भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३४०* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वायुका स्पन्दन रुक जाता है। रेचक प्राणायामका दृढ़ अभ्यास करनेसे विशाल प्राणवायुके बाह्य आकाशमें स्थित हो जानेपर नासिकाके छिद्रोको जब प्राणवायु स्पर्श नहीं करता, तब प्राणवायुका स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम बाह्यकुम्भक प्राणायाम है। पूरकका दृढ़ अभ्यास करते-करते पर्वतपर मेघोंकी तरह हृदयमें प्राणोके स्थित हो जानेपर जब प्राणोंका संचार शान्त हो जाता है, तब प्राण-स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम आभ्यन्तर-कुम्भक प्राणायाम है। कुम्भकी तरह कुम्भक प्राणायामके अनन्तकालतक स्थिर होनेपर और अभ्याससे प्राणका निश्चल स्तम्भन हो जानेपर प्राणवायुके स्पन्दनका निरोध हो जाता है। इसीका नाम स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है।*


* रेचक, पूरक और कुम्भक—इन तीनों प्राणायामोंका योगदर्शनमें महर्षि पतञ्जलिने इस प्रकार वर्णन किया है।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ।
( योग० साधन० ४९ )

'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है। तात्पर्य यह कि प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना—प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका समान्य लक्षण है।

इस प्राणायामके तीन भेद हैं—

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ।
( योग० साध० ५० )

'उक्त प्राणायाम बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भ-वृत्ति—ऐसे तीन प्रकारका होता है तथा वह देश, काल और संख्याद्वारा देखा जाता हुआ लंबा और हल्का होता जाता है।'

प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक—रुक सके, रोके रखना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'वाह्यवृत्ति प्राणायाम' है। इसे रेचक भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है। अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लंबा) बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म (हल्का)—अनायाससाध्य हो जाता है।

जिह्वाके द्वारा तालुके मध्यभागमें रहनेवाली घण्टिकाको प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करनेसे जब प्राण ऊर्ध्वरन्ध्रमें (ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् कपाल-कुहरमें, जो सुषुम्णाके ऊपरी भागका द्वार कहा जाता है) प्रविष्ट हो जाता है, तब प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित होनेपर कोई भी नाम-रूप नहीं रहता, तब अत्यन्त सूक्ष्म चिन्मय-आकाशरूप परमात्माके ध्यानसे बाह्याभ्यन्तर सारे विषयोंके विलीन हो जानेपर प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। † नासिकाके अग्रभागसे लेकर बारह अंगुल-


प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है, वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'आभ्यन्तरवृत्ति प्राणायाम' है। इसे 'पूरक' प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।

शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने अथवा ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो—जहाँ हो वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है।

† इस प्राणायामका वर्णन योगदर्शनमें यों किया गया है—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः। ( योग० साधन० ५१ )

'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'

भाव यह है कि बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे—इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको परमात्मामें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके जानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है।

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