भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३४६ :. अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् : [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तत्त्वरहित हो, तुम मूढ़ हो और वास्तवमें तुम्हारा कोई अस्तित्व ही नहीं है । इसलिये तुम्हें 'मैं तत्त्वरूप ही हूँ' ऐसा दुःखदायी मिथ्याभाव नहीं करना चाहिये । वास्तवमें बाजीगरकी रची हुई ऐन्द्रजालिक लताके समान चित्तकी कल्पना मिथ्या है तथा इस ब्रह्माण्डमें एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका स्वरूप ही सर्वत्र विराजमान है ।

'अज्ञानी चित्त ! वह परमपद सर्वत्र व्यापक, सारे पदार्थोंमें स्थित और सबका स्वरूप है । उसकी प्राप्ति हो जानेपर मनुष्यको सदा-सर्वदा सभी कुछ प्राप्त हो जाता है । चित्त ! उस समय न तो तुम रहते हो और न देह ही पृथक् रहता है; किंतु एक महान् प्रकाशस्वरूप, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित रहता है । स्वभावसे ही प्रकाशस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, अद्वितीय चेतन परमात्माने ही इस समस्त ब्रह्माण्डको परिपूर्ण कर रक्खा है । इसलिये उसके सिवा दूसरी कोई कल्पना ही नहीं हो सकती । वही एक और अनेक—सबका प्रकाशक है, समस्तरूप है । उसी परमात्माने अपने आपमें संकल्पसे इस जगत्की रचना की है । ऐसी स्थितिमें कौन किसकी कैसे इच्छा करेगा ? किंतु चित्त ! तुम्हारे-जैसे मूर्खोकी दृष्टिसे ही इस जगत्में व्यर्थ चञ्चलता उत्पन्न होती है, जिस प्रकार राजाकी स्त्री-को देखकर मूर्ख युवा पुरुषको मदमयी चञ्चलता उत्पन्न होती हैं । परंतु कल्पना और मननसे रहित आत्मामें कर्तृत्व कैसा । क्या कहीं आकाशमें पुष्प किसी तरह उत्पन्न हो सकता है ? जैसे आकाशमें हाथ, पैर आदि अङ्ग हो ही नहीं सकते, वैसे ही आत्मामें कर्तृत्व हो ही नहीं सकता; जैसे समुद्रमें तप्त अङ्गार नहीं रह सकता, वैसे ही परमात्मामें दूसरी कोई कल्पना रह ही नहीं सकती । इस प्रकार जब परमात्मदेवमें कल्पनाका अभाव है तथा मन एवं देह जड है, तब विवेकदृष्टिसे 'यह अन्य है, यह अन्य नहीं है; यह शुभ है, यह अशुभ है' इत्यादि असत् कल्पनाएँ नहीं रह सकतीं । ऐसी स्थितिमें सुन्दर चित्त ! विषयसे रहित चेतन परमात्मा ही सारभूत वस्तु है, दूसरी नहीं । चित्त ! जैसे आकाशमें वन नहीं है, वैसे ही पूर्वोक्त असत् कल्पनाएँ आत्मामें हैं ही नहीं । दृश्यसे रहित केवल चेतन ही इस जगत्के रूपमें विस्तृत हुआ है । इसलिये उसमें 'यह मै हूँ, यह अन्य है' इस प्रकारकी असत् कल्पनाएँ हो ही कैसे सकती हैं । अनादि, रूपरहित, सर्वगामी और व्यापक परमात्मामें कल्पनाओंका कौन कैसे आरोप कर सकता है । क्या कोई आकाशमें ऋग्वेद आदिको लिख सकता है !'

( सर्ग ८२ )


इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा उनके शमनसे समस्त गुणोंकी और परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मुनियोंमें श्रेष्ठ धीर वीतहव्य मुनिने विशुद्ध धारणासे युक्त बुद्धिसे एकान्तमे स्थित होकर पुनः अपनी इन्द्रियोंको भलीभाँति इस प्रकार समझाया—'इन्द्रियगण ! मेरे पूर्वमे किये गये आत्मतत्त्वके उपदेशसे तुमलोगोकी यह मिथ्याभूत सत्ता नष्ट ही हो गयी, ऐसा मै मानता हूँ; क्योंकि तुम अज्ञानसे उत्पन्न हुए हो । चित्त ! तुम देखो कि तुम्हारे कायम रहनेसे अज्ञानी मूर्खोके राग-द्वेष आदि तरङ्गोसे युक्त संसाररूपी नदियोंका समूह कालरूपी विशाल समुद्रमें प्रविष्ट हो रहा है । देखो ! एक दूसरोके अहंकारसे होनेवाले एक दूसरोके वध, पराजय, उत्पीड़न आदिकी चिन्ताओसे युक्त दुःखकी पंक्तियाँ कहींसे उसी प्रकार गिर रही हैं, जिस प्रकार वृष्टिकी धाराएँ गिर रही हो । अपने विलासोसे शब्द करता हुआ लोभरूपी पक्षी राग-द्वेषरूप अपने तीक्ष्ण छोर-द्वारा इस जीर्ण शरीररूपी वृक्षके शम, दम आदि गुण-