संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
| ३४० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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वायुका स्पन्दन रुक जाता है। रेचक प्राणायामका दृढ़ अभ्यास करनेसे विशाल प्राणवायुके बाह्य आकाशमें स्थित हो जानेपर नासिकाके छिद्रोको जब प्राणवायु स्पर्श नहीं करता, तब प्राणवायुका स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम बाह्यकुम्भक प्राणायाम है। पूरकका दृढ़ अभ्यास करते-करते पर्वतपर मेघोंकी तरह हृदयमें प्राणोके स्थित हो जानेपर जब प्राणोंका संचार शान्त हो जाता है, तब प्राण-स्पन्दन रुक जाता है। इसीका नाम आभ्यन्तर-कुम्भक प्राणायाम है। कुम्भकी तरह कुम्भक प्राणायामके अनन्तकालतक स्थिर होनेपर और अभ्याससे प्राणका निश्चल स्तम्भन हो जानेपर प्राणवायुके स्पन्दनका निरोध हो जाता है। इसीका नाम स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है।*
* रेचक, पूरक और कुम्भक—इन तीनों प्राणायामोंका योगदर्शनमें महर्षि पतञ्जलिने इस प्रकार वर्णन किया है।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ।
( योग० साधन० ४९ )
'आसन सिद्ध होनेके बाद श्वास और प्रश्वासकी गतिका रुक जाना 'प्राणायाम' है। तात्पर्य यह कि प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना—प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका समान्य लक्षण है।
इस प्राणायामके तीन भेद हैं—
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ।
( योग० साध० ५० )
'उक्त प्राणायाम बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भ-वृत्ति—ऐसे तीन प्रकारका होता है तथा वह देश, काल और संख्याद्वारा देखा जाता हुआ लंबा और हल्का होता जाता है।'
प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक—रुक सके, रोके रखना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'वाह्यवृत्ति प्राणायाम' है। इसे रेचक भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है। अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लंबा) बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म (हल्का)—अनायाससाध्य हो जाता है।
जिह्वाके द्वारा तालुके मध्यभागमें रहनेवाली घण्टिकाको प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करनेसे जब प्राण ऊर्ध्वरन्ध्रमें (ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् कपाल-कुहरमें, जो सुषुम्णाके ऊपरी भागका द्वार कहा जाता है) प्रविष्ट हो जाता है, तब प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित होनेपर कोई भी नाम-रूप नहीं रहता, तब अत्यन्त सूक्ष्म चिन्मय-आकाशरूप परमात्माके ध्यानसे बाह्याभ्यन्तर सारे विषयोंके विलीन हो जानेपर प्राणवायुका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। † नासिकाके अग्रभागसे लेकर बारह अंगुल-
प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना और साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है, वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'आभ्यन्तरवृत्ति प्राणायाम' है। इसे 'पूरक' प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।
शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने अथवा ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो—जहाँ हो वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है—यह 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है।
† इस प्राणायामका वर्णन योगदर्शनमें यों किया गया है—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः। ( योग० साधन० ५१ )
'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'
भाव यह है कि बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे—इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको परमात्मामें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके जानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है।
९२—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बनकर परमात्मप्राप्तिरूप मुक्ता-वस्थाका निरूपण**
उपशम-प्रकरण] * चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके उपाय * ३४१
पर्यन्त निर्मल आकाशमार्गमें नेत्रोंकी लक्ष्यभूत संविद्दृष्टि (वृत्तिज्ञान)-के शान्त हो जानेपर अर्थात् नेत्र और मनकी वृत्तिको रोकनेसे प्राणका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है।
अभ्याससे यानी योगशास्त्रोंमें प्रदर्शित पवन-निरोधके अभ्याससे ऊर्ध्वरन्ध्रके द्वारा (सुषुम्णामार्गसे) तालुके ऊपर जो ब्रह्मरन्ध्र है, उसमें स्थित प्राणवायु जब विलीन हो जाता है, तब प्राणवायुका स्पन्दन रुक जाता है। भृकुटीके मध्यमें चक्षु-इन्द्रियकी वृत्तिके शान्त होनेसे आज्ञाचक्रमें प्राणोंके विलीन हो जानेपर जब चिन्मय परमात्माका अनुभव हो जाता है, तब प्राणोंका स्पन्दन रुक जाता है। ईश्वरके अनुग्रहसे तुरंत उत्पन्न हुए दृढीभूत तथा समस्त विकल्पांशोंसे रहित परमात्मज्ञानके हो जानेपर प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। मननशील श्रीरामजी ! हृदयमें स्थित एकमात्र चिन्मय आकाशस्वरूप परमात्माके ज्ञानसे, विषय-वासनाके अभावसे और मनके द्वारा परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे प्राणोंका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! इस जगत्में प्राणियोंके उस हृदयका स्वरूप क्या है, जिसमें यह सब दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह स्फुरित होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में प्राणियोंके दो प्रकारके हृदय हैं—एक उपादेय और दूसरा हेय। अब तुम इनका विभाग सुनो। इयत्तारूपसे परिच्छिन्न इस देहमें वक्षःस्थलके भीतर शरीरके एक देशमें स्थित जो हृदय है, उसे तुम हेय हृदय जानो। चेतनमात्रस्वरूपसे स्थित हृदय (परमात्मा) को उपादेय कहा गया है। वह परमात्मा सबके भीतर और बाहर है और भीतर एवं बाहर नहीं भी है। अर्थात् संसारके प्रतीतिकालमें तो परमात्मा उसके भीतर और बाहर—सब जगह परिपूर्ण है और वास्तवमें वह संसारके भीतर-बाहर नहीं है; क्योंकि संसारका अत्यन्त अभाव है। अतः परमात्मा ही अपने आपमें नित्य स्थित हैं। वह उपादेय परमात्मा ही प्रधान हृदय है। उसीमें यह समस्त जगत् विद्यमान है, वही समस्त पदार्थोंका दर्पण है अर्थात् उसीमें यह संसार दर्पणमें प्रतिबिम्बकी ज्यों संकल्परूपसे स्थित है और वही सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कोष है। श्रीराम ! चेतन परमात्मा ही सभी प्राणियोंका हृदय कहा जाता है। जड और जीर्ण पत्थरके सदृश देहके अवयवका मांस-खण्डरूप एक अंश वास्तविक हृदय नहीं है। इसलिये चेतनस्वरूप विशुद्ध हृदय—परमात्मामें वासनाओंसे रहित होकर बलपूर्वक चित्तको लगानेसे प्राणका स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। इन पूर्वोक्त उपायोंसे तथा अन्यान्य अनेक तत्त्वज्ञ आचार्योंके मुखसे उपदिष्ट नाना संकल्पोंसे कल्पित उपायोंसे प्राण-स्पन्द निरुद्ध हो जाता है। ये पूर्वोक्त योगविषयक युक्तियाँ अभ्यासके द्वारा ही श्रेष्ठ साधकके लिये संसारका उच्छेदन करनेमें बाधारहित उपाय हैं। भ्रू, नासिका, तालुसंस्थान तथा कण्ठाम्र-प्रदेशसे लेकर बारह अङ्गुल-परिमित प्रदेशमें अभ्याससे प्राण लीन हो जाता है अर्थात् प्राणोंका निरोध हो जाता है। अभ्याससे ही पुरुष आत्माराम, वीतशोक तथा परमात्माकी प्राप्तिरूप भीतरी सुखसे पूर्ण होता है। उस परमपदरूप परमात्मामें यह समस्त जगत् विद्यमान है; उससे यह सब उत्पन्न हुआ है, वह समस्त जगत्का स्वरूपभूत है और वह इस जगत्के चारो ओर विद्यमान है। किंतु वास्तवमें उसमें न तो यह दृश्यमान समस्त जगत् विद्यमान है, न यह उससे उत्पन्न हुआ है और न जगत् उसका स्वरूप ही है। वास्तवमें इस प्रकारका जगत् है ही नहीं, प्रत्युत वह परमात्मा स्वयं ही अपने आपमें स्थित है। श्रीराम ! जो महाबुद्धिमान् ज्ञानी महात्मा पुरुष सारी सीमाओंके अन्तरूप उस परमपदका अवलम्बन करके स्थित रहता है, वह स्थितप्रज्ञ, तत्त्ववेत्ता, जीवन्मुक्त कहलाता है। जिस महात्माकी समस्त कामोपभोगोंकी
३४२ * अविच्छिन्नविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इच्छाएँ निवृत्त हो गयी हैं, जिसका सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुकूलता और प्रतिकूलतारूप संकल्प निवृत्त हो गया है तथा जिसका अन्तःकरण समस्त व्यवहारोंमें हर्ष और विषादसे रहित तथा सम हो गया है एवं जिसका मन शान्त हो चुका है, वह महात्मा सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। (सर्ग ७८)
चित्तके उपशमके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय एवं विवेक-विचारके द्वारा चित्तका विनाश होनेपर ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! उपर्युक्त दो उपायोंमेंसे आपने योगयुक्त पुरुषके चित्त-विनाशका ही निरूपण किया है। अब आप अनुग्रह करके मुझसे यथार्थ ज्ञानका सम्यक् प्रकारसे निरूपण कीजिये।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! इस जगत्में आदि और अन्तसे रहित प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही है—इस प्रकारका जो दृढ़ निश्चय है, उसी निश्चयको ज्ञानी महात्मागण सम्यक् ज्ञान यानी परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। ये जो घट-पट आदि आकारोंसे युक्त पदार्थोंके सैकड़ों समूह हैं, वे सब परमात्मस्वरूप ही हैं; उससे भिन्न अन्य कुछ नहीं है—इस प्रकारका दृढ़ निश्चय ही परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान न होनेसे जन्म होता है और परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष होता है। रज्जुका यथार्थ ज्ञान न होनेसे रज्जु सर्परूप प्रतीत होती है और उसका यथार्थ ज्ञान होनेसे रज्जु सर्परूप नहीं प्रतीत होती यानी रज्जु रज्जुरूप ही दिखायी पडती है। इस मुक्तिमें संकल्पसे सर्वथा रहित, समस्त विषयोंसे रहित केवल चिन्मय परमात्मा ही सच्चिदानन्दरूपसे विराजमान रहता है; उससे अन्य कुछ भी नहीं रहता। इन तीनो लोकोंमें यथार्थ आत्मदर्शन इतना ही है कि यह सब जगत् परमात्मा ही है, ऐसा निश्चय करके पुरुष पूर्णताको प्राप्त हो जाय। उस परमात्मासे भिन्न न तो दृश्य जड जगत् है और न मन है। ब्रह्म ही यह दृश्य रूप बनकर चेष्टा कर रहा है। समस्त ब्रह्माण्ड एक चिन्मय आकाशरूप विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है; अतः क्या मोक्ष है और क्या बन्धन है।
जितने बड़े-से-बड़े पदार्थ हैं, उन सबसे भी ब्रह्म महान् है। जैसे काष्ठ, पाषाण और वस्त्र आदि सब कुछ पृथ्वी ही है—इस प्रकारका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर उनमें तनिक भी भेद नहीं रह जाता, वैसे ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं रहती। रघुनन्दन ! आदि और अन्तमें जो अविनाशी, पूर्ण, शान्त-स्वरूप है, वास्तवमें वही सच्चिदानन्दघन परमात्मा है। जो महात्मा उस विशुद्ध परमात्माका अनुभव करके अन्तःस्थ बुद्धिसे सदा-सर्वदा स्थित रहता है, वह तत्त्वज्ञानी आत्माराम पुरुष भोगोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे मन्द पवन पर्वतका भेदन नहीं कर सकते, वैसे ही जिस ज्ञानीने प्रकाशमान परमात्माका पूर्णरूपसे अनुभव कर लिया है, उस तत्त्वज्ञके अन्तःकरणको काम आदि शत्रु तनिक भी भेदन (विचलित) नहीं कर सकते। जैसे जलसे बाहर निकली हुई मछलीको बगुले निगल जाते हैं, वैसे ही इस संसारमें आशाओमें निरत, मूढ़, अज्ञानी और अविचारी पुरुषको दुःख निगल जाते हैं। श्रीराम ! जैसे अनेक प्रकारके सरोवरोंमें जल, फेन आदि जलसे पृथक् नहीं हैं, वैसे ही दृश्य जगत् ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। केवल कल्पनाओमें ही नानात्व है, वास्तवमें नानात्व नहीं है—इस प्रकार विवेकपूर्वक भलीभाँति अर्थको जान लेनेवाला एक निश्चययुक्त ज्ञानी पुरुष विमुक्त कहा जाता है।
श्रीराम ! अपने हृदयमें ब्रह्मविषयक विचार करनेवाले विवेकी वीतराग पुरुषकी सर्वदा सम्मुखस्थित सांसारिक भोगोंमें भी रुचि उत्पन्न ही नहीं होती। अधम नेत्र ! स्त्री,
उपशम-प्रकरण ] * चित्तके उपशामके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय, ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति * ३४३
पुत्र आदिके सौन्दर्यरूप रूपात्मक कीचड़का तुम आस्वादन मत करो। यह रूप क्षणमें ही विनष्ट हो जानेवाला है और तुम्हें भी विनष्ट कर देनेवाला है। नेत्र ! जो उत्पत्ति-विनाशशील है और जो केवल देखने-मात्रमें ही रमणीय प्रतीत होता है, ऐसे मिथ्या रूप-सौन्दर्यका तुम उस अवश्यम्भावी मृत्युके मुखमें प्रवेश करनेके लिये आश्रय मत लो । जैसे वास्तवमे परस्पर असम्बद्ध मुख, दर्पण और प्रतिबिम्ब एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं, वैसे ही वास्तवमें परस्पर एक दूसरेसे असम्बद्ध रूप, प्रकाश और मन एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं। जैसे दो काठ लाहके द्वारा एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये रूप, आलोक और संकल्प आदि मनन चित्तकी कल्पनासे एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं। अपने चित्तका संकल्प-विकल्पात्मक तन्तु विवेकशील बुद्धिके द्वारा यत्नपूर्वक किये गये विवेक-विचाररूप अभ्याससे विनष्ट हो जाता है। फिर उस तन्तुके नष्ट हो जानेपर स्वभावत. ही अज्ञान-भावना प्रवृत्त नहीं होती। अज्ञान-के विनाशसे क्षीण हुए मनमें फिर ये रूप, आलोक और मनन—कोई भी एक दूसरेसे संघटित नहीं होते।
चित्त ! तुम मिथ्या ही उछल-कूद मचाते हो। मैंने तुम्हारे उच्छेदके लिये उपाय ढूंढ निकाला है। तुम आदि और अन्त दोनोंमें नितान्त तुच्छ (क्षणभङ्गुर) हो, इसलिये वर्तमान कालमें भी विनष्ट ही हो। तुम इन्द्रियोंसे सम्बद्ध शब्द आदि पाँच विषयोंके द्वारा अपने भीतर क्यों वृथा उछल रहे हो ? जो मनुष्य तुम्हें अपना मानता है, उसीके सामने तुम उछल-कूद कर सकते हो । किंतु दुष्ट चित्त ! तुम्हारी उछल-कूदसे मुझे तनिक भी प्रसन्नता नहीं होती। तुम रहो चाहे जाओ, तुम न तो मेरे हो और न तुम जीते हो। विचार करनेपर अपने मिथ्या स्वभावसे तुम सदा मृतक ही हो। तुम साररहित जड, भ्रान्त और शठ हो । तुम्हारा आकार अत्यन्त विनाशशील है। अज्ञानस्वरूप तुम्हारे द्वारा अज्ञानी पुरुषको ही बाधा पहुँच सकती है, विचारवान् विवेकी पुरुषको नहीं।
जगद्रूपी-चित्त-वेताल ! शठरूप तुम पहले ही नहीं थे, वर्तमान कालमें भी नहीं हो और आगे भी नहीं रहोगे। इस प्रकार तुम्हारी तीनों कालोंमें सत्ता नहीं है। बिना हुए ही तुम कायम हो । तुम्हें क्या लज्जा नहीं आती ? चित्तरूपी वेताल ! तृणारूपी पिशाचिनियों तथा क्रोध आदि गृध्रोंके साथ तुम मेरे शरीररूपी घर-से बाहर निकल जाओ। बड़े आश्चर्यकी बात है कि महान् जड एवं क्षणभङ्गुर शठ मनने इस समस्त जन-समूहको विवश कर रखा है। अज्ञानी दीन चित्त! मैं आज तुमको मारता नहीं हूँ; क्योंकि तुम पहलेसे ही मर चुके हो, यह मैंने जान लिया है। चित्त मरा हुआ है; अतः उसका अस्तित्व ही नहीं है—यह मैंने आज जान लिया । इसलिये मैं चित्तके आश्रयका परित्याग करके केवल अपने आत्मामें ही स्थित हूँ। मनको देहरूपी घरसे क्षणभरमें निकालकर मैं इस वेतालरूप मनसे रहित हो भीतरसे स्वस्थ हुआ स्थित हूँ। भाग्यवश बहुत कालके अनन्तर अब मैंने विचाररूपी तलवारसे पीडितकर चित्तरूपी वेतालको, जो ताल वृक्षके सदृश ऊँचाईसे युक्त है, हृदय-मन्दिरसे हटा दिया है। चित्तरूपी वेतालके शान्त हो जाने और पवित्र पदवीको प्राप्त कर लेनेपर अब उत्तम भाग्यसे शरीररूपी नगरमें केवल मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ । विवेक-विचाररूपी मन्त्रसे मन, चिन्ता और अहंकाररूपी राक्षसका विनाश हो गया । अब समस्त विषमताओंसे रहित मैं केवल अपने स्वरूप-में ही स्थित हूँ । एक, कृतकृत्य, नित्य, विशुद्ध-स्वरूप तथा निर्विकल्प सच्चिदानन्दघन परमात्मरूप मुझको बार-बार नमस्कार है । विकारशून्य, नित्य, अंगरहित, सर्वरूप तथा सर्वकालात्मक परमात्मस्वरूप मुझको बार-बार नमस्कार है। नाम और रूपसे रहित, प्रकाश
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रूप, स्वयं अपने आपमें ही स्थित अद्वितीय सच्चिदानन्द-घन परमात्मस्वरूप मुझको ही बार-बार नमस्कार है । मननरहित, सम, अत्यन्त सुन्दर समस्त विश्वका आविर्भाव करनेवाले, वास्तवमें विश्वरहित, अनन्त, खस्वरूप, अजन्मा, जरारहित, समस्त गुणोंसे अतीत तथा अविनाशी विज्ञानानन्दघन परमेश्वरके स्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ।
रघुनन्दन ! जैसे आकाशमें दृष्टिदोषसे प्रतीत होनेवाला वृक्ष भ्रमवश वृक्षरूपमें प्रतीत होता है, वास्तवमें वह विशुद्ध आकाशस्वरूप ही है, उससे पृथक् आकाश-वृक्ष नहीं है, वैसे ही चित्त अविद्यमान, जड और मायाका कार्य होनेसे निश्चयरूपसे असत् ही है, वह परमात्मासे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है । जैसे नौकामें स्थित अज्ञानी बालकको तटवर्ती वृक्ष और पहाड़में प्रतीत होनेवाली गति केवल भ्रान्तिसे ही दिखायी पड़ती है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्यको यह चित्त दिखायी पड़ता है। किंतु आत्मज्ञानी तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें वह असन्मय ही है—है ही नहीं। मेरे समस्त संदेह शान्त हो चुके हैं, समस्त चिन्ताज्वरोंसे रहित होकर मैं स्वानुभावसे ही इच्छाओंसे रहित हुआ स्थित हूँ । मेरा चित्त मर गया, तृष्णाएँ हट गयीं और मैं मोह तथा अहंकारसे रहित हो गया । इससे मैंने अपने स्वाभाविक—वास्तविक स्वरूपको जान लिया । जगत् शान्त होकर अद्वितीय परब्रह्मस्वरूप ही हो गया और नानात्व वास्तवमें है ही नहीं । जीवत्वसे तथा आदि और अन्तसे रहित पवित्र परमपदको मैं प्राप्त हो गया हूँ । अतः मैं सौम्य, सर्वत्र व्यापक, अतिसूक्ष्म, सनातन परमात्मस्वरूपसे स्थित हूँ । श्रीराम ! इस प्रकारकी बुद्धिसे तत्त्वज्ञानी पुरुषको खाते, चलते, सोते और स्थित रहते सदा-सर्वदा सर्वत्र प्रतिदिन भलीभाँति विचार करना चाहिये । जिनका अन्तःकरण प्रमुदित है, जिनकी शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी तरह चमकीली मुखकान्ति है और जो प्राप्त हुए शास्त्रानुमोदित व्यवहारोंमें विहार करते हैं, वे असीम बुद्धिवाले महापुरुष इस संसारमें मान और मदसे रहित हुए सुखपूर्वक विचरण करते हैं। (सर्ग ७९—८१)
वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैंने तुम्हें जिस विचारका दिग्दर्शन कराया है, उस विचारको पहले विद्वान् संवर्त (बृहस्पतिके छोटे भाई) ने किया था । विन्ध्याचल पर्वतके ऊपर उसी आत्मतत्त्वज्ञ संवर्तने उक्त विचारको मुझसे कहा था । अब तुम इस दूसरी दृष्टिका, जो परमपदको प्रदान करनेवाली है, श्रवण करो । इसी दृष्टिसे महामुनि वीतहव्यने निःशङ्क परमपदको प्राप्त किया था । एक समयकी बात है, महामुनि वीतहव्य संसाररूपी भ्रम प्रदान करनेवाले घोर आधि-व्याधिमय आकारयुक्त सांसारिक क्रियाकलापोंसे वैराग्ययुक्त होकर विरक्त अवस्थाको प्राप्त हो गये और केवल निर्विकल्प समाधिसे प्राप्त होनेवाले परम उदार परब्रह्म परमात्माको जाननेकी इच्छासे ही उक्त महामुनिने अपने सांसारिक व्यवहारोंका त्याग कर दिया । तदनन्तर महामुनि वीतहव्यने स्वरचित पर्णकुटीमें प्रवेश किया । उस पर्णकुटीमें अपने द्वारा बिछाये गये सम और शुद्ध आसनपर वे बैठ गये । फिर बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका परित्याग करते हुए उन महामुनिने विशुद्ध मनसे क्रमशः इस प्रकार विचार
उपशम-प्रकरण ] * वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना * ३४९
किया—'कितने आश्चर्यकी बात है कि यह अत्यन्त चञ्चल मन किसी एक निश्चित विषयमें लगाया जानेपर भी क्षणभर भी उसी प्रकार स्थिर नहीं होता, जैसे तरङ्गोके द्वारा बहाया गया पत्ता स्थिर नहीं होता । मन घटसे पटके ऊपर और पटसे उत्कट शकटके ऊपर कूद जाता है। यों यह चित्त विषयोपर उसी प्रकार दौड़ता है, जिस प्रकार वृक्षोके ऊपर बन्दर दौड़ता है। इन्द्रियगण ! तुम-लोग मनके ही अलग-अलग द्वार हो, अतएव निश्चित ही अधम और जड हो । मै तो सच्चिदानन्दघन परमात्म-स्वरूपमें स्थित हुआ साक्षीरूपसे सब कुछ कह रहा हूँ। चक्षुरादि इन्द्रियगण ! आकारसे रहित तुमलोग मेरे सामने मिथ्या ही उछल-कूद कर रहे हो । तुमलोग अलातचक्रके सदृश और रज्जुमें सर्पभ्रमके सदृश मिथ्यारूप ही हो । जैसे सर्पोंसे डरा हुआ पथिक उनसे दूर रहता है, वैसे ही दोषरहित चेतन आत्मा इन्द्रियोंसे सर्वथा दूर रहता है । इन्द्रियगण ! केवल चेतन सत्ताकी संनिधिसे ही तुम लोगोंकी परस्पर चेष्टा होती रहती है।
'मूर्ख मन ! मैं चेतन हूँ' इस प्रकारकी तुम्हारी वासना मिथ्या और निरर्थक है; क्योंकि एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न धर्मवाले चेतन और जड मनकी एकता नहीं हो सकती । चित्त ! अहंकारके उत्पन्न होनेपर 'यह शरीर मैं ही हूँ' इस प्रकारका जो तुम मिथ्या अभिमान करते हो, उसे छोड़ दो । मूर्ख ! तुम कुछ भी नहीं हो; इसलिये क्यों व्यर्थ चञ्चल हो उठते हो ? ज्ञान-स्वरूप चेतन आत्मा अनादि और अनन्त है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। इसलिये महामूर्ख ! इस शरीरमें चित्त नामवाले तुम कहाँसे आये ? मूर्ख चित्त ! चक्षु आदि इन्द्रियगणोंका आश्रय करके तुम उपहासके पात्र मत बनो । तुम न तो कर्ता हो और न भोक्ता हो, किंतु जड हो । तुम अन्यके द्वारा—द्रष्टा-साक्षी आत्माके द्वारा जाने जाते हो । जो जडस्वरूप है, उसका अस्तित्व ही नहीं। अतः उस जडमें ज्ञातापन, कर्तापन, भोक्तापन नहीं हो सकते । चित्त ! तुम स्वयं ही जडरूप हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। भला, बतलाओ तो सही, जडमें कैसे कर्तापन रह सकता है । क्या यहाँ पत्थरकी मूर्तियाँ भी किसी प्रकार नाच सकती हैं ? जिसकी शक्तिसे जो किया जाता है, वह उसीके द्वारा किया हुआ होगा। पुरुषकी शक्तिसे दराती (हँसुआ) काटती है, पर काटनेवाला पुरुष कहलाता है। जिसकी शक्तिसे जिसका वध किया जाता है, वह उसीके द्वारा हत कहा जायगा। पुरुषकी शक्तिसे तलवार हनन करती है, पर हनन करनेवाला पुरुष ही कहा जाता है। जिसकी शक्तिसे जो पिया जाता है, वह उसीके द्वारा पिया गया कहा जायगा। पात्रके द्वारा जल आदि पिये जाते हैं; पर जो मनुष्य है, वही पीनेवाला कहा जाता है, पात्र नहीं। मेरे प्यारे चित्त ! तुम स्वभावसे ही जड हो, पर उसी सर्वज्ञ साक्षीके द्वारा बोधित होते हो; क्योंकि जीवात्मा ही अपनेको अपनेसे भोक्ता, भोग्य, करण, उपकरण आदि जगत्के रूपमें स्वप्नकी तरह रचता है । इससे तुम
३४६ :. अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् : [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तत्त्वरहित हो, तुम मूढ़ हो और वास्तवमें तुम्हारा कोई अस्तित्व ही नहीं है । इसलिये तुम्हें 'मैं तत्त्वरूप ही हूँ' ऐसा दुःखदायी मिथ्याभाव नहीं करना चाहिये । वास्तवमें बाजीगरकी रची हुई ऐन्द्रजालिक लताके समान चित्तकी कल्पना मिथ्या है तथा इस ब्रह्माण्डमें एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका स्वरूप ही सर्वत्र विराजमान है ।
'अज्ञानी चित्त ! वह परमपद सर्वत्र व्यापक, सारे पदार्थोंमें स्थित और सबका स्वरूप है । उसकी प्राप्ति हो जानेपर मनुष्यको सदा-सर्वदा सभी कुछ प्राप्त हो जाता है । चित्त ! उस समय न तो तुम रहते हो और न देह ही पृथक् रहता है; किंतु एक महान् प्रकाशस्वरूप, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित रहता है । स्वभावसे ही प्रकाशस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, अद्वितीय चेतन परमात्माने ही इस समस्त ब्रह्माण्डको परिपूर्ण कर रक्खा है । इसलिये उसके सिवा दूसरी कोई कल्पना ही नहीं हो सकती । वही एक और अनेक—सबका प्रकाशक है, समस्तरूप है । उसी परमात्माने अपने आपमें संकल्पसे इस जगत्की रचना की है । ऐसी स्थितिमें कौन किसकी कैसे इच्छा करेगा ? किंतु चित्त ! तुम्हारे-जैसे मूर्खोकी दृष्टिसे ही इस जगत्में व्यर्थ चञ्चलता उत्पन्न होती है, जिस प्रकार राजाकी स्त्री-को देखकर मूर्ख युवा पुरुषको मदमयी चञ्चलता उत्पन्न होती हैं । परंतु कल्पना और मननसे रहित आत्मामें कर्तृत्व कैसा । क्या कहीं आकाशमें पुष्प किसी तरह उत्पन्न हो सकता है ? जैसे आकाशमें हाथ, पैर आदि अङ्ग हो ही नहीं सकते, वैसे ही आत्मामें कर्तृत्व हो ही नहीं सकता; जैसे समुद्रमें तप्त अङ्गार नहीं रह सकता, वैसे ही परमात्मामें दूसरी कोई कल्पना रह ही नहीं सकती । इस प्रकार जब परमात्मदेवमें कल्पनाका अभाव है तथा मन एवं देह जड है, तब विवेकदृष्टिसे 'यह अन्य है, यह अन्य नहीं है; यह शुभ है, यह अशुभ है' इत्यादि असत् कल्पनाएँ नहीं रह सकतीं । ऐसी स्थितिमें सुन्दर चित्त ! विषयसे रहित चेतन परमात्मा ही सारभूत वस्तु है, दूसरी नहीं । चित्त ! जैसे आकाशमें वन नहीं है, वैसे ही पूर्वोक्त असत् कल्पनाएँ आत्मामें हैं ही नहीं । दृश्यसे रहित केवल चेतन ही इस जगत्के रूपमें विस्तृत हुआ है । इसलिये उसमें 'यह मै हूँ, यह अन्य है' इस प्रकारकी असत् कल्पनाएँ हो ही कैसे सकती हैं । अनादि, रूपरहित, सर्वगामी और व्यापक परमात्मामें कल्पनाओंका कौन कैसे आरोप कर सकता है । क्या कोई आकाशमें ऋग्वेद आदिको लिख सकता है !'
( सर्ग ८२ )
इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा उनके शमनसे समस्त गुणोंकी और परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मुनियोंमें श्रेष्ठ धीर वीतहव्य मुनिने विशुद्ध धारणासे युक्त बुद्धिसे एकान्तमे स्थित होकर पुनः अपनी इन्द्रियोंको भलीभाँति इस प्रकार समझाया—'इन्द्रियगण ! मेरे पूर्वमे किये गये आत्मतत्त्वके उपदेशसे तुमलोगोकी यह मिथ्याभूत सत्ता नष्ट ही हो गयी, ऐसा मै मानता हूँ; क्योंकि तुम अज्ञानसे उत्पन्न हुए हो । चित्त ! तुम देखो कि तुम्हारे कायम रहनेसे अज्ञानी मूर्खोके राग-द्वेष आदि तरङ्गोसे युक्त संसाररूपी नदियोंका समूह कालरूपी विशाल समुद्रमें प्रविष्ट हो रहा है । देखो ! एक दूसरोके अहंकारसे होनेवाले एक दूसरोके वध, पराजय, उत्पीड़न आदिकी चिन्ताओसे युक्त दुःखकी पंक्तियाँ कहींसे उसी प्रकार गिर रही हैं, जिस प्रकार वृष्टिकी धाराएँ गिर रही हो । अपने विलासोसे शब्द करता हुआ लोभरूपी पक्षी राग-द्वेषरूप अपने तीक्ष्ण छोर-द्वारा इस जीर्ण शरीररूपी वृक्षके शम, दम आदि गुण-
उपशम-प्रकरण ] * इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा शमनसे परमात्माकी प्राप्ति * ३४७
समूहरूपी फल-पुष्पोंको कतर रहा है। अपवित्र, दुष्ट आचरण करनेवाला कामरूपी कर्कश मुर्गा हृदयके राग-द्वेष आदि दोषरूप कूड़ेके ढेरको इधर-उधर बिखेर देता है। मोहरूपी महारात्रिमें भयावह अज्ञानरूपी उलूक हृदयरूपी वृक्षके ऊपर श्मशानमें वेतालकी भाँति चारों ओरसे प्रलाप कर रहा है। इन्द्रियगण ! आप-लोगोंके विद्यमान रहनेपर ये और इनसे दूसरी भी बहुत-सी इच्छा, कामना, वासना, स्पृहा आदि अशुभ स्त्रियाँ रात्रिमें पिशाचिनियोंकी तरह उछल-कूद मचाती रहती हैं। चित्त ! तुम्हारे विनाश होनेपर समता, शान्ति, सरलता, क्षमा, दया आदि सम्पूर्ण शुभ स्त्रियाँ ज्ञानरूपी प्रकाशसे युक्त हो उसी प्रकार पूर्णरूपसे प्रफुल्लित हो उठती हैं, जिस प्रकार प्रातःकालमें कमलिनियाँ। अब मोहरूपी तुषारसे रहित, रजोगुणरूप रेणुसे शून्य, निर्मल ज्ञानके प्रकाशसे युक्त हृदयाकाशरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म शोभित हो रहा है। आकाशमण्डलसे गिरनेवाली और वायु आदिसे आकुलित वृष्टिधाराओंकी तरह दुःखदायी विकल्प-समूह अब नहीं गिरते। सबको आह्लादित करनेवाली, शान्त, परम पवित्र मित्रता हृदयमें उत्पन्न हो रही है।
'अज्ञानका विनाश होनेपर हृदयमें ज्ञानका प्रकाश उसी प्रकार प्रकट हो रहा है, जिस प्रकार शरत्कालमें मेघोंके शान्त हो जानेपर निर्मल आकाशमें सूर्यमण्डल प्रकट होता है। वायुके शान्त होनेपर समुद्र जैसे सम हो जाता है, वैसे ही प्रसन्न, विशाल, गम्भीरतासे युक्त, क्षोभशून्य तथा राग-द्वेष आदि दोषोंसे रहित वशमें किया हुआ मन सम हो जाता है। परमात्माकी प्राप्तिरूप अमृत-प्रवाहसे पूर्ण तथा अविनाशी आनन्दसे सम्पन्न पुरुष शान्तिसे युक्त रहता है। केवल सच्चिदानन्द परमात्मामें विश्राम हो जानेपर परमात्माके स्वरूपका पूर्णरूपसे अनुभव हो जाता है। चित्त ! तुम्हारा स्वरूप अविचारके कारण ही कायम है। विवेकपूर्वक विचार करनेपर तुम कायम नहीं रहते। किंतु केवल एक समस्वरूप परमात्मा ही भलीभाँति समभावसे स्थित रह जाता है। विचार न करनेपर तुम उसी प्रकार उत्पन्न होते हो, जिस प्रकार प्रकाशके न रहनेपर अन्धकार। चित्त ! विचारसे तुम्हारा स्वरूप उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जिस प्रकार प्रकाशसे अन्धकार। क्योंकि जिसकी अविवेकसे उत्पत्ति होती है, उसका विवेकसे विनाश हो जाता है—जैसे प्रकाशसे अन्धकारका विनाश होता है और प्रकाशका अभाव होनेपर अन्धकार हो जाता है। तुम्हारी इच्छा न रहने-पर भी विचारके दृढ़ होनेपर सुखकी सिद्धिके लिये तुम्हारा चारो ओरसे यह विनाश प्राप्त हुआ है। ( अब वीतहव्य मुनि अपनी स्थितिका वर्णन करते हैं— ) सौभाग्यवश मैं समस्त चिन्ता-ज्वरोंसे मुक्त हो गया हूँ, शान्त हो गया हूँ और चारो ओरसे तृप्त हो गया हूँ। मै तुरीयपदरूप परमात्मस्वरूप अपनी आत्मा-में स्थित हो गया हूँ। इसलिये यह निश्चय हुआ कि इस संसारमें जिसकी स्थिति विवेकपूर्वक विचार करनेपर कायम हो ही नहीं सकती, वह चित्त है ही नहीं, है ही नहीं। किंतु परमात्मा तो अवश्य ही है, अवश्य ही है। परमात्माको छोड़कर और कुछ भी उससे भिन्न है ही नहीं। सब प्रकारके मलोंसे रहित आत्माके अंदर 'यह आत्मा है' इस प्रकारकी कल्पना ही नहीं हो सकती, यह मै मानता हूँ; क्योंकि एक अद्वितीय आत्मामें इदं-रूपसे अन्य वस्तुकी सत्तासे होनेवाली कल्पना कैसे हो सकती है। इसी कारण 'मै यह आत्मा हूँ' इस प्रकार कल्पना न करता हुआ मै मौनी होकर उसी प्रकार अपने विज्ञानानन्दघन परमात्मस्वरूपमें स्थित हूँ, जिस प्रकार जलमें तरङ्ग। अतः उस वासनाशून्य, जीवके आश्रयसे रहित, प्राण-संचारसे रहित, भेदभावसे शून्य, दृश्यसे रहित, ज्ञानस्वरूप, मन और वाणीकी चेष्टासे शून्य विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करके मै परम शान्त हूँ।'
(सर्ग ८३)
३४८ ॐ अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् ॐ [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, छः रात्रितक पुनः समाधि, चिरकालतक जीवन्मुक्त स्थिति, उनके द्वारा दुःख-सुकृत आदिको नमस्कार और उनका परमात्मामें विलीन हो जाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार निर्णय करके वे मुनिवर वीतहव्य समस्त वासनाओंको छोड़कर विन्ध्य पर्वतकी गुफामें समाधि लगाकर उसमें अचल स्थित हो गये। उस समय महामुनि वीतहव्य
सब प्रकारके क्षोभसे शून्य परिपूर्ण चेतन विज्ञान आनन्दसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुशोभित हुए। उनका मन अत्यन्त विलीन हो गया था; अतएव वे ऐसे भले लगते थे, जैसे प्रशान्त समुद्र भला लगता है। जिस प्रकार ईंधनके जल जानेपर अग्निमें ज्वालाओंका संचरण शान्त हो जाता है, वैसे ही उन महामुनिका प्राणसंचार क्रमशः भीतर हृदयमें ही शान्त हो गया। समाधिमें स्थित महामुनि वीतहव्यके दोनों नेत्र ऐसे दिखायी पड़ते थे, जैसे उनकी वृत्ति नासिकाके अग्रभागमें दोनों ओर बराबर फैली हुई हो। महाबुद्धि वीतहव्यने अपने आसन-बन्धमें शरीर,
सिर और ग्रीवाको समानरूपसे रक्खा था; इसलिये वे ऐसे जान पड़ते थे, जैसे पत्थरपर खोदी गयीं या चित्रमें लिखी गयी मूर्ति हो। श्रीराम ! विन्ध्याद्रिके किसी झरनेके निकट गुफामें इस प्रकारकी समाधिमें स्थित महामुनि वीतहव्यके तीन सौ वर्ष आधे मुहूर्तकी तरह व्यतीत हो गये। परमात्मामें स्थित ध्यान-निमग्न उन मुनिने जीवन्मुक्तताके कारण इतने कालको कुछ भी नहीं समझा और अपने उस शरीरका त्याग भी नहीं किया। योगके रहस्यको जाननेवाले परम भाग्यशाली वे मुनि महान् मेघोंके चारों ओर फैलनेवाले शब्दोंसे, बरसती हुई वृष्टिकी धाराओंके गिरनेसे उत्पन्न घर-घर शब्दोंसे, सिंहोंके क्रोधपूर्वक गर्जनोंसे, झरनोंकी दिग्व्यापी घर्घराहटसे, भयंकर वज्रपातोंसे, मनुष्योंके घने कोलाहलोंसे, भूकम्पके द्वारा छिन्न-भिन्न हुए पर्वत-तटोंकी हलचलोंसे तथा अग्निकी तरह कर्कश ग्रीष्म आदिके तापोंसे भी उतने समयतक समाधिसे जागे नहीं। थोड़े ही समयमें उस पर्वतकी गुफामें वर्षाके कीचड़से ढके हुए महामुनि वीतहव्य पृथ्वीमें निमग्न-से प्रतीत होते थे। उस गुफाकी भूमिमें ये मुनि कीचड़से लथपथ होकर उसी प्रकार रहते थे, जिस प्रकार पर्वतके अंदर शिला। तदनन्तर तीन सौ वर्ष बीत जानेपर पृथ्वीकी गुफामें दबे हुए वे निग्रहानुग्रह-समर्थ तथा परमात्माको प्राप्त महामुनि स्वयं ही समाधिसे जाग गये। राघव ! तत्पश्चात् महामुनि वीतहव्यने सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मभाव होनेके कारण अनेक लोकोंका ब्रह्मरूपसे अनुभव किया और वर्तमान समयमें कर भी रहे हैं। श्रीराम ! आपका भी यह जगत् मनोमय, भ्रमतुल्य एवं परमार्थ-दशामें जिस प्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप है, उसी प्रकार महामुनि वीतहव्यका भी वह जगत् मनोमय,
उपशम-प्रकरण ] * वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, परमात्मामें विलीन हो जाना * ३४९
भ्रमतुल्य एवं परमार्थ-दशामें सच्चिदानन्दस्वरूप है। जबतक इस प्रकार जगत्को तत्त्वज्ञानद्वारा सच्चिदानन्द-रूप नहीं जाना जाता, तबतक वह हृदयमें वज्रसारकी तरह अत्यन्त दृढ़ रहता है; किंतु यथार्थरूपसे जान लिये जानेपर वह सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है।
श्रीराम ! दिनकी समाप्तिके बाद मुनिने फिर भी मनकी एकाग्रतारूप समाधिके लिये उसी पूर्व-परिचित विन्ध्याद्रिकी गुफामें प्रवेश करके विचार किया—'शरीर, सिर और ग्रीवाको समानरूपसे रखकर दृढ़ासन होकर मैं पर्वतके शिखरकी तरह अचल बैठता हूँ। मनसे परे, चारो ओर स्थित, परिपूर्ण समान सत्ता और परम समतारूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें विकाररहित हुआ स्थाणुकी तरह मैं नित्य स्थित हूँ।' इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे परमात्माके ध्यानमें छः दिनतक फिर स्थित रहे। तदनन्तर उसी प्रकार समाधिसे जाग गये, जिस प्रकार सोया हुआ पथिक जग जाता है। इसके बाद उन सिद्ध, महान् तपस्वी महात्मा वीतहव्यने जीवन्मुक्त अवस्थामें स्थित हुए ही चिरकालतक यत्र-तत्र विचरण किया। ये महामुनि वीतहव्य न तो किसी वस्तुकी स्तुति करते थे और न कभी किसीकी निन्दा ही करते थे। वे प्रतिकूलकी प्राप्तिमें कभी उद्विग्न नहीं होते थे तथा अनुकूलकी प्राप्तिमें हर्षित नहीं होते थे।
(अब वीतहव्य मुनि अपनी इन्द्रियोंके प्रति कहते हैं—) 'इन्द्रियगण ! अब तुमलोग विनाशको ही प्राप्त हो जाओ। तुम्हारी सारी अभिलाषाएँ निष्फल हो गयी हैं। अब आश्रयरहित तुमलोग मुझपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं हो। अब विस्मरण करनेयोग्य इस जड दृश्य संसारकी विस्मृति हो गयी है और स्मरण करने-योग्य परमात्माकी स्पष्टरूपसे स्मृति हो गयी है। जो सद्रूप परमात्मा था, वह सत् ही रहा तथा जो जड दृश्यवर्ग असत् था, वह असत् ही रहा।'
श्रीराम ! इस प्रकारके विचारसे युक्त हो वे महान् तपस्वी मुनिश्रेष्ठ महात्मा वीतहव्य अनेक वर्षोंतक इस लोकमें स्थित रहे। जिसके प्राप्त होनेपर पुनर्जन्मके लिये चिन्ता विनष्ट हो जाती है और मूढ़ता दूर भाग जाती है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्मामें मुनि निरन्तर स्थित थे। त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य पदार्थोंकी प्राप्ति हो जानेपर भी त्याग और ग्रहणकी बुद्धिका विनाश हो जानेके कारण महामुनि वीतहव्यका अन्तःकरण इच्छा और अनिच्छासे रहित हो गया था।
(तत्पश्चात् वे फिर अपने मन-ही-मन विचार करने लगे—) 'दुःख ! तुम्हारेद्वारा संतप्त हुए मैंने अत्यन्त आदरसे आत्माका अनुभव किया है; मुझको तुमने ही सचेत कराकर इस मोक्षमार्गका उपदेश दिया है। अतः तुम्हें मेरा प्रणाम है। आश्चर्य है कि प्राणियोंके स्वार्थोंकी अत्यन्त विलक्षण गति है, जो आज मैं भी सैकड़ों जन्मतक साथी रहकर अपने प्यारे मित्र इस शरीरसे अलग हो रहा हूँ। मातृरूप तृष्णे ! अब हम दोनोंका संयोगके कारण ही सदाके लिये वियोग हो रहा है। इसलिये तुम्हें प्रणाम है। सुकृत (पुण्य)-देव ! आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आपने ही पहले मेरा नरकोंसे उद्धार करके मुझे स्वर्गमें भेजा था। जिसके सम्बन्धसे मैंने दीर्घकालतक नाना योनियोंका उपभोग किया, उस अज्ञानको मैं प्रणाम करता हूँ। सखी गुहातपस्विनि ! संसाररूपी महामार्गमें खिन्न हुए मेरे लिये तुम ही अकेली आश्वासन देनेमें समर्थ, अत्यन्त स्नेहसे युक्त और समस्त लोकोंका नाश करनेवाली सखी हुईं। इसलिये समाधिमें स्त्रीके सदृश व्यवहार करनेवाली उस गुहारूपी तपस्विनीको भी मैं प्रणाम करता हूँ। संकट, गड्ढे और कुञ्जोंमें हाथको अवलम्बन देनेवाले, वृद्धावस्थाके एकमात्र मित्र दण्ड ! तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। प्रिय प्राणसमुदाय ! तुम सब प्रकृतिमें विलीन हो जाओ और मैं सच्चिदानन्द ब्रह्ममें विलीन होता हूँ; क्योंकि जितने भी भोगसमूह हैं, वे अन्तमें नाशवान् हैं। जो
३५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आज उन्नत हैं, उनका अन्तमें पतन निश्चित है एवं संसारमें जितने संयोग हैं, उनका भी अन्तमें वियोग निश्चित है।'*
(अब प्रत्येक इन्द्रिय आदिके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य प्रकृतिका विभागपूर्वक वर्णन करते हैं—) 'चक्षु-इन्द्रिय आदित्य-मण्डलमें प्रवेश करे, घ्राणेन्द्रिय पृथ्वीमें प्रविष्ट हो जाय, प्राणवायु वायुतत्त्वमें प्रविष्ट हो जाय, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमे प्रविष्ट हो जाय और रसनेन्द्रिय जलमें प्रविष्ट हो जाय। मै ओंकारकी अन्तिम अर्धमात्रासे लक्षित परब्रह्मस्वरूप परमात्मामें अपने-आप ही अन्तःकरणसे रहित हो शान्त हो रहा हूँ। अतः मै सम्पूर्ण कार्योंकी परम्परासे रहित, समस्त दृश्योंकी अवस्थाओंसे अतीत, उच्चारण किये हुए प्रणवकी ब्रह्मरन्ध्रमें विश्रान्तिका अनुसरण करके ब्रह्माकारताकी प्राप्तिसे उपरत-बुद्धि तथा अविद्यारूपी मलसे रहित हुआ स्थित हूँ।'
(सर्ग ८४–८६)
महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बन करके परमात्म-प्राप्तिरूप मुक्तावस्थाका तथा मुक्त होनेपर उनके शरीर, प्राणों और सब धातुओंका अपने-अपने उपादान-कारणोंमें विलीन होकर मूल-प्रकृतिमें लीन होनेका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार धीरे-धीरे प्रणवका उच्चारण करते हुए महामुनि वीतहव्य संकल्प और इच्छाओंसे रहित होकर अन्तिम भूमिकाको प्राप्तकर अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रासे युक्त पादोंके भेदसे ॐकारका स्मरण करते हुए ब्रह्मके स्वरूपमें संसारका जो अध्यारोप है, उसका बाध करके अर्थात् केवल ब्रह्मके सिवा अन्य कुछ नहीं है—इस प्रकार निश्चय करके अविनाशी विशुद्ध परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते थे। कल्पित बाह्य और आभ्यन्तर स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर सम्पूर्ण त्रिलोकीके पदार्थोंका भी परित्याग करके वे क्षोभशून्य आकारवाले महामुनि वीतहव्य नित्य आत्मस्वरूपमें ही स्थित थे। वे पूर्णचन्द्रकी तरह परिपूर्ण थे तथा मन्दराचलकी तरह स्थिर थे। तदनन्तर 'नेति नेति' इत्यादि श्रुतियोंसे बोधित जो अद्वैत तत्त्व है और जो वाणीका भी अगोचर है, उस तत्त्वको ये मुनि प्राप्त हो गये। इसके अनन्तर ये मुनि समस्त पदार्थोंमें व्यापक, समस्त पदार्थोंसे रहित, निरतिशय समतासे पूर्ण, चिन्मय, अतिशय पवित्र परमपदरूप हो गये। जो ब्रह्मज्ञानियोंका ब्रह्मरूप, विज्ञानवादियोंका विज्ञानरूप एव कपिलमुनि-निर्मित सांख्यशास्त्रमें प्रतिपादित पुरुषरूप, पतञ्जलि-निर्मित योगशास्त्रमे प्रतिपादित क्लेश आदिसे रहित पुरुषविशेषात्मक ईश्वररूप, आत्माके स्वरूपको भली प्रकार जाननेवाले आत्मवादियोंके मतमें आत्मतत्त्वरूप समस्त शास्त्रका सिद्धान्तभूत, सबके हृदयमें अनुगत, सर्वात्मक, सर्वस्वरूप जो निर्मल श्रेष्ठ पद है, तत्स्वरूप होकर ये मुनि अवस्थित थे। जो तत्त्व वास्तवमे अद्वितीय होनेके कारण एक और मायाके सम्बन्धसे अनेक भी है, जो मायासे युक्त होनेके कारण सगुण और वास्तवमें मायासे अतीत—निर्गुण है, तत्स्वरूप होकर ये मुनि स्थित थे।
* सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥ संयोगा विप्रयोगान्ताः सर्वे समारवर्त्मनि।
(८६।५४-५५)
उपशम-प्रकरण ] * ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकता * ३५१
श्रीराम ! इस प्रकार महामुनि वीतहव्यके परम शान्त हो परम निर्वाणपदको प्राप्त हो जानेपर उनका क्रियाशून्य वह देह उसी प्रकार कुम्हला गया, जिस प्रकार हेमन्त ऋतुमें कमल रस-रहित हो कुम्हला जाता है। उस देहके सम्पूर्ण स्थूलभूत तन्मात्रारूप सूक्ष्म महाभूतोंमें ही लीन हो गये तथा मांस, अस्थि और आँतरूपी देह वनकी भूमिमें मिल गया। जैसे घड़ेके फूटनेपर घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है,
वैसे ही व्यष्टि-चेतन समष्टि-चेतनमें जा मिला। उस शरीरके तन्मात्रारूप सूक्ष्म भूत अपने उपादान-कारण मूल-प्रकृतिमें लीन हो गये। इस प्रकार उन महामुनिके शान्त हो जानेपर सभी पदार्थ अपने-अपने उपादान-कारणमें ही लीन हो गये। श्रीराम ! महामुनि वीतहव्यकी यह सैकड़ों विचारोंसे युक्त मोक्ष-कथा तुमसे मैंने कही है। अब तुम अपनी प्रज्ञासे इसका विवेचन करो। जिस तत्त्वका मैंने तुमसे वर्णन किया है, जिसका वर्णन कर रहा हूँ और जिसका वर्णन करूँगा, त्रिकाल-को प्रत्यक्षरूपसे देखनेवाले तथा चिरकालतक जीनेवाले मैंने उसके विषयमें विचार किया है और पूर्णरूपसे उसको स्वयं देखा भी है। ज्ञानसे ही मनुष्य दुःखके अभावको प्राप्त होता है, ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो जाता है, ज्ञानसे ही परमात्माकी प्राप्तिरूप परम सिद्धि मिलती है, ज्ञानके बिना नहीं मिलती। इसलिये मनुष्य-को ज्ञानकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिन्होंने परम प्रयोजनरूप परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जिनके राग आदि दोष विनष्ट हो चुके थे, जो समस्त पापोंसे, अहंता-ममता आदि विकारोंसे, अविद्यासे तथा आसक्ति एवं शोकसे रहित थे, वे ज्ञानी वीतहव्य मुनि, जिसका बहुत कालतक अभ्यास किया गया था, उस अपने निर्मल असीम सच्चिदानन्दघनरूप परम पदको प्राप्त हुए। (८७-८८)
ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकताका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे सिंह मयूरों-के वशमें नहीं होते, वैसे ही तुम्हारे-जैसे कोई भी महापुरुष हर्ष, अमर्ष आदि विकारोंके वशमें नहीं होते।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ! जीवन्मुक्त शरीरवाले महात्माओंकी आकाश-गमन आदि शक्तियाँ यहाँ क्यों नहीं दिखलायी पड़तीं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो चित्र-विचित्र
आकाश-गमन आदि क्रिया-कलाप दिखायी पड़ता है, वह प्राणियों और पदार्थोंका स्वभाव है। इसलिये वह आत्मतत्त्वज्ञोंके लिये वाञ्छनीय नहीं है। आत्मज्ञानसे शून्य अमुक्त जीव मणि, औषध आदि द्रव्योंकी शक्तिसे, पूर्वकृत कर्मकी जन्मजात शक्तिसे, योगाभ्यास आदि-क्रियाओंकी शक्तिसे और कालकी शक्तिसे आकाश-गमन आदि सिद्धियोंको प्राप्त कर सकता है। इन
१—श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना
३५२ : अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् : [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाश-गमन आदि सिद्धियोंका होना आत्मज्ञ पुरुषके लिये गौरवका विषय नहीं है; क्योंकि आत्मज्ञानी स्वयं आत्माको प्राप्त कर चुका होता है, इसलिये वह अपने आत्मामें ही तृप्त रहता है, अविद्याके कार्यकी ओर नहीं दौड़ता । संसारमें जो कोई भी पदार्थ हैं, उन सबको आत्मज्ञ अविद्यामय ही मानते हैं । इसलिये अविद्या-से रहित तत्त्वज्ञ उनमें कैसे फँस सकता है ? जो योगाभ्यास आदि साधनोंसे अविद्यारूप आकाश-गमन आदि सिद्धियोंको भी सुखका साधन बना लेते हैं, वे आत्मतत्त्वज्ञ हैं ही नहीं; क्योंकि आकाश-गमन आदि सिद्धियाँ अविद्यामय ही है । तत्त्वज्ञ हो चाहे अतत्त्वज्ञ हो, जो कोई भी दीर्घकालतक प्रयत्नपूर्वक द्रव्य-कर्मोंसे शास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करता है, वह आकाश-गमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है । यहाँ धन आदिकी अभिलाषाओंसे रहित और परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा प्रकृतिसे ऊपर उठा हुआ पुरुष अपने परमात्मस्वरूपमें ही नित्य संतुष्ट रहता है । इसीलिये वह न कुछ चाहता है और न कुछ करता है । आत्मज्ञ पुरुषको न तो आकाश-गमनसे, न अणिमादि सिद्धियोंसे, न तुच्छ भोगोंसे, न निग्रहानुग्रह-सामर्थ्यसे, न मान-बड़ाई-प्रतिष्ठासे और न आशा, मरण तथा जीवनसे ही कोई प्रयोजन है ।
परमात्माके स्वरूपमें ही सदा संतुष्ट, परम शान्ति-स्वरूप, राग और वासनासे रहित तथा आकाशके सदृश निर्मल आकारवाला तत्त्वज्ञानी महापुरुष अपने परमात्म-स्वरूपमें ही स्थित रहता है । अपने जीवन और मरणकी आसक्तिसे रहित तत्त्वज्ञानी पुरुष अकस्मात् प्राप्त हुए सुख और दुःखसे विचलित नहीं होता । उस महापुरुषका इस विश्वमे न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही; तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता । जो आत्म-ज्ञानसे शून्य है, वह भी आकाश-गमन आदि सिद्धि-समूहको चाहता है और वह सिद्धियोंके साधक द्रव्योंसे क्रमशः उन्हें प्राप्त भी करता है । श्रीराम ! मणि, औषध आदि द्रव्य, काल, योगाभ्यास आदि क्रिया और मन्त्र-प्रयोगोंमें उक्त प्रकारकी शक्तियाँ, जो आकाश-गमन आदि शब्दोंसे कही जाती है, स्वभावतः सिद्ध है । जैसे विषघ्न मणि, मन्त्र, द्रव्य आदिकी शक्तियाँ विषका विनाश कर देती है, जैसे मदिरा उन्मत्त कर देती है, जैसे मधु आदि वस्तुएँ वमन करा देती है, वैसे ही युक्ति-द्वारा प्रयुक्त मणि, औषध आदि द्रव्य, काल, योगकी क्रिया आदि उपाय स्वभावसे ही सिद्धियोंको अवश्य उत्पन्न करते है । परंतु द्रव्य-काल-क्रिया-क्रमरूप मायिक पदार्थोंसे अतीत तथा अज्ञानरहित आत्मज्ञानमें आकाश-गमन आदि सिद्धियों हेतु अथवा विरोधी नहीं हैं; क्योंकि परमात्माके पदकी प्राप्तिमें कोई भी द्रव्य, देश, क्रिया, काल आदि युक्तियाँ उपकारक नहीं हैं । किसी पुरुषको आकाशगमन आदिकी इच्छा होती है तो वह उसकी सिद्धिका साधन पूर्णरूपसे करता है । किंतु आत्मज्ञानी पूर्ण है । अतः उसमें कहीं इच्छाकी सम्भावना नहीं है । निष्पाप श्रीराम ! परमात्माकी प्राप्ति सारी इच्छाओकी शान्ति होनेपर ही होती है; अतः आत्मज्ञानी-को आत्मलाभकी विरोधिनी इच्छा कैसे और किससे हो सकती है । किंतु चाहे विवेकी हो चाहे अविवेकी, जिसकी जिस प्रकार इच्छा उत्पन्न होती है, वह उस प्रकारसे उसी इच्छासे यत्न करता है और समय आनेपर वह उस सिद्धिको प्राप्त कर लेता है । परमात्मज्ञानकी इच्छावाले वीतहव्यने सिद्धियोंकी इच्छासे किसी प्रकारका यत्न नहीं किया था; बल्कि परमार्थ-ज्ञानकी इच्छासे ही उसने तेजीके साथ यत्न किया था । जिस प्रकार इसने वनमें यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये उद्योग किया था, यह मै तुमसे पहले कह चुका हूँ । इस प्रकार काल, क्रिया, कर्म, द्रव्य, युक्ति और स्वभावसे उत्पन्न होनेवाली क्रमप्राप्त सिद्धियाँ अपनी इच्छाके ही अनुसार सिद्ध हो जाती हैं । श्रीराम ! जो-जो आकाश-
उपशम-प्रकरण ] * जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन * ३५३
गमन आदि सिद्धि-नामक फलोंके समूह जिस पुरुषके द्वारा प्राप्त किये गये देखे जाते हैं, वे उस पुरुषके अपने प्रयत्नरूपी वृक्षके ही फल हैं । किंतु जिनका अन्तःकरण पवित्र है, जो परमात्माको यथार्थरूपसे जानते हैं, जो परमात्माके स्वरूपमें नित्य तृप्त हैं तथा जो अपने अभिलषित परमात्माको प्राप्त कर चुके हैं, उन महात्माओंका सिद्धियों कुछ भी उपकार नहीं करतीं ।
(सर्ग ८९)
जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब जीवन्मुक्त वीतहव्यका चित्त विवेकपूर्वक विचारके द्वारा अस्तप्राय हो गया यानी भुने हुए बीजकी तरह अङ्कुरशक्तिसे रहित हो गया, तब उसमें मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि गुणोंका आविर्भाव हो गया ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! आत्मा और अनात्मा-के विचारके अभ्युदयसे अदृश्य हुए महामुनि वीतहव्यके अन्तःकरणमें मैत्री आदि गुण उत्पन्न हुए, आपके इस कथनका क्या अभिप्राय है ? वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुने ! जब चित्त ब्रह्ममें लीन हो गया, तब मैत्री आदि गुण किसके और किसमें उत्पन्न होंगे—यह आप मुझसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! चित्तका विनाश दो प्रकारका होता है—एक सरूप विनाश और दूसरा अरूप विनाश । पहला सरूप विनाश तो जीवन्मुक्त होनेमें हो जाता है और दूसरा अरूप विनाश विदेह-मुक्त होनेपर होता है । इस संसारमें चित्तका अस्तित्व दुःखका कारण है और चित्तका विनाश सुखका कारण है । अतः पहले चित्तके अस्तित्वका भुने हुए बीजके समान विनाश करके तदनन्तर चित्तके स्वरूपका भी विनाश कर देना चाहिये । अज्ञानसे उत्पन्न हुई वासनाओंसे व्याप्त जो जन्मका कारण मन है, उसीको अज्ञानियोंका विद्यमान मन समझो । वह विद्यमान मन केवल दुःखका ही कारण होता है । इसलिये जबतक मनका अस्तित्व है, तबतक दुःखका विनाश कैसे हो सकता है । मन जब अस्त हो जाता है, तब प्राणीका यह संकल्परूप संसार भी अस्त हो जाता है । इस अज्ञानी जीवमें ही वासनारूपी अङ्कुरोंसे दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए इस विद्यमान मनको ही दुःखरूपी वृक्षका मूल जानो । ये दुःखरूपी वृक्ष-समूहके अङ्कुर उन्हीं अज्ञानियोंके मनमें उत्पन्न होते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! किस महात्माका मन विनष्ट हो गया ? विनाशको प्राप्त हुए मनका स्वरूप किस प्रकारका होता है ? चित्तका नाश किस प्रकार होता है और नाशका स्वरूप कैसा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुकुल-नायक श्रीराम ! मैंने पहले चित्तकी सत्ताका स्वरूप तो बता दिया है । अब तुम इसके विनाशका स्वरूप सुनो । जैसे निःश्वासवायु पर्वतराजको अपने स्वरूपसे विचलित नहीं करती, वैसे ही सुख-दुःखरूप दशाएँ जिस धीर पुरुषको सम-स्वभाव तथा पूर्णानन्दैकरस परमात्मनिष्ठासे विचलित नहीं करतीं, श्रेष्ठ पुरुष उस महात्माके चित्तको भुने हुए बीजके समान नष्ट हुआ चित्त कहते हैं । 'यह जड़ देह ही मैं हूँ', 'ये घट आदि सारे पदार्थ मैं नहीं हूँ', इस प्रकारकी तुच्छ भावना जिस श्रेष्ठ पुरुषको भीतरसे विकारयुक्त नहीं करती, विद्वान्लोग उस पुरुषके चित्तको नष्ट कहते हैं । जिस नररत्नके अंदर विपत्ति, कायरता, उत्साह ( हर्ष ), मद, बुद्धिकी मन्दता और विवाहादि लौकिक महोत्सव विकार पैदा नहीं करते, विद्वान्लोग उसके चित्तको नष्टचित्त कहते हैं । इस
३५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लोकमें यही चित्तका विनाश है और इसीको भूने हुए बीजके समान विनष्ट चित्त भी कहते हैं। यही जीवन्मुक्त महापुरुषकी चित्तनाश-दशा है। निष्पाप श्रीराम ! जीवन्मुक्त पुरुषका मन मैत्री आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न, उत्तम वासनाओंसे युक्त तथा पुनर्जन्मसे शून्य होता है। ब्रह्मकी वासनासे ओतप्रोत, पुनर्जन्मसे रहित जो जीवन्मुक्त पुरुषके मनकी सत्ता है, वह सत्त्व नामसे कही जाती है। जिस प्रकार चन्द्रमामें प्रसन्न किरणें रहती हैं, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषके मनके विनाशमें विशुद्ध मैत्री आदि गुण सदा सब तरहसे रहते हैं। शान्तिरूप शीतलताके आश्रय जीवन्मुक्त पुरुषके सत्त्वनामक मनके नाशकी अवस्थामें अनेक गुण-सम्पत्तियों प्रकट होती हैं।
रघुकुलतिलक ! जो मैंने पहले अरूप-मनोनाश कहा था, वह विदेहमुक्तका ही होता है तथा जो अवयवादि विकारोंसे रहित है, उस परम पवित्र विदेहमुक्ति-रूपी निर्मल परमपदमें समस्त श्रेष्ठ गुणोंका आश्रयरूप मन भी विलीन हो जाता है। विदेहमुक्त महात्माओंकी उस सत्त्व-विनाशरूप अरूपचित्तनाश-दशामें किसी भी दृश्य-पदार्थका अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् संकल्पसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव हो जाता है। उस अरूपचित्तविनाश-दशामें न गुण हैं न अवगुण हैं, न शोभा है न अशोभा है, न चञ्चलता है न अचञ्चलता है, न उदय है न अस्त है, न हर्ष है न अमर्ष है और न ज्ञान है, न प्रकाश है न अन्धकार है, न संध्या है न दिन या रात है, न दिशाएँ हैं न आकाश है, न अधः है और न अनर्घरूपता है, न कोई वासना है न किसी प्रकारकी रचना है, न इच्छा है न अनिच्छा है, न राग है न भाव है और न अभाव है और न वह पदसाध्य ही है। वह परमपद तम और तेजसे शून्य, तारे, चन्द्र, सूर्य और वायुसे तथा संध्या, रजःकण और सूर्य-क्रान्तिसे रहित शरत्कालीन स्वच्छ आकाशके समान अत्यन्त निर्मल है। वह विशाल पद उन लोगोंका आश्रय-स्थान है, जो बुद्धि और संसार-भ्रमणसे पार हो गये हैं। सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित, चिन्मय, निष्क्रिय ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण तथा रज और तमसे रहित जो परमपद है, उस परम-पदमें वे चित्तसे रहित और आकाशके सदृश सूक्ष्म विदेहमुक्त आत्मा तद्रूप हुए स्थित रहते हैं, वे अपुनरा-वृत्तिरूप परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। (सर्ग ९०)
शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना, इनका कारण विषय, विषयका कारण जीवात्मा और जीवात्माका कारण परमात्मा है—इस तत्त्वका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! भाव और अभावका तथा दुःखरूपी रत्नोंका खजाना चित्त ही, जो वासनाओंके वशमें रहनेवाला एक तरहसे अनुचर है, शरीरका कारण है। प्रतीत होनेके कारण सत् और विनाशशील होनेके कारण असत्रूप ये शरीरसमूह एकमात्र चित्तसे ही उत्पन्न हुए हैं, जैसे स्वप्नमें भ्रमसे संसारकी प्रतीति सबको स्वयं होती है। जो यह मिथ्या जगत्का स्वरूप दृश्यताको प्राप्त है, वह चित्तसे उसी प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार मिट्टीसे घड़े आदि उत्पन्न होते हैं। अनेक तरहकी वृत्तियाँ धारण करनेवाले इस चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं—एक प्राण-संचरण और दूसरा दृढ़भावना। जब शरीरकी नाड़ियोंमें प्राण-वायु संचरण करने लगता है, तब वृत्तिमय चित्त तत्काल ही उत्पन्न होता है। किंतु जब शरीरकी नाड़ियोंमें प्राण संचरण नहीं करता, तब वृत्तिज्ञान न होनेके कारण उसमें चित्त उत्पन्न नहीं होता। यह प्राण-संचरणरूप जगत् ही चित्तके द्वारा दिखायी पड़ता है, जिस प्रकार आकाशमें नीलता आदि दिखायी पड़ते हैं। राघव ! जीवात्माके विषयोंके सम्पर्कसे रहित होनेपर ही उसका परम कल्याण होता है, ऐसा जानो। किंतु प्रकट हुआ जीव ही
उपशम-प्रकरण ] * शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना :- ३५५
तत्काल बाह्य विषयोंकी ओर रागवश चला जाता है और उन विषयोंके भोगके अनुभवसे चित्तमें अनन्त दुःख उत्पन्न होते हैं। जब जीवात्मा बाह्य विषयोंसे उदासीन होकर परमात्माके ज्ञानके लिये प्रयत्नशील होता है, तब वह प्राप्त करने योग्य निर्मल परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जीवात्माके संकल्पको ही तुम चित्त जानो। उसी चित्तने इस अनर्थ-जालका विस्तार किया है।
योगीलोग चित्तकी शान्तिके लिये योगशास्त्रमें बतलाये गये प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यानरूप योगकी युक्तियोंके द्वारा प्राणका निरोध करते हैं। विद्वान्-लोग प्राण-निरोधको ही चित्तशान्तिरुप फलका दाता, उत्तम समताका हेतु और जीवात्माकी अपने वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सुन्दर स्थिति कहते हैं। महाबाहु श्रीराम ! तीव्र संवेगसे आत्माके द्वारा जिस पदार्थकी भावना की जाती है, तत्काल ही वह जीवात्मा अन्य स्मृतियोंको छोड़कर तद्रूप ही हो जाता है। वासनाके अत्यन्त वशीभूत और तद्रूप हुआ वह जीवात्मा जिस किसीको देख लेता है, उस सबको अज्ञानसे सत्-वस्तु मान लेता है और वासनाके वेगवश अपने स्वरूपको भूल जाता है। फिर वह वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित जीवात्मा भीतरी वासनाओंके अभिभूत होकर, विषसे अभिभूत पुरुषकी तरह अनेक मानसिक आपत्तियोंसे व्याकुल रहता है। श्रीराम ! जिससे देहादि अनात्मामें आत्मभावनारूप और अवस्तु संसारमें वस्तुभावनारूप अयथार्थ ज्ञान होता है, उसको तुम चित्त जानो। दृढ़ अभ्यासके कारण देह आदि पदार्थोंमें 'अहम्' 'मम' आदि वासनासे ही जन्म, जरा और मरणका कारण अति चञ्चल चित्त उत्पन्न होता है। जब निरन्तर वासनाका अभाव होनेसे मन मनसे रहित हो जाता है, तब मनका अभाव हो जाता है, जो परम उपरतिस्वरूप है। जब जगद्रूप वस्तुमें किसी पदार्थकी भावना नहीं होती, तब शून्य
सं० यो० व० अं० १३—
हृदयाकाशमें चित्त कैसे उत्पन्न हो सकता है। श्रीराम ! मैं तो यही मानता हूँ कि आसक्तिसे विनाशशील जगत्-रूपी वस्तुमें वस्तुत्वकी भावना करनामात्र ही चित्तका स्वरूप है। बाह्य वस्तुओंके अस्मरणरूप साधनका अवलम्बन करनेसे जो समस्त दृश्य-जगत्के अभावकी भावना और परमार्थ वस्तु परमात्माका अनुभव होता है, यह अचित्त कहा जाता है। अत जिस महामति पुरुषको संस्कारसे उत्पन्न विषय-रसास्वादके स्मरणसे विषयोंमें आसक्ति उत्पन्न नहीं होती, उस पुरुषका चित्त अचित्त-रूपताको तथा विशुद्ध सत्त्वको प्राप्त कहा जाता है। जिस महापुरुषमें पुनर्जन्मकी कारणभूता अहंता-ममतारूप वासनाका अभाव हो गया है, वह चक्रके भ्रमण-सदृश जगत्के व्यवहारमें लगा हुआ भी जीवन्मुक्त और परमात्मा-में स्थित है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार कुम्भ-कारके व्यापारके अभावमें भी चक्रका भ्रमण तबतक होता रहता है, जबतक उसमें वेग रहता है, उसी प्रकार अविद्याके नाश होनेपर भी प्रारब्ध संस्कारके अवशिष्ट रहनेसे अहंकारके बिना ही जीवन्मुक्तका शरीर और उसका व्यवहार—दोनों प्रारब्ध-भोगपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। जिनका चित्त भुने हुए बीजके सदृश पुनर्जन्म-से शून्य और विषयानुरक्तिसे रहित है, वे महानुभाव जीवन्मुक्त हुए स्थित रहते हैं। जिनका चित्त विशुद्ध सत्त्वरूपता प्राप्त कर चुका है, ऐसे ज्ञानके पारगत महात्मा चित्तसे रहित कहे जाते हैं। प्रारब्धका क्षय हो जानेपर वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें विलीन हो जाते हैं।
वासनाका ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे वह जीवात्माके क्षोभकारक कर्मसे प्राण-स्पन्दनका उद्बोधन करती है और उससे चित्त उत्पन्न होता है। एवं स्पन्दन-धर्मवाला होनेसे हृदयगत राग आदि गुणोंका स्पर्श करके प्राण जीवात्माका उद्बोधन करता है और क्रमसे चित्तरूपी बालक उत्पन्न होता है। श्रीराम ! वासना और प्राणस्पन्द—दोनों चित्तके कारण हैं। उनमेंसे किसी एकका लय
३५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हो जानेपर दोनोंका और उनके कार्य चित्तका विनाश हो जाता है, जैसे विदेहमुक्त ज्ञानीका वासनासहित चित्त और प्राण ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वासना और प्राणस्पन्दन--इन दोनोंका कारण विषय है; क्योंकि उसीके सम्बन्धसे वे दोनों प्रस्फुरित होते हैं। हृदयमें प्रिय और अप्रिय शब्द आदि विषयोंका चिन्तन करके ही प्राणस्पन्दन और वासना दोनों आविर्भूत होते हैं; इसलिये विषय ही उन दोनोंका बीज (कारण) है। जिस प्रकार मूलके उच्छेदसे वृक्ष तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार विषयचिन्तनका परित्याग करनेसे प्राणस्पन्दन और वासना—दोनों ही तत्काल समूल नष्ट हो जाते हैं। रघुनन्दन ! जीवात्मा ही अपनी धीरताका परित्याग करके अपने संकल्पसे विषयरूप-सा बनकर चित्तका बीजरूप हो जाता है, ऐसा जानो। जिस प्रकार तिल तेलसे रहित नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मासे रहित कोई भी विषय नहीं हैं; क्योंकि जीवात्मा सब विषयोंमें व्यापक है। इसलिये बाहर और भीतर कोई भी पदार्थ जीवात्मासे अलग नहीं है। अपने संकल्पसे चेतन जीवात्मा ही प्रस्फुरित होता हुआ स्वयं पदार्थोंको देखता है। जिस तरह स्वप्नमें अपना मरण और भिन्न देशमें स्थिति—दोनों अपने संकल्पसे ही होते हैं, उसी तरह जाग्रत्कालीन पदार्थ भी जीवात्माके सङ्कल्पसे ही होते हैं। रघुनन्दन ! जिस विवेक-अवस्थामें अपने पारमार्थिक स्वरूपका अनुभव होता है, वह अपने संकल्पसे हुआ स्वस्वरूपानुभव भी जगज्जाल (स्वप्नके सदृश) ही है; क्योंकि सच्चिदानन्द ब्रह्म अनुभव करनेवाला, अनुभव करने योग्य और अनुभव--इन तीनोंसे ही रहित है; अतः उस अनुभवको जगज्जाल कहना उचित ही है। जैसे बालकको अपने संकल्पसे ही प्रेतका और मनुष्योंको स्थाणुमें पुरुषका भ्रम होता है, वैसे ही संकल्पसे उत्पन्न भ्रमसे ही चेतन जीवात्माकी पदार्थरूपता होती है; वास्तवमें नहीं । यह भ्रान्तिज्ञान मिथ्या है। वह यथार्थ परमात्मज्ञानसे उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार रज्जु और चन्द्रके निर्दोष दर्शनसे रज्जुमें सर्प-भ्रान्ति और एक चन्द्रमें दो चन्द्ररूपोंकी भ्रान्ति विलीन हो जाती है। पहले देखा हुआ या न देखा हुआ जो पदार्थ इस जीवात्माको भासता है, विद्वान्को उसे विवेक-वैराग्यरूप प्रयत्नद्वारा मिथ्या समझकर उसका बाध कर देना चाहिये। इस जड जगत्रूप दृश्यका बाध न करना ही इस बड़े भारी संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ना है। यही बन्धन है तथा इस संसारके सम्बन्धसे रहित होना ही मोक्ष है—यह महात्माओंका अनुभव किया हुआ निश्चय है; क्योंकि इस जड दृश्य जगत्का चिन्तन ही जन्मरूप अनन्त दुःखका हेतु है और उस दृश्य-चिन्तनसे रहित होकर सच्चिदानन्द परमात्मामें स्थित रहना ही पुनर्जन्मरहित अक्षय सुखका हेतु है।
वासनारहित होनेके कारण अपनी आत्मामें जब किसी पदार्थकी भावना नहीं रहती और वह परमात्माके स्वरूपमें अचल स्थित रहता है, तब जडतासे रहित, विशाल एवं विशुद्ध यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये ज्ञानवान् फिर कभी संसारमें लिप्त नहीं होता। समस्त वासनाओंका अत्यन्त अभाव होनेपर निर्विकल्प समाधिसे परम आनन्दरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। संसारके चिन्तनसे रहित योगीलोग उसी असीम आनन्दमें नित्य स्थित रहते हैं। इसलिये संसार-चिन्तनसे रहित योगी चलते, बैठते, स्पर्श करते और सूंघते हुए भी चिन्मय अक्षय आनन्दसे पूर्ण और सुखी कहा जाता है। श्रीराम ! यह जीवात्मा जिसकी भावना करता है, उसी रूपमें तत्काल परिणत हो जाता है। अज्ञानकी भूमिकाओंसे मुक्त न होनेके कारण जीवात्मा दीर्घकाल बीत जानेपर भी अपना वास्तविक स्वरूप नहीं प्राप्त कर पाता। जीवात्मा ब्रह्मका अंश है, अत एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्म ही इस जीवात्माका कारण कहा जाता है। श्रीराम ! सत्ताके दो रूप हैं—एक तो अनेक
उपशम-प्रकरण ] * तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति * ३५७
आकारवाली व्यावहारिक सत्ता और दूसरी एक रूप- वाली वास्तविक सत्ता। अब उनका विभाग सुनो। घटादि रूपोंके विभागसे जो घटत्व, पटत्व, स्तम्भ, मत्त्व आदि उपाधिभूत सत्ता कही जाती है, वह नानाकृति व्यावहारिक सत्ता है। जो विभागसे रहित, सत्तारूपसे व्याप्त समानभावसे स्थित वास्तविक सत्ता है, वह एक- रूपा वास्तविक सत्ता है। जो दृश्यरूप विशेषतासे रहित, निर्लेप और केवल सत्-स्वरूप अद्वितीय महान् वास्तविक सत्ता है, उसीको विद्वान् परमपद कहते हैं। वास्तवमें सत्ताका रूप नाना आकारके रूपमें कभी नहीं है, क्योंकि वह कायम नहीं रहता, अतः वह सत्यरूप नहीं हो सकता। सत्ताका जो विशुद्ध एकरूप वास्तविक स्वरूप है, वह कभी नष्ट नहीं होता और न कभी लुप्त ही होता है। वह नित्य विज्ञानआनन्दस्वरूप होनेसे सदा कायम रहता है। उसका अभाव कभी नहीं होता। किंतु जो विभिन्न पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली विभाग- कल्पना नानारूपताका कारण देखी जाती है, वह विशुद्ध पदरूपा कैसे हो सकती है।
श्रीराम ! सत्ता-सामान्यकी चरम अवधिरूप जो कल्पनाओंसे और आदि-अन्तसे रहित परमपद है, उसका और कोई कारण नहीं है; क्योंकि वही सबका परम कारण है। जिस परमपदमें सम्पूर्ण सत्ताएँ विलीन हो जाती हैं, उस निर्विकार परमपदमें स्थित पुरुष इस दुःखमय संसारमें कभी नहीं आता। और वही वास्तवमें परम पुरुषार्थी है। वह परमात्मा ही समस्त कारणोंका कारण है, उसका कोई दूसरा कारण नहीं है। वही सम्पूर्ण सारोंका सार है, उससे बढ़कर दूसरी सारभूत वस्तु नहीं है। जैसे तालाबमें तटस्थ वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं, वैसे ही उस असीम चिन्मय परमात्मारूप दर्पणमें ये सब पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं। उसी आनन्द-समुद्र परब्रह्मसे सभी प्रकारके सुख प्रतिबिम्बित होते हैं। उस आनन्दमय परमात्मामें ही सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है, स्थित रहता है, बढ़ता है और विलीन हो जाता है। वह परब्रह्म भारीसे भी भारी, हलकेसे भी हलका, स्थूलसे भी स्थूल और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। वह दूरसे भी दूर, निकटसे भी निकट, छोटेसे भी छोटा और बड़ेसे भी अत्यन्त बड़ा है तथा सबका प्रकाशक होनेसे ज्योतियोंका ज्योति है। वह सम्पूर्ण वस्तुओंसे रहित और सर्ववस्तु- रूप है, वही सत् और असत् है, वही दृश्य और अदृश्य है, वह अहंतासे रहित और अहरस्वरूप है। श्रीराम ! वास्तवमें वही विशुद्ध जरारहित परमात्मतत्त्व है। उसकी प्राप्ति होनेपर चित्त परम शान्त हो जाता है।
(सर्ग ९१)
तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति तथा मनको वशमें करनेके उपायोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जबतक मन विलीन नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होता और जबतक वासना विनष्ट नहीं होती, तबतक चित्त शान्त नहीं होता। जबतक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तबतक चित्तकी शान्ति कहाँ और जबतक चित्तकी शान्ति नहीं होती, तब- तक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता। जब- तक वासनाका सर्वथा नाश नहीं होता, तबतक तत्त्व ज्ञान कहाँसे होगा और जबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होगा। इसलिये परमात्माका यथार्थ ज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय—ये तीनों ही एक दूसरेके कारण हैं। अतः ये दुःसाध्य हैं, किंतु असाध्य नहीं। विशेष प्रयत्न करनेसे ये तीनों कार्य सिद्ध हो सकते हैं। श्रीराम !
३५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विवेकसे युक्त होकर प्रयत्नसे भोगेच्छाका दूरसे ही परित्याग करके इन तीनों साधनोंका अवलम्बन करना चाहिये । यदि इन तीनों उपायोंका एक साथ प्रयत्नपूर्वक भली प्रकार बार-बार अभ्यास न किया जाय तो सैकड़ो वर्षोंतक भी परमपदकी प्राप्ति सम्भव नहीं । किंतु महाबुद्धिमान् श्रीराम ! वासनाक्षय, परमात्माका यथार्थ ज्ञान और मनोनाश—इन तीनोंका एक साथ दीर्घकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास किया जाय तो ये परमपदरूप फल देते हैं । * इन तीनोंका चिरकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेसे अत्यन्त दृढ़ हृदयग्रन्थियाँ निःशेषरूपसे टूट जाती हैं ।
श्रीराम ! यह संसारकी दृढ़ स्थिति सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरोंसे मनुष्योंके द्वारा अभ्यस्त है; अतः चिरकालतक अभ्यास किये बिना वह किसी तरह भी नष्ट नहीं हो सकती। इसलिये चलते-फिरते, श्रवण करते, स्पर्श करते, सूँघते, खड़े रहते, जागते, सोते—सभी अवस्थाओंमें परम कल्याणके लिये इन तीनों उपायोंके अभ्यासमें लग जाना चाहिये । तत्त्वज्ञोंका मत है कि वासनाओंके परित्यागके समान ही प्राणायाम भी एक उपाय है । इसलिये वासना-परित्यागके साथ-साथ प्राण-निरोधका भी अभ्यास करना आवश्यक है । वासनाओंका भली-भाँति परित्याग करनेसे चित्त भूने हुए बीजके समान अचित्तरूप हो जाता है और प्राणस्पन्दके निरोधसे भी चित्त अचित्तरूप हो जाता है; इसलिये तुम जैसा उचित समझो, वैसा करो । चिरकालतक प्राणायामके अभ्याससे, योगाभ्यासमें कुशल गुरुद्वारा बतायी हुई युक्तिसे, स्वस्तिक आदि आसनोंकी सिद्धिसे और उचित भोजनसे प्राण-स्पन्दनका निरोध हो जाता है । परमात्माके स्वरूपका साक्षात् अनुभव होनेपर वासना उत्पन्न नहीं होती । आदि, मध्य और अन्तमें कभी पृथक् न होनेवाले एकमात्र सत्यस्वरूप परमात्माको भलीभाँति यथार्थरूपसे जान लेना ही ज्ञान है। यह ज्ञान वासनाका सर्वथा विनाश कर देता है तथा अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसारका चिन्तन छोड़नेसे और शरीरको विनाशशील समझनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती । जिस प्रकार पवन-स्पन्दके शान्त हो जानेपर आकाशमें धूलि नहीं उठती, वैसे ही वासनाका विनाश हो जानेपर चित्त विषयोंमें नहीं भटकता । बुद्धिमान् पुरुषको एकाग्रचित्तसे बार-बार एकान्तमें बैठकर प्राण-स्पन्दके निरोधके लिये विशेष यत्न करना चाहिये। जिस प्रकार मदमत्त दुष्ट हाथी अङ्कुशके बिना दूसरे उपायसे वशमें नहीं होता, उसी प्रकार पवित्र युक्तिके बिना मन वशमें नहीं होता । अध्यात्मविद्याकी प्राप्ति, साधु-संगति, वासनाका सर्वथा परित्याग और प्राणस्पन्दनका निरोध—ये ही युक्तियाँ चित्तपर विजय पानेके लिये निश्चितरूपसे दृढ़ उपाय हैं । † इनसे तत्काल ही चित्तपर विजय प्राप्त हो जाती है । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंके रहते जो पुरुष हठसे चित्तको वशीभूत करना चाहते हैं, उनके सम्बन्धमें मेरा यही मत है कि वे दीपकका परित्याग करके अञ्जनोंसे अन्धकारका निवारण करना चाहते हैं । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंको त्यागकर जो पुरुष चित्त या चित्तके निकटवर्ती अपने शरीरको स्थिर करनेके लिये यत्न करते हैं, उन हठ करनेवाले पुरुषोंको विवेकी लोग हठी समझते हैं।
( सर्ग ९२ )
* वासनाक्षयविज्ञानमनोनाशा महामते । समकालं चिराभ्यस्ता भवन्ति फलदा मुने ॥
( योगवा० उप० ९२ । १७ )
† अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥
एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।
( योगवा० उप० ९२ । ३५ ३६ )
उपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३५९
विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति और जीवन्मुक्त महात्माओंकी स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किंचिन्मात्र विवेकपूर्वक विचारसे जिसने अपने चित्तका निग्रह कर लिया, उसने जन्मका फल पा लिया । यदि हृदयमें इस विचाररूपी कल्पवृक्षका कोमल अङ्कुर भी प्रकट हो जाय तो वही अङ्कुर अभ्यासयोगके द्वारा सैकड़ों शाखाओंमें फैल सकता है । विवेक-वैराग्यसे जिसका विचार कुछ दृढ़ हो गया है, उस पुरुषका शान्ति, समता, क्षमा, दया आदि पवित्र गुण उसी प्रकार आश्रय लेते हैं, जिस प्रकार जलसे परिपूर्ण सरोवरका पक्षी और मत्स्य, कच्छप आदि आश्रय लेते हैं, भलीभाँति परमात्मविषयक विचार करनेसे जिसे परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार हो गया है ऐसे ज्ञानी महापुरुषको अविद्यासे उत्पन्न अत्यन्त रमणीय और विशाल वैभव भी आकृष्ट नहीं कर पाते । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे जिसकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है, उस महात्माका यहाँके विषय, मानसिक वृत्तियाँ, आधि और व्याधि—ये सब क्या कर सकते हैं अर्थात् वे उसे तनिक भी विचलित नहीं कर सकते । जिसने ज्ञानकी चतुर्थ भूमिका प्राप्त कर ली है और जिसने जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव कर लिया है, उस धीर-वीर ज्ञानी महात्मा पुरुषपर विषय तथा इन्द्रियरूपी डाकू क्या कभी आक्रमण कर सकते हैं ? जिस पुरुषका अन्तःकरण चलते-फिरते या बैठते, जागते या सोते—इन सभी अवस्थाओंमें विवेकपूर्ण ब्रह्मविचारसे युक्त नहीं रहता, वह मृतकके समान है । अज्ञानरूपी अन्धकारका हरण करनेवाले परमात्मविषयक विचारसे तत्काल ही विशुद्ध परमपदरूप परमात्माका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाशमान दीपकसे वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती है तथा परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे सम्पूर्ण दुःखोंका उसी प्रकार अत्यन्त अभाव हो जाता है, जिस प्रकार सूर्यके उदयसे अन्धकारका अत्यन्त अभाव हो जाता है । क्योंकि जब परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान पूर्णतया प्राप्त हो जाता है, तब जानने योग्य ब्रह्मके स्वरूपकी प्राप्ति अपने-आप ही उसी प्रकार हो जाती है, जिस प्रकार सूर्यका उदय हो जानेपर भूमण्डलपर विशुद्ध प्रकाश उसी क्षण अपने-आप अनायास ही हो जाता है । जिस सत्-शास्त्रके विवेकपूर्वक विचारसे सच्चिदानन्द परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव हो जाता है, वही ज्ञान कहा जाता है और वह ज्ञान ज्ञेयरूप परमात्मासे भिन्न नहीं है—परमात्माका स्वरूप ही है ।
श्रीराम ! पण्डितलोग विवेकपूर्वक परमात्मविषयक विचारसे उत्पन्न परमात्मस्वरूपके अनुभवको ही ज्ञान कहते हैं । उसी ज्ञानके अंदर ज्ञेय उसी प्रकार छिपा रहता है, जिस प्रकार दूधके अंदर माधुर्य छिपा रहता है । सम्यग्-ज्ञानके प्रकाशसे आलोकित पुरुष स्वयं ज्ञेयरूप हो जाता है । सम और विशुद्धस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही ज्ञेय कहा जाता है । जिसके अन्तःकरणमें आनन्दका प्राकट्य हो गया है, वह ज्ञानवान् पुरुष किसी भी सांसारिक विषयमें नहीं फँसता । समस्त सङ्गोंसे रहित पूर्णकाम जीवन्मुक्त ज्ञानी सम्राटकी तरह सदा मस्त रहता है । श्रीराम ! ज्ञानी महात्मा पुरुष वीणा-वंशीकी मधुरध्वनि आदि मनोहर शब्दोंमें, कामिनियोंके शृङ्गार-रस-मिश्रित कमनीय गीतोंमें, करताल, गम्भीर मृदङ्ग तथा चित्र-विचित्र कांस्यताल आदि वाद्योंकी ध्वनियोंमें—चाहे ध्वनि रूक्ष हो या मधुर कहीं भी प्रेम नहीं करता । आसक्ति-रहित ज्ञानी पुरुष कोमल कदलीके स्तम्भोंकी पल्लव-पङ्क्तियोंसे युक्त तथा देवता एवं गन्धर्वोंकी कन्याओंके अङ्गोंके समान अतिकोमल अवयववाली लताओंसे युक्त नन्दनवनकी क्रीडाओंमें कभी भी रमण नहीं करता । जिस प्रकार हंस मरुभूमिमें रमण नहीं करता, उसी प्रकार स्वाधीन विषयभोगोंमें भी आसक्ति न रखनेवाला धीर तत्त्वज्ञ किसी भी विषयमें रमण नहीं करता । कदम्ब, कटहल, अंगूर, खरबूजा, अखरोट तथा नारंगी आदि फलोंमें; दही, दूध, घी, मक्खन, चावल आदि भोज्य पदार्थोंमें; लेह्य (चटनी), पेय