संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ * अविच्छिन्नविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इच्छाएँ निवृत्त हो गयी हैं, जिसका सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुकूलता और प्रतिकूलतारूप संकल्प निवृत्त हो गया है तथा जिसका अन्तःकरण समस्त व्यवहारोंमें हर्ष और विषादसे रहित तथा सम हो गया है एवं जिसका मन शान्त हो चुका है, वह महात्मा सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। (सर्ग ७८)
चित्तके उपशमके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय एवं विवेक-विचारके द्वारा चित्तका विनाश होनेपर ब्रह्मविचारसे परमात्माकी प्राप्ति
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! उपर्युक्त दो उपायोंमेंसे आपने योगयुक्त पुरुषके चित्त-विनाशका ही निरूपण किया है। अब आप अनुग्रह करके मुझसे यथार्थ ज्ञानका सम्यक् प्रकारसे निरूपण कीजिये।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! इस जगत्में आदि और अन्तसे रहित प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही है—इस प्रकारका जो दृढ़ निश्चय है, उसी निश्चयको ज्ञानी महात्मागण सम्यक् ज्ञान यानी परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। ये जो घट-पट आदि आकारोंसे युक्त पदार्थोंके सैकड़ों समूह हैं, वे सब परमात्मस्वरूप ही हैं; उससे भिन्न अन्य कुछ नहीं है—इस प्रकारका दृढ़ निश्चय ही परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान न होनेसे जन्म होता है और परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष होता है। रज्जुका यथार्थ ज्ञान न होनेसे रज्जु सर्परूप प्रतीत होती है और उसका यथार्थ ज्ञान होनेसे रज्जु सर्परूप नहीं प्रतीत होती यानी रज्जु रज्जुरूप ही दिखायी पडती है। इस मुक्तिमें संकल्पसे सर्वथा रहित, समस्त विषयोंसे रहित केवल चिन्मय परमात्मा ही सच्चिदानन्दरूपसे विराजमान रहता है; उससे अन्य कुछ भी नहीं रहता। इन तीनो लोकोंमें यथार्थ आत्मदर्शन इतना ही है कि यह सब जगत् परमात्मा ही है, ऐसा निश्चय करके पुरुष पूर्णताको प्राप्त हो जाय। उस परमात्मासे भिन्न न तो दृश्य जड जगत् है और न मन है। ब्रह्म ही यह दृश्य रूप बनकर चेष्टा कर रहा है। समस्त ब्रह्माण्ड एक चिन्मय आकाशरूप विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है; अतः क्या मोक्ष है और क्या बन्धन है।
जितने बड़े-से-बड़े पदार्थ हैं, उन सबसे भी ब्रह्म महान् है। जैसे काष्ठ, पाषाण और वस्त्र आदि सब कुछ पृथ्वी ही है—इस प्रकारका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर उनमें तनिक भी भेद नहीं रह जाता, वैसे ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं रहती। रघुनन्दन ! आदि और अन्तमें जो अविनाशी, पूर्ण, शान्त-स्वरूप है, वास्तवमें वही सच्चिदानन्दघन परमात्मा है। जो महात्मा उस विशुद्ध परमात्माका अनुभव करके अन्तःस्थ बुद्धिसे सदा-सर्वदा स्थित रहता है, वह तत्त्वज्ञानी आत्माराम पुरुष भोगोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे मन्द पवन पर्वतका भेदन नहीं कर सकते, वैसे ही जिस ज्ञानीने प्रकाशमान परमात्माका पूर्णरूपसे अनुभव कर लिया है, उस तत्त्वज्ञके अन्तःकरणको काम आदि शत्रु तनिक भी भेदन (विचलित) नहीं कर सकते। जैसे जलसे बाहर निकली हुई मछलीको बगुले निगल जाते हैं, वैसे ही इस संसारमें आशाओमें निरत, मूढ़, अज्ञानी और अविचारी पुरुषको दुःख निगल जाते हैं। श्रीराम ! जैसे अनेक प्रकारके सरोवरोंमें जल, फेन आदि जलसे पृथक् नहीं हैं, वैसे ही दृश्य जगत् ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। केवल कल्पनाओमें ही नानात्व है, वास्तवमें नानात्व नहीं है—इस प्रकार विवेकपूर्वक भलीभाँति अर्थको जान लेनेवाला एक निश्चययुक्त ज्ञानी पुरुष विमुक्त कहा जाता है।
श्रीराम ! अपने हृदयमें ब्रह्मविषयक विचार करनेवाले विवेकी वीतराग पुरुषकी सर्वदा सम्मुखस्थित सांसारिक भोगोंमें भी रुचि उत्पन्न ही नहीं होती। अधम नेत्र ! स्त्री,