भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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३५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


विवेकसे युक्त होकर प्रयत्नसे भोगेच्छाका दूरसे ही परित्याग करके इन तीनों साधनोंका अवलम्बन करना चाहिये । यदि इन तीनों उपायोंका एक साथ प्रयत्नपूर्वक भली प्रकार बार-बार अभ्यास न किया जाय तो सैकड़ो वर्षोंतक भी परमपदकी प्राप्ति सम्भव नहीं । किंतु महाबुद्धिमान् श्रीराम ! वासनाक्षय, परमात्माका यथार्थ ज्ञान और मनोनाश—इन तीनोंका एक साथ दीर्घकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास किया जाय तो ये परमपदरूप फल देते हैं । * इन तीनोंका चिरकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेसे अत्यन्त दृढ़ हृदयग्रन्थियाँ निःशेषरूपसे टूट जाती हैं ।

श्रीराम ! यह संसारकी दृढ़ स्थिति सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरोंसे मनुष्योंके द्वारा अभ्यस्त है; अतः चिरकालतक अभ्यास किये बिना वह किसी तरह भी नष्ट नहीं हो सकती। इसलिये चलते-फिरते, श्रवण करते, स्पर्श करते, सूँघते, खड़े रहते, जागते, सोते—सभी अवस्थाओंमें परम कल्याणके लिये इन तीनों उपायोंके अभ्यासमें लग जाना चाहिये । तत्त्वज्ञोंका मत है कि वासनाओंके परित्यागके समान ही प्राणायाम भी एक उपाय है । इसलिये वासना-परित्यागके साथ-साथ प्राण-निरोधका भी अभ्यास करना आवश्यक है । वासनाओंका भली-भाँति परित्याग करनेसे चित्त भूने हुए बीजके समान अचित्तरूप हो जाता है और प्राणस्पन्दके निरोधसे भी चित्त अचित्तरूप हो जाता है; इसलिये तुम जैसा उचित समझो, वैसा करो । चिरकालतक प्राणायामके अभ्याससे, योगाभ्यासमें कुशल गुरुद्वारा बतायी हुई युक्तिसे, स्वस्तिक आदि आसनोंकी सिद्धिसे और उचित भोजनसे प्राण-स्पन्दनका निरोध हो जाता है । परमात्माके स्वरूपका साक्षात् अनुभव होनेपर वासना उत्पन्न नहीं होती । आदि, मध्य और अन्तमें कभी पृथक् न होनेवाले एकमात्र सत्यस्वरूप परमात्माको भलीभाँति यथार्थरूपसे जान लेना ही ज्ञान है। यह ज्ञान वासनाका सर्वथा विनाश कर देता है तथा अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसारका चिन्तन छोड़नेसे और शरीरको विनाशशील समझनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती । जिस प्रकार पवन-स्पन्दके शान्त हो जानेपर आकाशमें धूलि नहीं उठती, वैसे ही वासनाका विनाश हो जानेपर चित्त विषयोंमें नहीं भटकता । बुद्धिमान् पुरुषको एकाग्रचित्तसे बार-बार एकान्तमें बैठकर प्राण-स्पन्दके निरोधके लिये विशेष यत्न करना चाहिये। जिस प्रकार मदमत्त दुष्ट हाथी अङ्कुशके बिना दूसरे उपायसे वशमें नहीं होता, उसी प्रकार पवित्र युक्तिके बिना मन वशमें नहीं होता । अध्यात्मविद्याकी प्राप्ति, साधु-संगति, वासनाका सर्वथा परित्याग और प्राणस्पन्दनका निरोध—ये ही युक्तियाँ चित्तपर विजय पानेके लिये निश्चितरूपसे दृढ़ उपाय हैं । † इनसे तत्काल ही चित्तपर विजय प्राप्त हो जाती है । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंके रहते जो पुरुष हठसे चित्तको वशीभूत करना चाहते हैं, उनके सम्बन्धमें मेरा यही मत है कि वे दीपकका परित्याग करके अञ्जनोंसे अन्धकारका निवारण करना चाहते हैं । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंको त्यागकर जो पुरुष चित्त या चित्तके निकटवर्ती अपने शरीरको स्थिर करनेके लिये यत्न करते हैं, उन हठ करनेवाले पुरुषोंको विवेकी लोग हठी समझते हैं।

( सर्ग ९२ )


* वासनाक्षयविज्ञानमनोनाशा महामते । समकालं चिराभ्यस्ता भवन्ति फलदा मुने ॥
( योगवा० उप० ९२ । १७ )

† अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥
एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।
( योगवा० उप० ९२ । ३५ ३६ )