भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके उपाय ३३९

क्या है। रघुनन्दन ! परमात्मासे पृथक् कोई भी पदार्थ नहीं है, इस प्रकारकी दृढ़ भावनाके कारण समस्त दृश्य पदार्थोंके संकल्प-विकल्पका अभाव करके सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकीभावसे स्थित ज्ञानी महात्मा नित्यतृप्त तथा अपने निरतिशयानन्दस्वरूपसे आनन्दवान् होकर स्थित रहता है। (सर्ग ७६-७७)


चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति, चित्त और प्राण-स्पन्दनका स्वरूप तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके अनेक उपाय

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे रात्रिमें जलती हुई लुकाठीको गोल घुमानेसे अग्निमय चक्र असत् होते हुए भी सत्-सा दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्तके संकल्पसे असत् जगत् सत्-सा दिखायी पड़ता है। जैसे जलके चारों ओर घूमनेसे जलसे पृथक् गोल—नाभिके आकारका आवर्त (भँवर) दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्तके संकल्प-विकल्पसे जगत् दिखायी पड़ता है। जैसे आकाशमें नेत्रोंके दोषसे असत् मोरके पंख और मोतीके समूह सत्य-से दिखायी पड़ते हैं, वैसे ही चित्तके संकल्पसे असत् जगत् सत्य-सा दिखायी पड़ता है। रघुनन्दन ! जैसे शुक्लत्व और हिम, जैसे तिल और तेल, जैसे पुष्प और सुगन्ध तथा जैसे अग्नि और उष्णता एक दूसरेसे मिले हुए और अभिन्नरूप हैं, वैसे ही चित्त और संकल्प एक दूसरेसे मिले हुए और अभिन्नरूप हैं। उनके भेदकी केवल मिथ्या कल्पना की गयी है। चित्तके विनाशके लिये दो उपाय शास्त्रोंमें दिखलाये गये हैं—एक योग और दूसरा ज्ञान। चित्तवृत्तिका निरोध योग है और परमात्माका यथार्थ अपरोक्ष साक्षात्कार ही ज्ञान है।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! प्राण और अपानके निरोधरूप योग नामकी किस युक्तिसे और कब मन अनन्त सुखको देनेवाली परम शान्तिको प्राप्त करता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे जल पृथ्वीमें चारों ओरसे प्रवेश करके व्याप्त होता है, वैसे ही इस देहमें विद्यमान असंख्य नाड़ियोंमें चारों ओरसे जो वायु प्रवेश करके व्याप्त होता है, वह प्राणवायु है। स्पन्दनके कारण भीतर क्रियाके वैचित्र्यको प्राप्त हुए उसी प्राणवायुके अपान आदि नामोंकी योगी-विवेकी पुरुषोंने कल्पना की है। जैसे सुगन्धका पुष्प तथा जैसे शुक्लताका हिम आधार है, वैसे ही चित्तका यह प्राण आधार है। प्राणके स्पन्दनसे चित्तका स्पन्दन होता है और चित्तके स्पन्दनसे ही पदार्थोंकी अनुभूतियाँ होती हैं, जिस प्रकार जलके स्पन्दनसे चक्कीकी तरह गोल आकारकी रचना करनेवाली लहरें उत्पन्न होती हैं चित्तका स्पन्दन प्राण-स्पन्दनके अधीन-है। अतः प्राणका निरोध करनेपर मन अवश्य उपशान्त (निरुद्ध) हो जाता है—यह बात वेद-शास्त्रोंको जानने-वाले विद्वान् कहते हैं। मनके संकल्पका अभाव हो जानेपर यह संसार विलीन हो जाता है।

श्रीरामजीने पूछा—महाराज ! देहरूपी घरमें स्थित हृदयादि स्थानोंमें विद्यमान नाड़ीरूपी छिद्रोंमें निरन्तर संचरण करनेवाले तथा मुख, नासिका आदि छिद्रोंमें निरन्तर गमनागमनशील प्राण आदि वायुओंका स्पन्दन कैसे रोका जा सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! शास्त्रोंके अध्ययन, सत्पुरुषोंके सङ्ग, वैराग्य और अभ्याससे सांसारिक दृश्य पदार्थोंमें सत्ताका अभाव समझ लेनेपर चिरकालपर्यन्त एकतानतापूर्वक अपने इष्टदेवके ध्यानसे और एक सच्चिदा-नन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थितिके लिये तीव्र अभ्याससे प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। सुखपूर्वक रेचक, पूरक और कुम्भक आदि प्राणायामोंके दृढ़ अभ्याससे तथा एकान्त ध्यानयोगसे प्राणवायु निरुद्ध हो जाता है। ॐकारका उच्चारण और ॐकारके अर्थका चिन्तन करनेसे बाह्य विषयोंके ज्ञानका अभाव हो जानेपर प्राण-