भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हो जानेपर दोनोंका और उनके कार्य चित्तका विनाश हो जाता है, जैसे विदेहमुक्त ज्ञानीका वासनासहित चित्त और प्राण ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वासना और प्राणस्पन्दन--इन दोनोंका कारण विषय है; क्योंकि उसीके सम्बन्धसे वे दोनों प्रस्फुरित होते हैं। हृदयमें प्रिय और अप्रिय शब्द आदि विषयोंका चिन्तन करके ही प्राणस्पन्दन और वासना दोनों आविर्भूत होते हैं; इसलिये विषय ही उन दोनोंका बीज (कारण) है। जिस प्रकार मूलके उच्छेदसे वृक्ष तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार विषयचिन्तनका परित्याग करनेसे प्राणस्पन्दन और वासना—दोनों ही तत्काल समूल नष्ट हो जाते हैं। रघुनन्दन ! जीवात्मा ही अपनी धीरताका परित्याग करके अपने संकल्पसे विषयरूप-सा बनकर चित्तका बीजरूप हो जाता है, ऐसा जानो। जिस प्रकार तिल तेलसे रहित नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मासे रहित कोई भी विषय नहीं हैं; क्योंकि जीवात्मा सब विषयोंमें व्यापक है। इसलिये बाहर और भीतर कोई भी पदार्थ जीवात्मासे अलग नहीं है। अपने संकल्पसे चेतन जीवात्मा ही प्रस्फुरित होता हुआ स्वयं पदार्थोंको देखता है। जिस तरह स्वप्नमें अपना मरण और भिन्न देशमें स्थिति—दोनों अपने संकल्पसे ही होते हैं, उसी तरह जाग्रत्कालीन पदार्थ भी जीवात्माके सङ्कल्पसे ही होते हैं। रघुनन्दन ! जिस विवेक-अवस्थामें अपने पारमार्थिक स्वरूपका अनुभव होता है, वह अपने संकल्पसे हुआ स्वस्वरूपानुभव भी जगज्जाल (स्वप्नके सदृश) ही है; क्योंकि सच्चिदानन्द ब्रह्म अनुभव करनेवाला, अनुभव करने योग्य और अनुभव--इन तीनोंसे ही रहित है; अतः उस अनुभवको जगज्जाल कहना उचित ही है। जैसे बालकको अपने संकल्पसे ही प्रेतका और मनुष्योंको स्थाणुमें पुरुषका भ्रम होता है, वैसे ही संकल्पसे उत्पन्न भ्रमसे ही चेतन जीवात्माकी पदार्थरूपता होती है; वास्तवमें नहीं । यह भ्रान्तिज्ञान मिथ्या है। वह यथार्थ परमात्मज्ञानसे उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार रज्जु और चन्द्रके निर्दोष दर्शनसे रज्जुमें सर्प-भ्रान्ति और एक चन्द्रमें दो चन्द्ररूपोंकी भ्रान्ति विलीन हो जाती है। पहले देखा हुआ या न देखा हुआ जो पदार्थ इस जीवात्माको भासता है, विद्वान्‌को उसे विवेक-वैराग्यरूप प्रयत्नद्वारा मिथ्या समझकर उसका बाध कर देना चाहिये। इस जड जगत्रूप दृश्यका बाध न करना ही इस बड़े भारी संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ना है। यही बन्धन है तथा इस संसारके सम्बन्धसे रहित होना ही मोक्ष है—यह महात्माओंका अनुभव किया हुआ निश्चय है; क्योंकि इस जड दृश्य जगत्का चिन्तन ही जन्मरूप अनन्त दुःखका हेतु है और उस दृश्य-चिन्तनसे रहित होकर सच्चिदानन्द परमात्मामें स्थित रहना ही पुनर्जन्मरहित अक्षय सुखका हेतु है।

वासनारहित होनेके कारण अपनी आत्मामें जब किसी पदार्थकी भावना नहीं रहती और वह परमात्माके स्वरूपमें अचल स्थित रहता है, तब जडतासे रहित, विशाल एवं विशुद्ध यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये ज्ञानवान् फिर कभी संसारमें लिप्त नहीं होता। समस्त वासनाओंका अत्यन्त अभाव होनेपर निर्विकल्प समाधिसे परम आनन्दरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। संसारके चिन्तनसे रहित योगीलोग उसी असीम आनन्दमें नित्य स्थित रहते हैं। इसलिये संसार-चिन्तनसे रहित योगी चलते, बैठते, स्पर्श करते और सूंघते हुए भी चिन्मय अक्षय आनन्दसे पूर्ण और सुखी कहा जाता है। श्रीराम ! यह जीवात्मा जिसकी भावना करता है, उसी रूपमें तत्काल परिणत हो जाता है। अज्ञानकी भूमिकाओंसे मुक्त न होनेके कारण जीवात्मा दीर्घकाल बीत जानेपर भी अपना वास्तविक स्वरूप नहीं प्राप्त कर पाता। जीवात्मा ब्रह्मका अंश है, अत एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्म ही इस जीवात्माका कारण कहा जाता है। श्रीराम ! सत्ताके दो रूप हैं—एक तो अनेक

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