संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, परमात्मामें विलीन हो जाना * ३४९
भ्रमतुल्य एवं परमार्थ-दशामें सच्चिदानन्दस्वरूप है। जबतक इस प्रकार जगत्को तत्त्वज्ञानद्वारा सच्चिदानन्द-रूप नहीं जाना जाता, तबतक वह हृदयमें वज्रसारकी तरह अत्यन्त दृढ़ रहता है; किंतु यथार्थरूपसे जान लिये जानेपर वह सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है।
श्रीराम ! दिनकी समाप्तिके बाद मुनिने फिर भी मनकी एकाग्रतारूप समाधिके लिये उसी पूर्व-परिचित विन्ध्याद्रिकी गुफामें प्रवेश करके विचार किया—'शरीर, सिर और ग्रीवाको समानरूपसे रखकर दृढ़ासन होकर मैं पर्वतके शिखरकी तरह अचल बैठता हूँ। मनसे परे, चारो ओर स्थित, परिपूर्ण समान सत्ता और परम समतारूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें विकाररहित हुआ स्थाणुकी तरह मैं नित्य स्थित हूँ।' इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे परमात्माके ध्यानमें छः दिनतक फिर स्थित रहे। तदनन्तर उसी प्रकार समाधिसे जाग गये, जिस प्रकार सोया हुआ पथिक जग जाता है। इसके बाद उन सिद्ध, महान् तपस्वी महात्मा वीतहव्यने जीवन्मुक्त अवस्थामें स्थित हुए ही चिरकालतक यत्र-तत्र विचरण किया। ये महामुनि वीतहव्य न तो किसी वस्तुकी स्तुति करते थे और न कभी किसीकी निन्दा ही करते थे। वे प्रतिकूलकी प्राप्तिमें कभी उद्विग्न नहीं होते थे तथा अनुकूलकी प्राप्तिमें हर्षित नहीं होते थे।
(अब वीतहव्य मुनि अपनी इन्द्रियोंके प्रति कहते हैं—) 'इन्द्रियगण ! अब तुमलोग विनाशको ही प्राप्त हो जाओ। तुम्हारी सारी अभिलाषाएँ निष्फल हो गयी हैं। अब आश्रयरहित तुमलोग मुझपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं हो। अब विस्मरण करनेयोग्य इस जड दृश्य संसारकी विस्मृति हो गयी है और स्मरण करने-योग्य परमात्माकी स्पष्टरूपसे स्मृति हो गयी है। जो सद्रूप परमात्मा था, वह सत् ही रहा तथा जो जड दृश्यवर्ग असत् था, वह असत् ही रहा।'
श्रीराम ! इस प्रकारके विचारसे युक्त हो वे महान् तपस्वी मुनिश्रेष्ठ महात्मा वीतहव्य अनेक वर्षोंतक इस लोकमें स्थित रहे। जिसके प्राप्त होनेपर पुनर्जन्मके लिये चिन्ता विनष्ट हो जाती है और मूढ़ता दूर भाग जाती है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्मामें मुनि निरन्तर स्थित थे। त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य पदार्थोंकी प्राप्ति हो जानेपर भी त्याग और ग्रहणकी बुद्धिका विनाश हो जानेके कारण महामुनि वीतहव्यका अन्तःकरण इच्छा और अनिच्छासे रहित हो गया था।
(तत्पश्चात् वे फिर अपने मन-ही-मन विचार करने लगे—) 'दुःख ! तुम्हारेद्वारा संतप्त हुए मैंने अत्यन्त आदरसे आत्माका अनुभव किया है; मुझको तुमने ही सचेत कराकर इस मोक्षमार्गका उपदेश दिया है। अतः तुम्हें मेरा प्रणाम है। आश्चर्य है कि प्राणियोंके स्वार्थोंकी अत्यन्त विलक्षण गति है, जो आज मैं भी सैकड़ों जन्मतक साथी रहकर अपने प्यारे मित्र इस शरीरसे अलग हो रहा हूँ। मातृरूप तृष्णे ! अब हम दोनोंका संयोगके कारण ही सदाके लिये वियोग हो रहा है। इसलिये तुम्हें प्रणाम है। सुकृत (पुण्य)-देव ! आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आपने ही पहले मेरा नरकोंसे उद्धार करके मुझे स्वर्गमें भेजा था। जिसके सम्बन्धसे मैंने दीर्घकालतक नाना योनियोंका उपभोग किया, उस अज्ञानको मैं प्रणाम करता हूँ। सखी गुहातपस्विनि ! संसाररूपी महामार्गमें खिन्न हुए मेरे लिये तुम ही अकेली आश्वासन देनेमें समर्थ, अत्यन्त स्नेहसे युक्त और समस्त लोकोंका नाश करनेवाली सखी हुईं। इसलिये समाधिमें स्त्रीके सदृश व्यवहार करनेवाली उस गुहारूपी तपस्विनीको भी मैं प्रणाम करता हूँ। संकट, गड्ढे और कुञ्जोंमें हाथको अवलम्बन देनेवाले, वृद्धावस्थाके एकमात्र मित्र दण्ड ! तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। प्रिय प्राणसमुदाय ! तुम सब प्रकृतिमें विलीन हो जाओ और मैं सच्चिदानन्द ब्रह्ममें विलीन होता हूँ; क्योंकि जितने भी भोगसमूह हैं, वे अन्तमें नाशवान् हैं। जो