भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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३५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आज उन्नत हैं, उनका अन्तमें पतन निश्चित है एवं संसारमें जितने संयोग हैं, उनका भी अन्तमें वियोग निश्चित है।'*

(अब प्रत्येक इन्द्रिय आदिके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य प्रकृतिका विभागपूर्वक वर्णन करते हैं—) 'चक्षु-इन्द्रिय आदित्य-मण्डलमें प्रवेश करे, घ्राणेन्द्रिय पृथ्वीमें प्रविष्ट हो जाय, प्राणवायु वायुतत्त्वमें प्रविष्ट हो जाय, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमे प्रविष्ट हो जाय और रसनेन्द्रिय जलमें प्रविष्ट हो जाय। मै ओंकारकी अन्तिम अर्धमात्रासे लक्षित परब्रह्मस्वरूप परमात्मामें अपने-आप ही अन्तःकरणसे रहित हो शान्त हो रहा हूँ। अतः मै सम्पूर्ण कार्योंकी परम्परासे रहित, समस्त दृश्योंकी अवस्थाओंसे अतीत, उच्चारण किये हुए प्रणवकी ब्रह्मरन्ध्रमें विश्रान्तिका अनुसरण करके ब्रह्माकारताकी प्राप्तिसे उपरत-बुद्धि तथा अविद्यारूपी मलसे रहित हुआ स्थित हूँ।'

(सर्ग ८४–८६)


महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बन करके परमात्म-प्राप्तिरूप मुक्तावस्थाका तथा मुक्त होनेपर उनके शरीर, प्राणों और सब धातुओंका अपने-अपने उपादान-कारणोंमें विलीन होकर मूल-प्रकृतिमें लीन होनेका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार धीरे-धीरे प्रणवका उच्चारण करते हुए महामुनि वीतहव्य संकल्प और इच्छाओंसे रहित होकर अन्तिम भूमिकाको प्राप्तकर अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रासे युक्त पादोंके भेदसे ॐकारका स्मरण करते हुए ब्रह्मके स्वरूपमें संसारका जो अध्यारोप है, उसका बाध करके अर्थात् केवल ब्रह्मके सिवा अन्य कुछ नहीं है—इस प्रकार निश्चय करके अविनाशी विशुद्ध परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते थे। कल्पित बाह्य और आभ्यन्तर स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर सम्पूर्ण त्रिलोकीके पदार्थोंका भी परित्याग करके वे क्षोभशून्य आकारवाले महामुनि वीतहव्य नित्य आत्मस्वरूपमें ही स्थित थे। वे पूर्णचन्द्रकी तरह परिपूर्ण थे तथा मन्दराचलकी तरह स्थिर थे। तदनन्तर 'नेति नेति' इत्यादि श्रुतियोंसे बोधित जो अद्वैत तत्त्व है और जो वाणीका भी अगोचर है, उस तत्त्वको ये मुनि प्राप्त हो गये। इसके अनन्तर ये मुनि समस्त पदार्थोंमें व्यापक, समस्त पदार्थोंसे रहित, निरतिशय समतासे पूर्ण, चिन्मय, अतिशय पवित्र परमपदरूप हो गये। जो ब्रह्मज्ञानियोंका ब्रह्मरूप, विज्ञानवादियोंका विज्ञानरूप एव कपिलमुनि-निर्मित सांख्यशास्त्रमें प्रतिपादित पुरुषरूप, पतञ्जलि-निर्मित योगशास्त्रमे प्रतिपादित क्लेश आदिसे रहित पुरुषविशेषात्मक ईश्वररूप, आत्माके स्वरूपको भली प्रकार जाननेवाले आत्मवादियोंके मतमें आत्मतत्त्वरूप समस्त शास्त्रका सिद्धान्तभूत, सबके हृदयमें अनुगत, सर्वात्मक, सर्वस्वरूप जो निर्मल श्रेष्ठ पद है, तत्स्वरूप होकर ये मुनि अवस्थित थे। जो तत्त्व वास्तवमे अद्वितीय होनेके कारण एक और मायाके सम्बन्धसे अनेक भी है, जो मायासे युक्त होनेके कारण सगुण और वास्तवमें मायासे अतीत—निर्गुण है, तत्स्वरूप होकर ये मुनि स्थित थे।


* सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥ संयोगा विप्रयोगान्ताः सर्वे समारवर्त्मनि।
(८६।५४-५५)