संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 401, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० ॐ अविच्छिन्नाचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् ॐ [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
(चर्वण) आदि त्रिचमत्पूर्व चित्र-विचित्र छः प्रकारके रसयुक्त पदार्थोंमें, इनके सिवा अन्यान्य फल, कन्द, मूल, शाक आदि भोज्य पदार्थोंमें—कहींपर भी वह परमात्माके आनन्दमें तृप्त, आसक्तिरहित ज्ञानी महात्मा पुरुष नहीं फँसता।
धर्मराज, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य और वायुके लोकोंको; मेरु, मन्दराचल, कैलास, सह्याद्रि तथा दर्दुर पर्वतोंके शिखरोंको; चन्द्रमाकी चाँदनी को; मणियुक्तमय रत्न और सुवर्ण-निर्मित महलोंको; तिलोत्तमा, उर्वशी, रम्भा, मेनका आदिकी अङ्गलताओँको—किसीको भी वह आसक्ति-रहित ज्ञानी महात्मा देखना भी नहीं चाहता और वह विज्ञानानन्दघन परमात्मामें परिपूर्ण, मान न चाहनेवाला, मौनी महात्मा शत्रुओंके प्रतिकूल व्यवहारको देखकर भी विचलित नहीं होता। जो एक ब्रह्मदृष्टि रखनेवाला तथा विकाररहित समबुद्धि ज्ञानवान् पुरुष है, वह कनेर, मन्दार, कल्हार, कमल आदिमें; कुईं, नीलकमल, चम्पा, केतकी, अगर, जाति (मालती) आदि पुष्पोंमें; चन्दन, अगरु, कपूर एवं कस्तूरी आदिमें; केसर, लौंग-इलायची, कक्कोल (शीतलचीनीके वृक्षका भेद), तगर आदि अङ्गरागोंमेंसे किसीकी भी सुगन्धसे प्रेम नहीं करता। जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके ध्यानमें मग्न है, वह वज्रके भयावह शब्दसे, पर्वतके विस्फोटसे एवं ऐरावत आदि हाथियोंके चिग्घाड़नेसे कम्पित नहीं होता। तीक्ष्ण छुरेकी धारोंमें या नवीन कमलोंसे निर्मित शय्याओंमें, सूर्य-किरणोंसे प्रतप्त शिलाओंमें या कोमल ललनाओंमें, सम्पत्तियोंमें या उग्र विपत्तियोंमें एवं क्रीडाओं तथा उत्सवोंमें विहार करते हुए भी ज्ञानी महात्माको प्रतिकूल पदार्थोंसे तो उद्वेग नहीं होता और अनुकूलकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं होता। वह भीतरसे सदा अहंता-ममता एवं आसक्तिसे रहित होता है और बाहरसे निःस्वार्थभावसे कर्म करता रहता है। जीवनका विनाश करनेवाला तथा जीवनका दान देनेवाला—इन दोनों पुरुषोंको ज्ञानी पुरुष प्रसन्नता एवं मधुरतासे शोभित समदृष्टिसे देखता है। ज्ञानवान् पुरुष देवता और मनुष्य आदि शरीरोंसे तथा प्रिय और अप्रिय पदार्थोंसे न हर्षित होता है और न ग्लानिका अनुभव करता है अर्थात् अनुकूलमें हर्षित नहीं होता और प्रतिकूलमें ग्लानि और विषादके वशीभूत नहीं होता। श्रीराम! अपने चित्तमें आसक्तिका अभाव और परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे तत्त्वज्ञानी पुरुष जगत्को मिथ्या समझता है। इसलिये वह किसी भी समय इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंमें रमण नहीं करता; क्योंकि उसकी बुद्धि समस्त मानस पीडाओंसे मुक्त हो चुकी रहती है। किंतु जो तत्त्वज्ञानसे शून्य और शान्तिरहित है एवं परमात्माको प्राप्त नहीं हुआ है, उस वास्तविक स्थितिसे वञ्चित मनुष्य-को इन्द्रियाँ तत्काल उसी प्रकार निगल जाती हैं, जिस प्रकार हरिन हरे कोमल पत्तोंको निगल जाते हैं।
रघुनन्दन! जो विवेकपूर्वक विचारशील है एवं जिसकी एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपमें ही स्थिति है और परमात्माके स्वरूपमें ही जिसको विश्राम प्राप्त हो गया है, उस ज्ञानी महात्माको संसारके संकल्प-विकल्प विचलित नहीं कर सकते—ठीक उसी प्रकार जैसे जलका प्रवाह अचल पहाड़को विचलित नहीं कर सकता। समस्त संकल्पोंकी सीमाके अन्तरूप पदमें जो महानुभाव विश्रामको प्राप्त हो गये हैं, उन परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंकी दृष्टिमें सुवर्णमय सुमेरु पर्वत भी तृणके सदृश है अर्थात् कुछ भी नहीं है। उन विशालहृदय महात्माओंकी दृष्टिमें सारा संसार और एक छोटा-सा तृण, अमृत और विष, कल्प और क्षण समान हैं। जिस जड दृश्य संसारका आदि और अन्तमें अस्तित्व नहीं है, उसकी यदि वर्तमान कालमें कुछ कालतक सत्ता प्रतीत हो रही है तो वह जीवात्माका भ्रम ही है। ज्ञानी शरीर, मन, बुद्धि तथा आसक्तिसे रहित इन्द्रियोंसे चाहे कर्म करे या न करे, असङ्ग होनेके कारण कर्मसे लिप्त नहीं होता। महाबाहु श्रीराम! जिस प्रकार कोई भी मनोराज्यकी सम्पत्तियोंके नष्ट होने या न होनेपर, उससे उत्पन्न सुख-दुःखोंसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी