संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकता * ३५१
श्रीराम ! इस प्रकार महामुनि वीतहव्यके परम शान्त हो परम निर्वाणपदको प्राप्त हो जानेपर उनका क्रियाशून्य वह देह उसी प्रकार कुम्हला गया, जिस प्रकार हेमन्त ऋतुमें कमल रस-रहित हो कुम्हला जाता है। उस देहके सम्पूर्ण स्थूलभूत तन्मात्रारूप सूक्ष्म महाभूतोंमें ही लीन हो गये तथा मांस, अस्थि और आँतरूपी देह वनकी भूमिमें मिल गया। जैसे घड़ेके फूटनेपर घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है,
वैसे ही व्यष्टि-चेतन समष्टि-चेतनमें जा मिला। उस शरीरके तन्मात्रारूप सूक्ष्म भूत अपने उपादान-कारण मूल-प्रकृतिमें लीन हो गये। इस प्रकार उन महामुनिके शान्त हो जानेपर सभी पदार्थ अपने-अपने उपादान-कारणमें ही लीन हो गये। श्रीराम ! महामुनि वीतहव्यकी यह सैकड़ों विचारोंसे युक्त मोक्ष-कथा तुमसे मैंने कही है। अब तुम अपनी प्रज्ञासे इसका विवेचन करो। जिस तत्त्वका मैंने तुमसे वर्णन किया है, जिसका वर्णन कर रहा हूँ और जिसका वर्णन करूँगा, त्रिकाल-को प्रत्यक्षरूपसे देखनेवाले तथा चिरकालतक जीनेवाले मैंने उसके विषयमें विचार किया है और पूर्णरूपसे उसको स्वयं देखा भी है। ज्ञानसे ही मनुष्य दुःखके अभावको प्राप्त होता है, ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो जाता है, ज्ञानसे ही परमात्माकी प्राप्तिरूप परम सिद्धि मिलती है, ज्ञानके बिना नहीं मिलती। इसलिये मनुष्य-को ज्ञानकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिन्होंने परम प्रयोजनरूप परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जिनके राग आदि दोष विनष्ट हो चुके थे, जो समस्त पापोंसे, अहंता-ममता आदि विकारोंसे, अविद्यासे तथा आसक्ति एवं शोकसे रहित थे, वे ज्ञानी वीतहव्य मुनि, जिसका बहुत कालतक अभ्यास किया गया था, उस अपने निर्मल असीम सच्चिदानन्दघनरूप परम पदको प्राप्त हुए। (८७-८८)
ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकताका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे सिंह मयूरों-के वशमें नहीं होते, वैसे ही तुम्हारे-जैसे कोई भी महापुरुष हर्ष, अमर्ष आदि विकारोंके वशमें नहीं होते।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ! जीवन्मुक्त शरीरवाले महात्माओंकी आकाश-गमन आदि शक्तियाँ यहाँ क्यों नहीं दिखलायी पड़तीं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो चित्र-विचित्र
आकाश-गमन आदि क्रिया-कलाप दिखायी पड़ता है, वह प्राणियों और पदार्थोंका स्वभाव है। इसलिये वह आत्मतत्त्वज्ञोंके लिये वाञ्छनीय नहीं है। आत्मज्ञानसे शून्य अमुक्त जीव मणि, औषध आदि द्रव्योंकी शक्तिसे, पूर्वकृत कर्मकी जन्मजात शक्तिसे, योगाभ्यास आदि-क्रियाओंकी शक्तिसे और कालकी शक्तिसे आकाश-गमन आदि सिद्धियोंको प्राप्त कर सकता है। इन