संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ ॐ अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् ॐ [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, छः रात्रितक पुनः समाधि, चिरकालतक जीवन्मुक्त स्थिति, उनके द्वारा दुःख-सुकृत आदिको नमस्कार और उनका परमात्मामें विलीन हो जाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार निर्णय करके वे मुनिवर वीतहव्य समस्त वासनाओंको छोड़कर विन्ध्य पर्वतकी गुफामें समाधि लगाकर उसमें अचल स्थित हो गये। उस समय महामुनि वीतहव्य
सब प्रकारके क्षोभसे शून्य परिपूर्ण चेतन विज्ञान आनन्दसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुशोभित हुए। उनका मन अत्यन्त विलीन हो गया था; अतएव वे ऐसे भले लगते थे, जैसे प्रशान्त समुद्र भला लगता है। जिस प्रकार ईंधनके जल जानेपर अग्निमें ज्वालाओंका संचरण शान्त हो जाता है, वैसे ही उन महामुनिका प्राणसंचार क्रमशः भीतर हृदयमें ही शान्त हो गया। समाधिमें स्थित महामुनि वीतहव्यके दोनों नेत्र ऐसे दिखायी पड़ते थे, जैसे उनकी वृत्ति नासिकाके अग्रभागमें दोनों ओर बराबर फैली हुई हो। महाबुद्धि वीतहव्यने अपने आसन-बन्धमें शरीर,
सिर और ग्रीवाको समानरूपसे रक्खा था; इसलिये वे ऐसे जान पड़ते थे, जैसे पत्थरपर खोदी गयीं या चित्रमें लिखी गयी मूर्ति हो। श्रीराम ! विन्ध्याद्रिके किसी झरनेके निकट गुफामें इस प्रकारकी समाधिमें स्थित महामुनि वीतहव्यके तीन सौ वर्ष आधे मुहूर्तकी तरह व्यतीत हो गये। परमात्मामें स्थित ध्यान-निमग्न उन मुनिने जीवन्मुक्तताके कारण इतने कालको कुछ भी नहीं समझा और अपने उस शरीरका त्याग भी नहीं किया। योगके रहस्यको जाननेवाले परम भाग्यशाली वे मुनि महान् मेघोंके चारों ओर फैलनेवाले शब्दोंसे, बरसती हुई वृष्टिकी धाराओंके गिरनेसे उत्पन्न घर-घर शब्दोंसे, सिंहोंके क्रोधपूर्वक गर्जनोंसे, झरनोंकी दिग्व्यापी घर्घराहटसे, भयंकर वज्रपातोंसे, मनुष्योंके घने कोलाहलोंसे, भूकम्पके द्वारा छिन्न-भिन्न हुए पर्वत-तटोंकी हलचलोंसे तथा अग्निकी तरह कर्कश ग्रीष्म आदिके तापोंसे भी उतने समयतक समाधिसे जागे नहीं। थोड़े ही समयमें उस पर्वतकी गुफामें वर्षाके कीचड़से ढके हुए महामुनि वीतहव्य पृथ्वीमें निमग्न-से प्रतीत होते थे। उस गुफाकी भूमिमें ये मुनि कीचड़से लथपथ होकर उसी प्रकार रहते थे, जिस प्रकार पर्वतके अंदर शिला। तदनन्तर तीन सौ वर्ष बीत जानेपर पृथ्वीकी गुफामें दबे हुए वे निग्रहानुग्रह-समर्थ तथा परमात्माको प्राप्त महामुनि स्वयं ही समाधिसे जाग गये। राघव ! तत्पश्चात् महामुनि वीतहव्यने सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मभाव होनेके कारण अनेक लोकोंका ब्रह्मरूपसे अनुभव किया और वर्तमान समयमें कर भी रहे हैं। श्रीराम ! आपका भी यह जगत् मनोमय, भ्रमतुल्य एवं परमार्थ-दशामें जिस प्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप है, उसी प्रकार महामुनि वीतहव्यका भी वह जगत् मनोमय,