संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति * ३५७
आकारवाली व्यावहारिक सत्ता और दूसरी एक रूप- वाली वास्तविक सत्ता। अब उनका विभाग सुनो। घटादि रूपोंके विभागसे जो घटत्व, पटत्व, स्तम्भ, मत्त्व आदि उपाधिभूत सत्ता कही जाती है, वह नानाकृति व्यावहारिक सत्ता है। जो विभागसे रहित, सत्तारूपसे व्याप्त समानभावसे स्थित वास्तविक सत्ता है, वह एक- रूपा वास्तविक सत्ता है। जो दृश्यरूप विशेषतासे रहित, निर्लेप और केवल सत्-स्वरूप अद्वितीय महान् वास्तविक सत्ता है, उसीको विद्वान् परमपद कहते हैं। वास्तवमें सत्ताका रूप नाना आकारके रूपमें कभी नहीं है, क्योंकि वह कायम नहीं रहता, अतः वह सत्यरूप नहीं हो सकता। सत्ताका जो विशुद्ध एकरूप वास्तविक स्वरूप है, वह कभी नष्ट नहीं होता और न कभी लुप्त ही होता है। वह नित्य विज्ञानआनन्दस्वरूप होनेसे सदा कायम रहता है। उसका अभाव कभी नहीं होता। किंतु जो विभिन्न पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली विभाग- कल्पना नानारूपताका कारण देखी जाती है, वह विशुद्ध पदरूपा कैसे हो सकती है।
श्रीराम ! सत्ता-सामान्यकी चरम अवधिरूप जो कल्पनाओंसे और आदि-अन्तसे रहित परमपद है, उसका और कोई कारण नहीं है; क्योंकि वही सबका परम कारण है। जिस परमपदमें सम्पूर्ण सत्ताएँ विलीन हो जाती हैं, उस निर्विकार परमपदमें स्थित पुरुष इस दुःखमय संसारमें कभी नहीं आता। और वही वास्तवमें परम पुरुषार्थी है। वह परमात्मा ही समस्त कारणोंका कारण है, उसका कोई दूसरा कारण नहीं है। वही सम्पूर्ण सारोंका सार है, उससे बढ़कर दूसरी सारभूत वस्तु नहीं है। जैसे तालाबमें तटस्थ वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं, वैसे ही उस असीम चिन्मय परमात्मारूप दर्पणमें ये सब पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं। उसी आनन्द-समुद्र परब्रह्मसे सभी प्रकारके सुख प्रतिबिम्बित होते हैं। उस आनन्दमय परमात्मामें ही सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है, स्थित रहता है, बढ़ता है और विलीन हो जाता है। वह परब्रह्म भारीसे भी भारी, हलकेसे भी हलका, स्थूलसे भी स्थूल और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। वह दूरसे भी दूर, निकटसे भी निकट, छोटेसे भी छोटा और बड़ेसे भी अत्यन्त बड़ा है तथा सबका प्रकाशक होनेसे ज्योतियोंका ज्योति है। वह सम्पूर्ण वस्तुओंसे रहित और सर्ववस्तु- रूप है, वही सत् और असत् है, वही दृश्य और अदृश्य है, वह अहंतासे रहित और अहरस्वरूप है। श्रीराम ! वास्तवमें वही विशुद्ध जरारहित परमात्मतत्त्व है। उसकी प्राप्ति होनेपर चित्त परम शान्त हो जाता है।
(सर्ग ९१)
तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति तथा मनको वशमें करनेके उपायोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जबतक मन विलीन नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होता और जबतक वासना विनष्ट नहीं होती, तबतक चित्त शान्त नहीं होता। जबतक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तबतक चित्तकी शान्ति कहाँ और जबतक चित्तकी शान्ति नहीं होती, तब- तक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता। जब- तक वासनाका सर्वथा नाश नहीं होता, तबतक तत्त्व ज्ञान कहाँसे होगा और जबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होगा। इसलिये परमात्माका यथार्थ ज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय—ये तीनों ही एक दूसरेके कारण हैं। अतः ये दुःसाध्य हैं, किंतु असाध्य नहीं। विशेष प्रयत्न करनेसे ये तीनों कार्य सिद्ध हो सकते हैं। श्रीराम !