संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन * ३५३
गमन आदि सिद्धि-नामक फलोंके समूह जिस पुरुषके द्वारा प्राप्त किये गये देखे जाते हैं, वे उस पुरुषके अपने प्रयत्नरूपी वृक्षके ही फल हैं । किंतु जिनका अन्तःकरण पवित्र है, जो परमात्माको यथार्थरूपसे जानते हैं, जो परमात्माके स्वरूपमें नित्य तृप्त हैं तथा जो अपने अभिलषित परमात्माको प्राप्त कर चुके हैं, उन महात्माओंका सिद्धियों कुछ भी उपकार नहीं करतीं ।
(सर्ग ८९)
जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब जीवन्मुक्त वीतहव्यका चित्त विवेकपूर्वक विचारके द्वारा अस्तप्राय हो गया यानी भुने हुए बीजकी तरह अङ्कुरशक्तिसे रहित हो गया, तब उसमें मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि गुणोंका आविर्भाव हो गया ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! आत्मा और अनात्मा-के विचारके अभ्युदयसे अदृश्य हुए महामुनि वीतहव्यके अन्तःकरणमें मैत्री आदि गुण उत्पन्न हुए, आपके इस कथनका क्या अभिप्राय है ? वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुने ! जब चित्त ब्रह्ममें लीन हो गया, तब मैत्री आदि गुण किसके और किसमें उत्पन्न होंगे—यह आप मुझसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! चित्तका विनाश दो प्रकारका होता है—एक सरूप विनाश और दूसरा अरूप विनाश । पहला सरूप विनाश तो जीवन्मुक्त होनेमें हो जाता है और दूसरा अरूप विनाश विदेह-मुक्त होनेपर होता है । इस संसारमें चित्तका अस्तित्व दुःखका कारण है और चित्तका विनाश सुखका कारण है । अतः पहले चित्तके अस्तित्वका भुने हुए बीजके समान विनाश करके तदनन्तर चित्तके स्वरूपका भी विनाश कर देना चाहिये । अज्ञानसे उत्पन्न हुई वासनाओंसे व्याप्त जो जन्मका कारण मन है, उसीको अज्ञानियोंका विद्यमान मन समझो । वह विद्यमान मन केवल दुःखका ही कारण होता है । इसलिये जबतक मनका अस्तित्व है, तबतक दुःखका विनाश कैसे हो सकता है । मन जब अस्त हो जाता है, तब प्राणीका यह संकल्परूप संसार भी अस्त हो जाता है । इस अज्ञानी जीवमें ही वासनारूपी अङ्कुरोंसे दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए इस विद्यमान मनको ही दुःखरूपी वृक्षका मूल जानो । ये दुःखरूपी वृक्ष-समूहके अङ्कुर उन्हीं अज्ञानियोंके मनमें उत्पन्न होते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! किस महात्माका मन विनष्ट हो गया ? विनाशको प्राप्त हुए मनका स्वरूप किस प्रकारका होता है ? चित्तका नाश किस प्रकार होता है और नाशका स्वरूप कैसा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुकुल-नायक श्रीराम ! मैंने पहले चित्तकी सत्ताका स्वरूप तो बता दिया है । अब तुम इसके विनाशका स्वरूप सुनो । जैसे निःश्वासवायु पर्वतराजको अपने स्वरूपसे विचलित नहीं करती, वैसे ही सुख-दुःखरूप दशाएँ जिस धीर पुरुषको सम-स्वभाव तथा पूर्णानन्दैकरस परमात्मनिष्ठासे विचलित नहीं करतीं, श्रेष्ठ पुरुष उस महात्माके चित्तको भुने हुए बीजके समान नष्ट हुआ चित्त कहते हैं । 'यह जड़ देह ही मैं हूँ', 'ये घट आदि सारे पदार्थ मैं नहीं हूँ', इस प्रकारकी तुच्छ भावना जिस श्रेष्ठ पुरुषको भीतरसे विकारयुक्त नहीं करती, विद्वान्लोग उस पुरुषके चित्तको नष्ट कहते हैं । जिस नररत्नके अंदर विपत्ति, कायरता, उत्साह ( हर्ष ), मद, बुद्धिकी मन्दता और विवाहादि लौकिक महोत्सव विकार पैदा नहीं करते, विद्वान्लोग उसके चित्तको नष्टचित्त कहते हैं । इस