भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३४४* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रूप, स्वयं अपने आपमें ही स्थित अद्वितीय सच्चिदानन्द-घन परमात्मस्वरूप मुझको ही बार-बार नमस्कार है । मननरहित, सम, अत्यन्त सुन्दर समस्त विश्वका आविर्भाव करनेवाले, वास्तवमें विश्वरहित, अनन्त, खस्वरूप, अजन्मा, जरारहित, समस्त गुणोंसे अतीत तथा अविनाशी विज्ञानानन्दघन परमेश्वरके स्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ।

रघुनन्दन ! जैसे आकाशमें दृष्टिदोषसे प्रतीत होनेवाला वृक्ष भ्रमवश वृक्षरूपमें प्रतीत होता है, वास्तवमें वह विशुद्ध आकाशस्वरूप ही है, उससे पृथक् आकाश-वृक्ष नहीं है, वैसे ही चित्त अविद्यमान, जड और मायाका कार्य होनेसे निश्चयरूपसे असत् ही है, वह परमात्मासे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है । जैसे नौकामें स्थित अज्ञानी बालकको तटवर्ती वृक्ष और पहाड़में प्रतीत होनेवाली गति केवल भ्रान्तिसे ही दिखायी पड़ती है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्यको यह चित्त दिखायी पड़ता है। किंतु आत्मज्ञानी तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें वह असन्मय ही है—है ही नहीं। मेरे समस्त संदेह शान्त हो चुके हैं, समस्त चिन्ताज्वरोंसे रहित होकर मैं स्वानुभावसे ही इच्छाओंसे रहित हुआ स्थित हूँ । मेरा चित्त मर गया, तृष्णाएँ हट गयीं और मैं मोह तथा अहंकारसे रहित हो गया । इससे मैंने अपने स्वाभाविक—वास्तविक स्वरूपको जान लिया । जगत् शान्त होकर अद्वितीय परब्रह्मस्वरूप ही हो गया और नानात्व वास्तवमें है ही नहीं । जीवत्वसे तथा आदि और अन्तसे रहित पवित्र परमपदको मैं प्राप्त हो गया हूँ । अतः मैं सौम्य, सर्वत्र व्यापक, अतिसूक्ष्म, सनातन परमात्मस्वरूपसे स्थित हूँ । श्रीराम ! इस प्रकारकी बुद्धिसे तत्त्वज्ञानी पुरुषको खाते, चलते, सोते और स्थित रहते सदा-सर्वदा सर्वत्र प्रतिदिन भलीभाँति विचार करना चाहिये । जिनका अन्तःकरण प्रमुदित है, जिनकी शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी तरह चमकीली मुखकान्ति है और जो प्राप्त हुए शास्त्रानुमोदित व्यवहारोंमें विहार करते हैं, वे असीम बुद्धिवाले महापुरुष इस संसारमें मान और मदसे रहित हुए सुखपूर्वक विचरण करते हैं। (सर्ग ७९—८१)


वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैंने तुम्हें जिस विचारका दिग्दर्शन कराया है, उस विचारको पहले विद्वान् संवर्त (बृहस्पतिके छोटे भाई) ने किया था । विन्ध्याचल पर्वतके ऊपर उसी आत्मतत्त्वज्ञ संवर्तने उक्त विचारको मुझसे कहा था । अब तुम इस दूसरी दृष्टिका, जो परमपदको प्रदान करनेवाली है, श्रवण करो । इसी दृष्टिसे महामुनि वीतहव्यने निःशङ्क परमपदको प्राप्त किया था । एक समयकी बात है, महामुनि वीतहव्य संसाररूपी भ्रम प्रदान करनेवाले घोर आधि-व्याधिमय आकारयुक्त सांसारिक क्रियाकलापोंसे वैराग्ययुक्त होकर विरक्त अवस्थाको प्राप्त हो गये और केवल निर्विकल्प समाधिसे प्राप्त होनेवाले परम उदार परब्रह्म परमात्माको जाननेकी इच्छासे ही उक्त महामुनिने अपने सांसारिक व्यवहारोंका त्याग कर दिया । तदनन्तर महामुनि वीतहव्यने स्वरचित पर्णकुटीमें प्रवेश किया । उस पर्णकुटीमें अपने द्वारा बिछाये गये सम और शुद्ध आसनपर वे बैठ गये । फिर बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका परित्याग करते हुए उन महामुनिने विशुद्ध मनसे क्रमशः इस प्रकार विचार