भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * चित्तके उपशामके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय, ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति * ३४३

पुत्र आदिके सौन्दर्यरूप रूपात्मक कीचड़का तुम आस्वादन मत करो। यह रूप क्षणमें ही विनष्ट हो जानेवाला है और तुम्हें भी विनष्ट कर देनेवाला है। नेत्र ! जो उत्पत्ति-विनाशशील है और जो केवल देखने-मात्रमें ही रमणीय प्रतीत होता है, ऐसे मिथ्या रूप-सौन्दर्यका तुम उस अवश्यम्भावी मृत्युके मुखमें प्रवेश करनेके लिये आश्रय मत लो । जैसे वास्तवमे परस्पर असम्बद्ध मुख, दर्पण और प्रतिबिम्ब एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं, वैसे ही वास्तवमें परस्पर एक दूसरेसे असम्बद्ध रूप, प्रकाश और मन एक दूसरेसे सम्बद्ध प्रतीत होते हैं। जैसे दो काठ लाहके द्वारा एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये रूप, आलोक और संकल्प आदि मनन चित्तकी कल्पनासे एक दूसरेसे संश्लिष्ट हो जाते हैं। अपने चित्तका संकल्प-विकल्पात्मक तन्तु विवेकशील बुद्धिके द्वारा यत्नपूर्वक किये गये विवेक-विचाररूप अभ्याससे विनष्ट हो जाता है। फिर उस तन्तुके नष्ट हो जानेपर स्वभावत. ही अज्ञान-भावना प्रवृत्त नहीं होती। अज्ञान-के विनाशसे क्षीण हुए मनमें फिर ये रूप, आलोक और मनन—कोई भी एक दूसरेसे संघटित नहीं होते।

चित्त ! तुम मिथ्या ही उछल-कूद मचाते हो। मैंने तुम्हारे उच्छेदके लिये उपाय ढूंढ निकाला है। तुम आदि और अन्त दोनोंमें नितान्त तुच्छ (क्षणभङ्गुर) हो, इसलिये वर्तमान कालमें भी विनष्ट ही हो। तुम इन्द्रियोंसे सम्बद्ध शब्द आदि पाँच विषयोंके द्वारा अपने भीतर क्यों वृथा उछल रहे हो ? जो मनुष्य तुम्हें अपना मानता है, उसीके सामने तुम उछल-कूद कर सकते हो । किंतु दुष्ट चित्त ! तुम्हारी उछल-कूदसे मुझे तनिक भी प्रसन्नता नहीं होती। तुम रहो चाहे जाओ, तुम न तो मेरे हो और न तुम जीते हो। विचार करनेपर अपने मिथ्या स्वभावसे तुम सदा मृतक ही हो। तुम साररहित जड, भ्रान्त और शठ हो । तुम्हारा आकार अत्यन्त विनाशशील है। अज्ञानस्वरूप तुम्हारे द्वारा अज्ञानी पुरुषको ही बाधा पहुँच सकती है, विचारवान् विवेकी पुरुषको नहीं।

जगद्रूपी-चित्त-वेताल ! शठरूप तुम पहले ही नहीं थे, वर्तमान कालमें भी नहीं हो और आगे भी नहीं रहोगे। इस प्रकार तुम्हारी तीनों कालोंमें सत्ता नहीं है। बिना हुए ही तुम कायम हो । तुम्हें क्या लज्जा नहीं आती ? चित्तरूपी वेताल ! तृणारूपी पिशाचिनियों तथा क्रोध आदि गृध्रोंके साथ तुम मेरे शरीररूपी घर-से बाहर निकल जाओ। बड़े आश्चर्यकी बात है कि महान् जड एवं क्षणभङ्गुर शठ मनने इस समस्त जन-समूहको विवश कर रखा है। अज्ञानी दीन चित्त! मैं आज तुमको मारता नहीं हूँ; क्योंकि तुम पहलेसे ही मर चुके हो, यह मैंने जान लिया है। चित्त मरा हुआ है; अतः उसका अस्तित्व ही नहीं है—यह मैंने आज जान लिया । इसलिये मैं चित्तके आश्रयका परित्याग करके केवल अपने आत्मामें ही स्थित हूँ। मनको देहरूपी घरसे क्षणभरमें निकालकर मैं इस वेतालरूप मनसे रहित हो भीतरसे स्वस्थ हुआ स्थित हूँ। भाग्यवश बहुत कालके अनन्तर अब मैंने विचाररूपी तलवारसे पीडितकर चित्तरूपी वेतालको, जो ताल वृक्षके सदृश ऊँचाईसे युक्त है, हृदय-मन्दिरसे हटा दिया है। चित्तरूपी वेतालके शान्त हो जाने और पवित्र पदवीको प्राप्त कर लेनेपर अब उत्तम भाग्यसे शरीररूपी नगरमें केवल मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ । विवेक-विचाररूपी मन्त्रसे मन, चिन्ता और अहंकाररूपी राक्षसका विनाश हो गया । अब समस्त विषमताओंसे रहित मैं केवल अपने स्वरूप-में ही स्थित हूँ । एक, कृतकृत्य, नित्य, विशुद्ध-स्वरूप तथा निर्विकल्प सच्चिदानन्दघन परमात्मरूप मुझको बार-बार नमस्कार है । विकारशून्य, नित्य, अंगरहित, सर्वरूप तथा सर्वकालात्मक परमात्मस्वरूप मुझको बार-बार नमस्कार है। नाम और रूपसे रहित, प्रकाश