भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 750 में से

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३५२ : अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् : [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आकाश-गमन आदि सिद्धियोंका होना आत्मज्ञ पुरुषके लिये गौरवका विषय नहीं है; क्योंकि आत्मज्ञानी स्वयं आत्माको प्राप्त कर चुका होता है, इसलिये वह अपने आत्मामें ही तृप्त रहता है, अविद्याके कार्यकी ओर नहीं दौड़ता । संसारमें जो कोई भी पदार्थ हैं, उन सबको आत्मज्ञ अविद्यामय ही मानते हैं । इसलिये अविद्या-से रहित तत्त्वज्ञ उनमें कैसे फँस सकता है ? जो योगाभ्यास आदि साधनोंसे अविद्यारूप आकाश-गमन आदि सिद्धियोंको भी सुखका साधन बना लेते हैं, वे आत्मतत्त्वज्ञ हैं ही नहीं; क्योंकि आकाश-गमन आदि सिद्धियाँ अविद्यामय ही है । तत्त्वज्ञ हो चाहे अतत्त्वज्ञ हो, जो कोई भी दीर्घकालतक प्रयत्नपूर्वक द्रव्य-कर्मोंसे शास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करता है, वह आकाश-गमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है । यहाँ धन आदिकी अभिलाषाओंसे रहित और परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा प्रकृतिसे ऊपर उठा हुआ पुरुष अपने परमात्मस्वरूपमें ही नित्य संतुष्ट रहता है । इसीलिये वह न कुछ चाहता है और न कुछ करता है । आत्मज्ञ पुरुषको न तो आकाश-गमनसे, न अणिमादि सिद्धियोंसे, न तुच्छ भोगोंसे, न निग्रहानुग्रह-सामर्थ्यसे, न मान-बड़ाई-प्रतिष्ठासे और न आशा, मरण तथा जीवनसे ही कोई प्रयोजन है ।

परमात्माके स्वरूपमें ही सदा संतुष्ट, परम शान्ति-स्वरूप, राग और वासनासे रहित तथा आकाशके सदृश निर्मल आकारवाला तत्त्वज्ञानी महापुरुष अपने परमात्म-स्वरूपमें ही स्थित रहता है । अपने जीवन और मरणकी आसक्तिसे रहित तत्त्वज्ञानी पुरुष अकस्मात् प्राप्त हुए सुख और दुःखसे विचलित नहीं होता । उस महापुरुषका इस विश्वमे न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही; तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता । जो आत्म-ज्ञानसे शून्य है, वह भी आकाश-गमन आदि सिद्धि-समूहको चाहता है और वह सिद्धियोंके साधक द्रव्योंसे क्रमशः उन्हें प्राप्त भी करता है । श्रीराम ! मणि, औषध आदि द्रव्य, काल, योगाभ्यास आदि क्रिया और मन्त्र-प्रयोगोंमें उक्त प्रकारकी शक्तियाँ, जो आकाश-गमन आदि शब्दोंसे कही जाती है, स्वभावतः सिद्ध है । जैसे विषघ्न मणि, मन्त्र, द्रव्य आदिकी शक्तियाँ विषका विनाश कर देती है, जैसे मदिरा उन्मत्त कर देती है, जैसे मधु आदि वस्तुएँ वमन करा देती है, वैसे ही युक्ति-द्वारा प्रयुक्त मणि, औषध आदि द्रव्य, काल, योगकी क्रिया आदि उपाय स्वभावसे ही सिद्धियोंको अवश्य उत्पन्न करते है । परंतु द्रव्य-काल-क्रिया-क्रमरूप मायिक पदार्थोंसे अतीत तथा अज्ञानरहित आत्मज्ञानमें आकाश-गमन आदि सिद्धियों हेतु अथवा विरोधी नहीं हैं; क्योंकि परमात्माके पदकी प्राप्तिमें कोई भी द्रव्य, देश, क्रिया, काल आदि युक्तियाँ उपकारक नहीं हैं । किसी पुरुषको आकाशगमन आदिकी इच्छा होती है तो वह उसकी सिद्धिका साधन पूर्णरूपसे करता है । किंतु आत्मज्ञानी पूर्ण है । अतः उसमें कहीं इच्छाकी सम्भावना नहीं है । निष्पाप श्रीराम ! परमात्माकी प्राप्ति सारी इच्छाओकी शान्ति होनेपर ही होती है; अतः आत्मज्ञानी-को आत्मलाभकी विरोधिनी इच्छा कैसे और किससे हो सकती है । किंतु चाहे विवेकी हो चाहे अविवेकी, जिसकी जिस प्रकार इच्छा उत्पन्न होती है, वह उस प्रकारसे उसी इच्छासे यत्न करता है और समय आनेपर वह उस सिद्धिको प्राप्त कर लेता है । परमात्मज्ञानकी इच्छावाले वीतहव्यने सिद्धियोंकी इच्छासे किसी प्रकारका यत्न नहीं किया था; बल्कि परमार्थ-ज्ञानकी इच्छासे ही उसने तेजीके साथ यत्न किया था । जिस प्रकार इसने वनमें यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये उद्योग किया था, यह मै तुमसे पहले कह चुका हूँ । इस प्रकार काल, क्रिया, कर्म, द्रव्य, युक्ति और स्वभावसे उत्पन्न होनेवाली क्रमप्राप्त सिद्धियाँ अपनी इच्छाके ही अनुसार सिद्ध हो जाती हैं । श्रीराम ! जो-जो आकाश-

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