें लीन दृष्टिसे जनताके व्यवहारोंको यन्त्रनिर्मित कठपुतलीके खेलके समान देखता है। तत्त्ववेत्ता पुरुष न भविष्यकी परवा करता है, न वर्तमानमे किसी पदार्थमें तन्मय होता है, न भूतकालीन वस्तुका स्मरण करता है और सब कुछ करता हुआ भी निर्लेप रहता है। तत्त्वज्ञानी सोता हुआ भी आत्मज्ञानमें जागता रहता है और जागता हुआ भी संसारसे निःस्पृह तथा उपरत रहता है। वह सब कुछ करता हुआ भी कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण कुछ भी नहीं करता। सम्पूर्ण संसारकी आसक्तिसे शून्य और सदा-सर्वदा सम्पूर्ण कामनाओसे रहित तत्त्ववेत्ता महात्मा सब कार्योंको करता हुआ भी समभावसे स्थित रहता है। वह तत्त्वज्ञ पुरुष उदासीन मनुष्यकी तरह स्थित रहता है। वह प्रारब्धानुसार प्राप्त हुई क्रियाओंमें न इच्छा करता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न प्रसन्न होता है। तत्त्वज्ञ महात्मा जब अपने मुखसे वाणीको प्रवृत्त करता है, तब पवित्र कथाओंको ही कहता है। उसका अन्तःकरण दीनतासे रहित रहता है। वह धीर बुद्धिवाला, प्रत्यक्ष आनन्दमें मग्न तथा दक्ष होता है और लोकमें उसके पुण्य चरित्रोंका वर्णन होता है। तत्त्वज्ञ उदार-चरित एवं उदार आकारसे युक्त, सम, सौम्य, सुखका समुद्र एवं स्निग्ध होता है; उसका स्पर्श शान्तिमय होता है और वह पूर्णचन्द्रकी तरह नित्य उदित रहता है। उसका न आवश्यक कर्मोंके तथा ऐहिक और आमुष्मिक फलके हेतुरूप कर्मोंके आरम्भसे, न कर्मोंके अभावसे, न बन्धनसे, न मोक्षसे, न पातालसे और न स्वर्गसे ही प्रयोजन होता है; क्योंकि सम्यक्-ज्ञानरूपी अग्निसे जिसके सन्देहरूपी जाल विनष्ट हो गये हैं, उस तत्त्वज्ञ महात्माने समस्त जगत्की स्वरूपभूत अद्वितीय परमात्मारूप यथार्थ वस्तुको भली प्रकार जान लिया है।

जिसका अन्तःकरण भ्रान्तिसे रहित होकर समतारूप ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित हो गया हो, वह आकाशकी तरह सभी दृष्टियोंमें न मरता है और न जन्मता है। देश और कालके अनुसार प्राप्त हुई क्रियाओंमें स्थित हुआ भी वह कर्मोंसे जनित सुख और दुःखकी प्राप्तिमें तनिक भी विकारवान् नहीं होता। वह प्राप्त हुई दुःखावस्थाकी उपेक्षा नहीं करता और न सुखावस्थाकी परवा ही करता है। न कार्योंके सफल होनेपर हर्षित होता है और न कार्योंके विनष्ट होनेपर खिन्न होता है। यदि सूर्य शीतल हो जाय, चन्द्रमा तपने लग जाय, अग्नि अधोमुख होकर जलने लगे, तो भी ( इस प्रकारकी विपरीत घटनाएँ होनेपर भी ) तत्त्वज्ञानी महात्माको आश्चर्य नहीं होता; क्योंकि तत्त्ववित् पुरुष यह जानता है कि चिन्मय परब्रह्म परमात्माकी ये असीम मायाशक्तियाँ इस प्रकार प्रस्फुरित हो रही हैं। इसलिये आश्चर्य-समूहोंके होनेपर भी उसको आश्चर्य नहीं होता। वह कभी भी दीनतायुक्त नहीं होता, न कभी उद्दण्ड होता है तथा न कभी उन्मत्त, खिन्न, उद्विग्न और हर्षयुक्त ही होता है। अर्थात् इन सब विकारोंका उसमें अत्यन्त अभाव होता है। उस परमात्मप्राप्त पुरुषके आकाशकी तरह अत्यन्त निर्मल, विशाल चित्तमें कोप आदि विकार उत्पन्न नहीं होते। सुख-दुःख दोनोंके क्षीण हो जानेसे उसके लिये हेय और उपादेय तथा शुभ और अशुभका भी विनाश हो जाता है; ऐसी स्थितिमें अनुकूल और प्रतिकूल कैसे रह सकते हैं। श्रीराम ! तिलोंके भस्म हो जानेपर तेलकी कल्पना ही कैसे हो सकती है। इसी प्रकार मूलसहित मनके विनष्ट हो जानेपर संकल्पकी चर्चा ही

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