भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा शमनसे परमात्माकी प्राप्ति * ३४७

समूहरूपी फल-पुष्पोंको कतर रहा है। अपवित्र, दुष्ट आचरण करनेवाला कामरूपी कर्कश मुर्गा हृदयके राग-द्वेष आदि दोषरूप कूड़ेके ढेरको इधर-उधर बिखेर देता है। मोहरूपी महारात्रिमें भयावह अज्ञानरूपी उलूक हृदयरूपी वृक्षके ऊपर श्मशानमें वेतालकी भाँति चारों ओरसे प्रलाप कर रहा है। इन्द्रियगण ! आप-लोगोंके विद्यमान रहनेपर ये और इनसे दूसरी भी बहुत-सी इच्छा, कामना, वासना, स्पृहा आदि अशुभ स्त्रियाँ रात्रिमें पिशाचिनियोंकी तरह उछल-कूद मचाती रहती हैं। चित्त ! तुम्हारे विनाश होनेपर समता, शान्ति, सरलता, क्षमा, दया आदि सम्पूर्ण शुभ स्त्रियाँ ज्ञानरूपी प्रकाशसे युक्त हो उसी प्रकार पूर्णरूपसे प्रफुल्लित हो उठती हैं, जिस प्रकार प्रातःकालमें कमलिनियाँ। अब मोहरूपी तुषारसे रहित, रजोगुणरूप रेणुसे शून्य, निर्मल ज्ञानके प्रकाशसे युक्त हृदयाकाशरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म शोभित हो रहा है। आकाशमण्डलसे गिरनेवाली और वायु आदिसे आकुलित वृष्टिधाराओंकी तरह दुःखदायी विकल्प-समूह अब नहीं गिरते। सबको आह्लादित करनेवाली, शान्त, परम पवित्र मित्रता हृदयमें उत्पन्न हो रही है।

'अज्ञानका विनाश होनेपर हृदयमें ज्ञानका प्रकाश उसी प्रकार प्रकट हो रहा है, जिस प्रकार शरत्कालमें मेघोंके शान्त हो जानेपर निर्मल आकाशमें सूर्यमण्डल प्रकट होता है। वायुके शान्त होनेपर समुद्र जैसे सम हो जाता है, वैसे ही प्रसन्न, विशाल, गम्भीरतासे युक्त, क्षोभशून्य तथा राग-द्वेष आदि दोषोंसे रहित वशमें किया हुआ मन सम हो जाता है। परमात्माकी प्राप्तिरूप अमृत-प्रवाहसे पूर्ण तथा अविनाशी आनन्दसे सम्पन्न पुरुष शान्तिसे युक्त रहता है। केवल सच्चिदानन्द परमात्मामें विश्राम हो जानेपर परमात्माके स्वरूपका पूर्णरूपसे अनुभव हो जाता है। चित्त ! तुम्हारा स्वरूप अविचारके कारण ही कायम है। विवेकपूर्वक विचार करनेपर तुम कायम नहीं रहते। किंतु केवल एक समस्वरूप परमात्मा ही भलीभाँति समभावसे स्थित रह जाता है। विचार न करनेपर तुम उसी प्रकार उत्पन्न होते हो, जिस प्रकार प्रकाशके न रहनेपर अन्धकार। चित्त ! विचारसे तुम्हारा स्वरूप उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जिस प्रकार प्रकाशसे अन्धकार। क्योंकि जिसकी अविवेकसे उत्पत्ति होती है, उसका विवेकसे विनाश हो जाता है—जैसे प्रकाशसे अन्धकारका विनाश होता है और प्रकाशका अभाव होनेपर अन्धकार हो जाता है। तुम्हारी इच्छा न रहने-पर भी विचारके दृढ़ होनेपर सुखकी सिद्धिके लिये तुम्हारा चारो ओरसे यह विनाश प्राप्त हुआ है। ( अब वीतहव्य मुनि अपनी स्थितिका वर्णन करते हैं— ) सौभाग्यवश मैं समस्त चिन्ता-ज्वरोंसे मुक्त हो गया हूँ, शान्त हो गया हूँ और चारो ओरसे तृप्त हो गया हूँ। मै तुरीयपदरूप परमात्मस्वरूप अपनी आत्मा-में स्थित हो गया हूँ। इसलिये यह निश्चय हुआ कि इस संसारमें जिसकी स्थिति विवेकपूर्वक विचार करनेपर कायम हो ही नहीं सकती, वह चित्त है ही नहीं, है ही नहीं। किंतु परमात्मा तो अवश्य ही है, अवश्य ही है। परमात्माको छोड़कर और कुछ भी उससे भिन्न है ही नहीं। सब प्रकारके मलोंसे रहित आत्माके अंदर 'यह आत्मा है' इस प्रकारकी कल्पना ही नहीं हो सकती, यह मै मानता हूँ; क्योंकि एक अद्वितीय आत्मामें इदं-रूपसे अन्य वस्तुकी सत्तासे होनेवाली कल्पना कैसे हो सकती है। इसी कारण 'मै यह आत्मा हूँ' इस प्रकार कल्पना न करता हुआ मै मौनी होकर उसी प्रकार अपने विज्ञानानन्दघन परमात्मस्वरूपमें स्थित हूँ, जिस प्रकार जलमें तरङ्ग। अतः उस वासनाशून्य, जीवके आश्रयसे रहित, प्राण-संचारसे रहित, भेदभावसे शून्य, दृश्यसे रहित, ज्ञानस्वरूप, मन और वाणीकी चेष्टासे शून्य विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करके मै परम शान्त हूँ।'

(सर्ग ८३)