भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३५९

विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति और जीवन्मुक्त महात्माओंकी स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किंचिन्मात्र विवेकपूर्वक विचारसे जिसने अपने चित्तका निग्रह कर लिया, उसने जन्मका फल पा लिया । यदि हृदयमें इस विचाररूपी कल्पवृक्षका कोमल अङ्कुर भी प्रकट हो जाय तो वही अङ्कुर अभ्यासयोगके द्वारा सैकड़ों शाखाओंमें फैल सकता है । विवेक-वैराग्यसे जिसका विचार कुछ दृढ़ हो गया है, उस पुरुषका शान्ति, समता, क्षमा, दया आदि पवित्र गुण उसी प्रकार आश्रय लेते हैं, जिस प्रकार जलसे परिपूर्ण सरोवरका पक्षी और मत्स्य, कच्छप आदि आश्रय लेते हैं, भलीभाँति परमात्मविषयक विचार करनेसे जिसे परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार हो गया है ऐसे ज्ञानी महापुरुषको अविद्यासे उत्पन्न अत्यन्त रमणीय और विशाल वैभव भी आकृष्ट नहीं कर पाते । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे जिसकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है, उस महात्माका यहाँके विषय, मानसिक वृत्तियाँ, आधि और व्याधि—ये सब क्या कर सकते हैं अर्थात् वे उसे तनिक भी विचलित नहीं कर सकते । जिसने ज्ञानकी चतुर्थ भूमिका प्राप्त कर ली है और जिसने जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव कर लिया है, उस धीर-वीर ज्ञानी महात्मा पुरुषपर विषय तथा इन्द्रियरूपी डाकू क्या कभी आक्रमण कर सकते हैं ? जिस पुरुषका अन्तःकरण चलते-फिरते या बैठते, जागते या सोते—इन सभी अवस्थाओंमें विवेकपूर्ण ब्रह्मविचारसे युक्त नहीं रहता, वह मृतकके समान है । अज्ञानरूपी अन्धकारका हरण करनेवाले परमात्मविषयक विचारसे तत्काल ही विशुद्ध परमपदरूप परमात्माका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाशमान दीपकसे वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती है तथा परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे सम्पूर्ण दुःखोंका उसी प्रकार अत्यन्त अभाव हो जाता है, जिस प्रकार सूर्यके उदयसे अन्धकारका अत्यन्त अभाव हो जाता है । क्योंकि जब परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान पूर्णतया प्राप्त हो जाता है, तब जानने योग्य ब्रह्मके स्वरूपकी प्राप्ति अपने-आप ही उसी प्रकार हो जाती है, जिस प्रकार सूर्यका उदय हो जानेपर भूमण्डलपर विशुद्ध प्रकाश उसी क्षण अपने-आप अनायास ही हो जाता है । जिस सत्-शास्त्रके विवेकपूर्वक विचारसे सच्चिदानन्द परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव हो जाता है, वही ज्ञान कहा जाता है और वह ज्ञान ज्ञेयरूप परमात्मासे भिन्न नहीं है—परमात्माका स्वरूप ही है ।

श्रीराम ! पण्डितलोग विवेकपूर्वक परमात्मविषयक विचारसे उत्पन्न परमात्मस्वरूपके अनुभवको ही ज्ञान कहते हैं । उसी ज्ञानके अंदर ज्ञेय उसी प्रकार छिपा रहता है, जिस प्रकार दूधके अंदर माधुर्य छिपा रहता है । सम्यग्-ज्ञानके प्रकाशसे आलोकित पुरुष स्वयं ज्ञेयरूप हो जाता है । सम और विशुद्धस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही ज्ञेय कहा जाता है । जिसके अन्तःकरणमें आनन्दका प्राकट्य हो गया है, वह ज्ञानवान् पुरुष किसी भी सांसारिक विषयमें नहीं फँसता । समस्त सङ्गोंसे रहित पूर्णकाम जीवन्मुक्त ज्ञानी सम्राटकी तरह सदा मस्त रहता है । श्रीराम ! ज्ञानी महात्मा पुरुष वीणा-वंशीकी मधुरध्वनि आदि मनोहर शब्दोंमें, कामिनियोंके शृङ्गार-रस-मिश्रित कमनीय गीतोंमें, करताल, गम्भीर मृदङ्ग तथा चित्र-विचित्र कांस्यताल आदि वाद्योंकी ध्वनियोंमें—चाहे ध्वनि रूक्ष हो या मधुर कहीं भी प्रेम नहीं करता । आसक्ति-रहित ज्ञानी पुरुष कोमल कदलीके स्तम्भोंकी पल्लव-पङ्क्तियोंसे युक्त तथा देवता एवं गन्धर्वोंकी कन्याओंके अङ्गोंके समान अतिकोमल अवयववाली लताओंसे युक्त नन्दनवनकी क्रीडाओंमें कभी भी रमण नहीं करता । जिस प्रकार हंस मरुभूमिमें रमण नहीं करता, उसी प्रकार स्वाधीन विषयभोगोंमें भी आसक्ति न रखनेवाला धीर तत्त्वज्ञ किसी भी विषयमें रमण नहीं करता । कदम्ब, कटहल, अंगूर, खरबूजा, अखरोट तथा नारंगी आदि फलोंमें; दही, दूध, घी, मक्खन, चावल आदि भोज्य पदार्थोंमें; लेह्य (चटनी), पेय