संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना * ३४९
किया—'कितने आश्चर्यकी बात है कि यह अत्यन्त चञ्चल मन किसी एक निश्चित विषयमें लगाया जानेपर भी क्षणभर भी उसी प्रकार स्थिर नहीं होता, जैसे तरङ्गोके द्वारा बहाया गया पत्ता स्थिर नहीं होता । मन घटसे पटके ऊपर और पटसे उत्कट शकटके ऊपर कूद जाता है। यों यह चित्त विषयोपर उसी प्रकार दौड़ता है, जिस प्रकार वृक्षोके ऊपर बन्दर दौड़ता है। इन्द्रियगण ! तुम-लोग मनके ही अलग-अलग द्वार हो, अतएव निश्चित ही अधम और जड हो । मै तो सच्चिदानन्दघन परमात्म-स्वरूपमें स्थित हुआ साक्षीरूपसे सब कुछ कह रहा हूँ। चक्षुरादि इन्द्रियगण ! आकारसे रहित तुमलोग मेरे सामने मिथ्या ही उछल-कूद कर रहे हो । तुमलोग अलातचक्रके सदृश और रज्जुमें सर्पभ्रमके सदृश मिथ्यारूप ही हो । जैसे सर्पोंसे डरा हुआ पथिक उनसे दूर रहता है, वैसे ही दोषरहित चेतन आत्मा इन्द्रियोंसे सर्वथा दूर रहता है । इन्द्रियगण ! केवल चेतन सत्ताकी संनिधिसे ही तुम लोगोंकी परस्पर चेष्टा होती रहती है।
'मूर्ख मन ! मैं चेतन हूँ' इस प्रकारकी तुम्हारी वासना मिथ्या और निरर्थक है; क्योंकि एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न धर्मवाले चेतन और जड मनकी एकता नहीं हो सकती । चित्त ! अहंकारके उत्पन्न होनेपर 'यह शरीर मैं ही हूँ' इस प्रकारका जो तुम मिथ्या अभिमान करते हो, उसे छोड़ दो । मूर्ख ! तुम कुछ भी नहीं हो; इसलिये क्यों व्यर्थ चञ्चल हो उठते हो ? ज्ञान-स्वरूप चेतन आत्मा अनादि और अनन्त है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। इसलिये महामूर्ख ! इस शरीरमें चित्त नामवाले तुम कहाँसे आये ? मूर्ख चित्त ! चक्षु आदि इन्द्रियगणोंका आश्रय करके तुम उपहासके पात्र मत बनो । तुम न तो कर्ता हो और न भोक्ता हो, किंतु जड हो । तुम अन्यके द्वारा—द्रष्टा-साक्षी आत्माके द्वारा जाने जाते हो । जो जडस्वरूप है, उसका अस्तित्व ही नहीं। अतः उस जडमें ज्ञातापन, कर्तापन, भोक्तापन नहीं हो सकते । चित्त ! तुम स्वयं ही जडरूप हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। भला, बतलाओ तो सही, जडमें कैसे कर्तापन रह सकता है । क्या यहाँ पत्थरकी मूर्तियाँ भी किसी प्रकार नाच सकती हैं ? जिसकी शक्तिसे जो किया जाता है, वह उसीके द्वारा किया हुआ होगा। पुरुषकी शक्तिसे दराती (हँसुआ) काटती है, पर काटनेवाला पुरुष कहलाता है। जिसकी शक्तिसे जिसका वध किया जाता है, वह उसीके द्वारा हत कहा जायगा। पुरुषकी शक्तिसे तलवार हनन करती है, पर हनन करनेवाला पुरुष ही कहा जाता है। जिसकी शक्तिसे जो पिया जाता है, वह उसीके द्वारा पिया गया कहा जायगा। पात्रके द्वारा जल आदि पिये जाते हैं; पर जो मनुष्य है, वही पीनेवाला कहा जाता है, पात्र नहीं। मेरे प्यारे चित्त ! तुम स्वभावसे ही जड हो, पर उसी सर्वज्ञ साक्षीके द्वारा बोधित होते हो; क्योंकि जीवात्मा ही अपनेको अपनेसे भोक्ता, भोग्य, करण, उपकरण आदि जगत्के रूपमें स्वप्नकी तरह रचता है । इससे तुम